शनिवार, 27 मई 2023

कर्मप्रधान जातिव्यवस्था ही प्राचीन सनातन संस्कृति और धर्म

           आधुनिक युग में समाज को बाँटकर सत्ता हथियाने के लिए प्राचीन सामाजिक व्यवस्था के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न किया जा रहा है। बिहार ,उत्तरप्रदेश आदि राज्यों में जातिगत जनगणना कराने की बातें की जा रही है। ऐसे ही कुछ बातें आर्य और अनार्य के संबंध में भी की जाती हैं। भारत में सनातन धर्म कर्म प्रधान न कि जन्मप्रधान ।आधुनिक युग में जातिव्यवस्था जन्मप्रधान हो गया है। जबकि प्राचीनकाल में यह कर्मप्रधान जातिव्यवस्था थी। लेकिन तथाकथित राजनीतिक दल और उनके नेता सामाजिक रिस्ते को बाँटो और राजकरो के सिद्धांत पर चल रहे हैं। वे खुद मलेच्छ हैं और उत्कृष्ट सनातन धर्म में भी मलेच्छता  फैलाने का काम कर रहें हैं। 
          पहले मैं आर्य और अनार्य के भ्रम को तोड़ रहा हूँ। श्रीमद्वाल्मीकि रामायण के द्वितीय खण्ड के युद्धकांड
के 104 वें अध्याय के दूसरे से पाँचवें श्लोक में रावण अपने सारथी को डाँटते हुए कहते हैं कि क्या तूने मुझे पराक्रमशून्य ,असमर्थ, पुरुषार्थशून्य, डरपोक, ओछा, निस्तेज, मायारहित, और अस्त्रों के ज्ञान से वंचित समझ रखा है कि मेरा अभिप्राय जाने बिना ही मेरी अवहेलना करके मेरे शत्रु के सामने से मेरा रथ हटा लिया?
त्वयाद्य हि ममानार्य चिरकालमुपार्जितम्।
यशो वीर्यं च तेजश्च प्रत्ययश्च विनाशितः।।5।।
वा.रा.यु.का. अ.-104 पृ.584
 अर्थात् अनार्य! आज तूने मेरे चिरकाल से उपार्जित यश 
, पराक्रम, तेज और विश्वास पर पानी फेर दिया।
यही नहीं उन्होंने आगे यह भी कहा कि मैं युद्ध का लोभी हूँ तो भी तूने रथ हटाकर शत्रु की दृष्टि में मुझे कायर  सिद्ध कर दिया। दुर्मते ! मेरा यह अनुमान सत्य है कि शत्रु ने तुझे घूस देकर तोड़ दिया है। 
      इसके जवाब में उसी अध्याय के आगे के श्लोकों में सारथि के कर्तव्यों  को बताते हुए कहा कि मैं डरा हुआ नहीं हूँ, मेरा विवेक भी नष्ट नहीं हुआ है, न मुझे शत्रुओं ने ही बहकाया है। मैं असावधान भी नहीं हूँ।  आपके प्रति मेरा स्नेह भी कम नहीं हुआ है तथा आपने जो मेरा सत्कार किया है, उसे भी मैं भूला हुआ नहीं हूँ। मैं आपका सदा हित चाहता हूँ और आपके यश की रक्षा के लिए ही यत्नशील रहता हूंँ।
नास्मिन्नर्थे महाराज त्वं मां प्रियहिते रतम्।
कश्चिल्लघुरिवानार्यो दोषतो गन्तुमर्हसि ।।13।।
वा.रा.यु.का. अ.-104 पृ.584
 अर्थात्  महाराज ! मैं आपके प्रिय और हित में तत्पर रहनेवाला हूँ, अतः इस कार्य के लिए आप किसी ओछे और अनार्य पुरुष की भाँति मुझपर दोषारोपण न करें।
         इससे स्पष्ट होता है कि आर्य अर्थात श्रेष्ठ आचरण करनेवाले लोग।जबकि अनार्य अर्थात गंदे आचरण करनेवाले, मिथ्यावादी , कायर ,  दुराचारी, पथभ्रष्ट आदि निम्नस्तरीय लोगों के लिए कहा गया है। 
            अब जो आर्य को बाहर से आनेवाले लोग माननेवाले इतिहासकार और तथाकथित विद्वान लोग, क्या यह कहना चाहते हैं कि भारत के मूलनिवासी  दूराचारी, पथभ्रष्ट , कायर, और निकृष्ट लोग थे ? जिसे बाहर से आर्य आकर भारतीय लोगों को सभ्य बनाए।  यह आपसब विचारें कि ऐसे लोगों को क्या कहना चाहिए जो हम भारतीयों को सदैव नीचा दिखाते रहें हैं। हर तरह से साजिश करते रहें हैं।
       इसी तरह ब्राम्हणों के बारे में  भी गलत-गलत बातें ही भ्रम फैलाकर उन्हें निकृष्ट दिखाने की कोशिश की जा रही है। भारतीय समाज को जातियों में बाँटा जा रहा है। एक तरह से सनातनियों को जाति-धर्म में बाँटकर भारत पर राज करने ,विधर्मी लोग षड्यंत्र कर रहे हैं।
         आइये जरा इनके बारे में भी, सच जानने की कोशिश  करते हैं। ब्राम्हण कौन और उन्हें क्या करना चाहिए।   
           ब्राह्मण को चाहिए कि वह सम्मान की इच्छा को भयंकर विष के समान समझकर उससे डरता रहे और अपमान को अमृत के समान स्वीकार करें, क्योंकि जिसकी अवमानना होती है उसकी हानि नहीं होती, वह सुखी ही रहता है।
   और जो अवमानना करता है वह विनाश को प्राप्त होता है इसलिए तपस्या करता हुआ द्विज नित्य वेद या और उपनिषदों का अभ्यास करें। क्योंकि वेदाभ्यास ही ब्राह्मण का परम तप है
           ब्राह्मण के तीन जन्म होते है। एक तो माता की गर्भ से , दूसरा यज्ञोपवीत के होने से समय और तीसरा यज्ञ तप की दीक्षा लेने से ।
            यज्ञोपवीत के समय गायत्री माता और आचार्य पिता होता है क्योंकि यज्ञोपवीत होने से पूर्व किसी भी वैदिक कर्म के करने का अधिकारी वह नहीं होता है। 
श्राद्ध मे पढ़ जानेवाले वेदमंन्त्रो को छोड़कर (अनुपनीत द्विज)  वेद मन्त्र का तबतक उच्चारण न करे क्योंकि जब तक वेदारम्भ न हो जाय तबतक वह शुद्र के समान माना गया है।
         यज्ञोपवीत सम्पन्न हो जाने पर द्विज को व्रत का उपदेश ग्रहण करना चाहिए और तभी से विधिपूर्वक वेदाध्ययन करना चाहिए ।
          अपनी तपस्या वृद्धि के लिए गुरू के पास रहे और नियमों का पालन करते रहें ।पुष्प, फल,जल, समिधा, मृत्तिका, कुशा,और अनेक प्रकार को काष्ठों या संग्रह रखें।
          मद्य,मांस ,गन्ध,पुष्प-माला,व स्त्रियों का परित्याग करे।प्राणियों की हिंसा, शरीर मे उबटन-अंजन लगाना, जूता और छत्र धारण करना गीत सुनना ,नाच देखना, जुआ खेलना, झुठबोलना, निन्दा करना काम क्रोध और लोभादिके वशीभुत होना ब्राह्मण धर्म ये विरूद्ध है।
            ब्राम्हण कौन?
 यास्क मुनि के अनुसार-
जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् भवेत द्विजः।
वेद पाठात् भवेत् विप्रः ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः।।
अर्थात – व्यक्ति जन्मतः शूद्र है। संस्कार से वह द्विज बन सकता है। वेदों के पठन-पाठन से विप्र हो सकता है। किंतु जो ब्रह्म को जान ले,वही ब्राह्मण कहलाने का सच्चा अधिकारी है।
          योग सूत्र व भाष्य के रचनाकार पतंजलि के अनुसार-
विद्या तपश्च योनिश्च एतद् ब्राह्मणकारकम्।
विद्यातपोभ्यां यो हीनो जातिब्राह्मण एव स:॥
अर्थात- ”विद्या, तप और ब्राह्मण-ब्राह्मणी से जन्म ये तीन बातें जिसमें पाई जाये, वही पक्का ब्राह्मण है। पर जो विद्या तथा तप से शून्य है वह जातिमात्र के लिए ब्राह्मण है,  और वे पूज्य नहीं हो सकते हैं। ” 
(पतंजलि भाष्य 51-115)
-महर्षि मनु के अनुसार-
 विधाता शासिता वक्ता मा ब्राह्मण उच्यते।
तस्मै नाकुशलं ब्रूयान्न शुष्कां गिरमीरयेत्॥
अर्थात-शास्त्रो का रचयिता तथा सत्कर्मों का अनुष्ठान करने वाला, शिष्यादि की ताडनकर्ता,वेदादि का वक्ता और सर्व प्राणियों की हितकामना करने वाला ब्राह्मण कहलाता है। अत: उसके लिए गाली-गलौज या डाँट-डपट के शब्दों का प्रयोग उचित नहीं”।
(मनु; 11-35)
महाभारत के कर्ता वेदव्यास और नारदमुनि के अनुसार “जो जन्म से ब्राह्मण हे किन्तु कर्म से ब्राह्मण
नहीं हैं, उसे शुद्र (मजदूरी) के काम में लगा दो”
 (सन्दर्भ ग्रन्थ – महाभारत)
 महर्षि याज्ञवल्क्य व पराशर व वशिष्ठ के अनुसार “जो निष्कारण (कुछ भी मिले ऐसी आसक्ति का त्याग करके)
वेदों के अध्ययन में व्यस्त रहे और वैदिक विचार संरक्षण और संवर्धन हेतु सक्रीय रहे वही ब्राह्मण हैं।
(सन्दर्भ ग्रन्थ शतपथ ब्राह्मण, ऋग्वेद मंडल १०, पराशर स्मृति)
भगवद गीता में श्री कृष्ण के अनुसार “शाम, दाम, करुणा, प्रेम, शील (चारित्र्यवान),निस्पृही जैसे गुणों का स्वामी ही ब्राह्मण हैं। ” 
 “चातुर्वर्ण्य माय सृष्टं गुण कर्म विभागशः” (भ.गी. ४-१३)
इसमे गुण कर्म ही क्यों कहा भगवान ने जन्म क्यों नहीं कहा? 
जगद्गुरु शंकराचार्य के अनुसार “ब्राह्मण वही है जो “पुंसत्व” से युक्त हैं। जो “मुमुक्षु” हैं। जिसका मुख्य उद्देश्य वैदिक विचारों का संवर्धन हैं। जो सरल हैं, जो नीतिवान हैं , वेदों पर प्रेम रखता है , जो तेजस्वी और ज्ञानी  हैं। जिसका मुख्य व्यवसाय वेदों का अध्ययन और अध्यापन कार्य है । वेदों,उपनिषदों, दर्शनशास्त्रों का संवर्धन करने वाला ही ब्राह्मण हैं। ”
(सन्दर्भ ग्रन्थ – शंकराचार्य विरचित विवेक चूडामणि, सर्व वेदांत सिद्धांत सारसंग्रह,आत्मा-अनात्मा विवेक)
किन्तु जितना सत्य यह है कि केवल जन्म से ब्राह्मण होना संभव नहीं है, कर्म से कोई भी ब्राह्मण बन सकता है । यह भी उतना ही सत्य है कि इसके कई प्रमाण वेदों और ग्रंथो में मिलते हैं ।
जैसे…..
ऐतरेय ऋषि - ये दास अथवा अपराधी के पुत्र थे| परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की |ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेयब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है|
ऐलूष ऋषि -  ये दासी पुत्र थे | जुआरी और हीनचरित्र भी थे | परन्तु बाद में उन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके अनेक अविष्कार किये| ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन किया | (ऐतरेय ब्राह्मण २.१९
 सत्यकाम जाबाल- ये गणिका (वेश्या) के पुत्र थे परन्तु वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए |
राजा दक्ष के पुत्र  पृषध शूद्र हो गए थे, प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया | 
(विष्णु पुराण ४.१.१४)
राजा नेदिष्ठ के पुत्र नाभाग  वैश्य हुए| पुनः इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया |
(विष्णु पुराण ४.१.१३)
धृष्ट नाभाग के पुत्र थे, परन्तु ब्राह्मण हुए और उनके पुत्र ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.२.२)
आगे उन्हींके वंश में पुनः कुछ ब्राह्मण हुए| 
(विष्णु पुराण ४.२.२)
 भागवत के अनुसार राजपुत्र अग्निवेश्य  ब्राह्मण हुए |
विष्णुपुराण और भागवत के अनुसार रथोतर क्षत्रिय से ब्राह्मण बने |
हारित क्षत्रियपुत्र से ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण)
क्षत्रियकुल में जन्में शौनक ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.८.१) 
वायु,विष्णु और हरिवंश पुराण कहते हैं कि शौनक ऋषि के पुत्र कर्म भेद से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण के हुए | इसी प्रकार गृत्समद, गृत्समति और वीतहव्य के उदाहरण हैं |
     मातंग चांडालपुत्र से ब्राह्मण बने |
ऋषि पुलस्त्य का पौत्र रावण अपने कर्मों से राक्षस बना। 
राजा रघु का पुत्र प्रवृद्ध राक्षस हुआ | 
त्रिशंकु राजा होते हुए भी कर्मों से चांडाल बन गए थे |
विश्वामित्र के पुत्रों ने शूद्रवर्ण अपनाया | विश्वामित्र स्वयं क्षत्रिय थे। परन्तु बाद उन्होंने ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया विदुर दासी पुत्र थे | तथापि वे ब्राह्मण नहीं हुए और उन्होंने हस्तिनापुर साम्राज्य का मंत्री पद सुशोभित किया। 
            मित्रों, ब्राह्मण की यह कल्पना व्यावहारिक है न कि जन्म से। विवाद का यह अलग विषय है। किन्तु भारतीय सनातन संस्कृति के हमारे पूर्वजों व ऋषियों ने ब्राह्मण की जो व्याख्या दी है, उसमें काल के अनुसार परिवर्तन करना हमारी मूर्खता मात्र होगी। 
           वेदों-उपनिषदों से दूर रहने वाला और ऊपर दर्शाये गुणों से अलिप्त व्यक्ति चाहे जन्म से ब्राह्मण हों या ना हों लेकिन ऋषियों को व्याख्या में वह ब्राह्मण नहीं हैं। अतः आओ हम हमारे कर्म और संस्कारों की तरफ वापस बढ़ें ।
ब्राम्हणभेदा अथ ब्राम्हणभूदांस्त्वष्टौ विप्रावधारय।
मात्रश्चब्राम्हणश्चैव श्रोत्रियश्चतत:परम्।।
अनूचानस्तथाभ्रूणोऋषिकल्पः ऋषिर्मुनिः।
  ऋषि कौन हैं? 
ऊर्ध्वरेताभवत्यग्रे नियताशी न संशयी । 
शापानग्रह्यो शक्त:सत्यसंधोभवेदृषि:!!
 मुनि कौन हैं? 
 निवृत्त:सर्व तत्वज्ञो काम क्रोधविवर्जित :l
 ध्यानस्थो निष्क्रियो दानतस्तुल्यमृत्काञ्चने।
        अतः आप सभी सनातनियों से आग्रह है कि तथाकथित राजनेताओं और राजनीतिक दलों के बहकावे में न पड़कर , अपने परिवार को ज्ञानी बनाइये । उस संविधान (सम+विधान) के पचड़े में मत पड़िये। जिसमें कहा तो गया है कि समानता का अधिकार है परन्तु वे खुद ही हमें अगले-पिछड़े  जाति-धर्म में बाँटते हैं।  वास्तव में अगर हमारी संसद संविधान की रक्षा चाहती है तो सभी भारतीय लोगों के लिए एक ही शिक्षा, एक ही नौकरी की योग्यता रुपी समान आचार संहिता लागु कर  दें। 

शुक्रवार, 17 मार्च 2023

हरिभाऊ वाकणकर जी का मल्हार यात्रा


       कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने जीवन को ही एक किताब बना लेते हैं ,और जिनकी यादें हमेशा मन मस्तिष्क में बनी रहती है । ऐसे ही एक महामना थे पद्मश्री डॉक्टर विष्णु श्रीधर वाकणकर 'हरिभाऊ 'जी।  आपका जन्म मध्यप्रदेश के नीमच में 4 मई 1919 को हुआ था। आप की माता श्रीमती सीता श्रीधर वाकणकर जी एवं पिता श्री श्रीधर सिद्धनाथ वाकणकर जी थे । आपने एम.ए. ,पीएचडी एवंं जी.डी. आर्ट से शिक्षा प्राप्त कर निदेेेशक संग्रहालय ,विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन , केे पद पर कार्यरत रहे।आप अनेक जगहों पर संस्थापक, महामंत्री ,बौद्धिक प्रमुख ,संस्थापक, संचालक भी रहे ।संचालक ललित कला ,और  शैलचित्र शोध संस्थान भी रहे। आप बाबासाहेब आप्टे इतिहास संकलन समिति ,मध्य प्रदेश और गुजरात के  प्रमुख भी रहे। आप एक कुशल चित्रकार भी थे । आपने नर्मदा, चंबल और वैदिकयुगीय सरस्वती नदी की पुरातात्त्विक सर्वैक्षण  की। आप असम तथा दक्षिण भारत में पदयात्रा कर अनेक सर्वेक्षण कार्य भी  किए। 
    आपने महेश्वर में 1954 में जो उत्खनन कार्य प्रारंभ किए ,फिर 1955 नवादा टोली ,1959 में इंद्रगढ़, 1960 मनौती और  आगरा ,1966 कायथा,  ,भीमबेटका  1971 -78 ,1974-75 में  मंंदसौर और आजादनगर  इंदौर ,  तथा दंगबाड़ा ,और 1980 रुनिजाआदि में सतत उत्खनन करते रहे । इसके अलावा आपने देश से बाहर इंग्लैंड और फ्रांस में भी उत्खनन कार्य उन सभी जगहों की  प्राचीन संस्कृति और सभ्यता को  उजागर करते रहे । आपकी इन्हीं कार्यों के लिए सन् 1975 में राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित किया गया। आप एक कलाकार और लेखक भी थे। 
       आपके पास सिक्के, मुद्राएं ,ताम्रपत्र, शिलालेखोंं,  मिट्टी की बनी मूर्तियाँ, पत्थर के औजार , हड्डियों के गहने , रेखा चित्र चलचित्र आदि के हजारों संग्रह थे ।            सन् १९८७ में   उज्जैन में  एक शोध संगोष्ठी का आयोजन किया गया था।  उस समय छत्तीसगढ़ भी अविभाजित मध्यप्रदेश का ही हिस्सा था। मेरे पिताजी स्वर्गीय श्री गुलाब सिंह ठाकुर जी और राष्ट्रपति पुरस्कृत शिक्षक  स्वर्गीय श्री रघुनंदन प्रसाद पांडेय जी शिविर में भाग लेने और शोधपत्र  वाचन करने उज्जैन गए थे ।उज्जैन में आयोजित शोध संगोष्ठी में अनेक मूर्धन्य विद्वान आए हुए थे। पर पिताजी ने दो ही विद्वानों की जिक्र विशेष रूप से किया था। पहले थे पद्श्री डाक्टर विष्णु श्रीधर वाकणकर जी और दूसरे थे राष्ट्रकवि शिवमंगल  सिंह 'सुमन' जी।
    उस शोध-संगोष्ठी के लिए पिताजी ने अपने शोधपत्र में 'अपीलक' और 'प्रसन्नमात्र' की सिक्कों  पर अपना आलेख तैयार किया था। उस समय ज्ञात सिक्कों  में 'अपीलक'  का एकमात्र सिक्का,  स्वर्गीय  श्री लोचन प्रसाद पांडेय जी को महानदी के रेत में प्राप्त हुआ था। और जो दूसरी सिक्का मिला ,वह मल्हार में मेरे पिताजी स्वर्गीय श्री गुलाब सिंह ठाकुर जी को प्राप्त हुआ था , और दूसरी सिक्का जो तांबे से बना एकमात्र सिक्का था, वह 'प्रसन्नमात्र' जी का था। जब पिताजी ने अपने  शोधपत्र का वाचन किया। तब उसे देखने के लिए श्री वाकणकर जी और  स्वर्गीय  श्री शिवमंगल सिंंह  'सुमन' जी लालायित थे ।उन दोनों ने इस तरह के सिक्के होने के बात एक  सिरे से नकार दिए थे। पर जब 'अपीलक' की सिक्के को दिखाया तब 'प्रसन्नमात्र' की सिक्के की होने के बात भी दोनों ने मानकर, उसे दिखाने के लिए कहा तब पिताजी ने शर्त रखी कि आप दोनों को मल्हार आना पड़ेगा। और तब वहीं आप लोगों को 'प्रसन्नमात्र' की सिक्के के अलावा और भी बहुत कुछ दिखाएंगे । इस बात के लिए स्वर्गीय श्री पांडेय जी ने भी हामी भरी और तब दोनों ही विद्वान मल्हार आने को तैयार हो गए ।दुर्भाग्य से 'सुमन' जी का समय निर्धारित नहीं हो पा रहे थे ।इधर पत्राचार कर उन दोनों का अभिनंदन मल्हार में करने की तिथि निर्धारित की गई। पर विभिन्न कारणों से राष्ट्रकवि 'सुमन' जी मल्हार नहीं आ पाए। पर नवंबर 1987 में पुरातत्त्व पद्मश्री डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर जी मल्हार आए ।आप उज्जैन से रेल यात्रा कर पहले बिलासपुर पहुँचे ।वहाँ से संतोष भवन के मालिक श्री नारायण आहूजा जी के निजी वाहन से मल्हार आने का कार्यक्रम बना। बिलासपुर से मल्हार की यात्रा में आपके साथ स्वर्गीय श्री श्यामलाल चतुर्वेदी जी, अधिवक्ता श्री साधुलाल गुप्ता जी और आपके एक और अभिन्न मित्र श्री नंदकिशोर शुक्ला जी  एंबेसडर कार से मल्हार पहुँचे । मल्हार पहुँचकर सर्वप्रथम आप देऊर मंदिर गए । वहाँ की मूर्तियों की भव्यता से आप बहुत प्रभावित हुए थे ।देऊरमंदिर के खुले प्रांगण में स्थित भीम और कीचक प्रतिमाओं को देखकर ,भीम को आपने बलराम की मूर्ति होने की संभावना व्यक्त किया तो कीचक की  प्रतिमा को आपने अर्धनारीश्वर की प्रतिमा घोषित कर उनके दोनोंं कानों के  आभूषणों के अंतर और दोनों भौहों के मध्य तीसरे नेत्र को प्रमाण बताया। वहीं प्रांगण मेंं रखी प्रतिमाओं की विलक्षणता सेे भी प्रभावित हुए बिना रह नहीं सके। फिर आप टीन के शेड में रखे मूर्तियों को भी अध्ययन करते रहे और उनके बारे मेंं जानकारी देते रहे ।पिताजी श्री ठाकुर गुलाब सिंह जी मूर्तियों के बारे में बताते गए । इस दौरान ज्ञान का आदान-प्रदान होता रहा । उस वार्तालाप से  सर्वाधिक लाभ मुझे प्राप्त हुआ। मैं पिताजी के साथ अक्सर जातेे रहता था। वे मुझे पुरातत्त्व की बारीकियाँ समझाते रहते थे। और यहाँ तो बात पुरातत्त्व विज्ञान के महामना से सीधे ज्ञान प्राप्त करनेे की रही थी। लंबे समय बीतने के बाद  वहाँ से  सभी  पातालेश्वर मंदिर  पहुँचे। पिताजी तो उन्हीं के साथ कार में बैठ गए और मैं साइकिल से  थोड़ी देर में पातालेश्वर मंदिर पहुँच गया। वहाँ वे उस मंदिर को देखने लगे । जिसका उत्खनन जमींदारी काल में  मेरे परदादा स्वर्गीय ठाकुर श्री उत्तम सिंह के मार्गदर्शन में स्वर्गिय श्री बलदेव सिंह जी ने सन् १९१३ ईस्वी में करवाये थे । जहाँ के हनुमान चबूतरा के उत्खनन के दौरान  चबूतरे में उग आए, सेम्हल के विशाल वृक्ष को कटवा रहेे थे। वहाँ स्थित हनुमान जी ने पहलेे ही स्वप्न में आकर बता दिया था कि उत्खनन के मुखिया को भक्षण करूँगा। और स्वप्न की बात ,सत्य भी हुआ । दूसरी तरफ गिरने वाला  विशाल सेम्हल का पेड़ घूमकर , परदादा बलदेव सिंह के सीने पर गिर गया। और वही उनका देहांत हो गया  था। पर तब तक पातालेश्वर मंदिर की सौगात मल्हार वालोंं को मिल गया था। तभी से उस जगह हर महाशिवरात्रि से 15 दिवसीय मेले का आयोजन भी होता है । इन बातोंं को बताते हुए, मंदिर की बारीकियों को भी पिता जी   सभी अतिथियों को बताते रहे।  सभी मंत्रमुग्ध होकर पातालेश्वर मंदिर की कलात्मकता को देखते रहे। मंदिर को देखने के बाद सभी  परिसर में बने, टीन  के सेड में रखी मूर्तियों की बारीकियों से अवलोकन करते रहे । वे सभी मूर्तियों की  विलक्षणता से प्रभावित थे । उन लोगों को पिताजी बताते रहे । वाकणकर जी ने विष्णु जी की प्रतिमा  को भारत की सबसे प्राचीनतम विष्णु जी की प्रतिमा होने की  बात कही। उसी के सामने रखी प्रतिमा को ,जिसे हम स्कंदमाता के नाम से जानते थे ।जिसका नामकरण स्वर्गीय श्री रघुनंदन प्रसाद पांडेय जी ने अपनी पुस्तक मल्हार दर्शन में किया था, को उन्होंने अंबा की प्रतिमा होने की बात कहीं । वे ,सैकड़ों की संख्या में रखी प्रतिमाओं का, बारीकी के साथ अध्ययन करते रहे। समय बीतता जा रहा था ।
   वहीं पीपल पेड़ के  पास  से ही,  उन्होंने  मल्हार के मृदाकिला को देखने के बाद , वे सभी डिडिनेश्वरी मंदिर जाकर दर्शन किये।   तत्पश्चात्  सभी शासकीय प्राथमिक शाला, मल्हार पहुँचे। जहाँ उनके लिए सम्मान समारोह का आयोजन किया   गया था ।उनकी गाड़ी के पहुँचने से  पहले ही स्कूली बच्चेे दो कतारों में खड़े हो गए थे।  गाड़ी से उतरतेे ही  उनका तिलक लगाकर फिर आरती उतार कर स्वागत किया गया ।स्कूल के मध्य हाल में मंच बनाया गया था ।मंच पर पहुँचते तक बच्चे दोनों तरफ से फूल बरसाते रहे और करतल ध्वनि के साथ अतिथियों का स्वागत करते रहे।  यह मंच स्कूली टेबल कुर्सियों से ही बनाया गया था मुख्य मंच पर श्री वाकणकर जी के साथ श्री नंदकिशोर शुक्ला जी विराजमान हुए एवं उनके दाहिने तरफ  स्वर्गीय  श्री  श्यामलाल चतुर्वेदी जी बैठे थेे।  अन्य कुर्सियों में श्री नारायण आहूजा जी, अधिवक्ता श्री साधुलाल गुप्ता जी ,श्री रघुनंदन साव जी, स्वर्गीय छेदीलाल पांडेेय जी, स्वर्गीय श्री गुलाब सिंह  ठाकुर जी, श्री  शंकर प्रसाद चौबेे जी, स्व०श्री रघुनंदन प्रसाद पांडेय जी ,श्री राम प्रताप सिंह 'विमल' जी ,श्री ओम प्रकाश पांडेय जी एवं  शिक्षकवृंद  उपस्थित थे । श्री वाकणकर जी का सम्मान तिलक लगाकर मल्हार के मालगुजार बड़े राजा श्री रघुनंदन प्रसाद साव जी ने किया तथा साल और श्रीफल भेंट  कर उन्हें सम्मानित किया । तत्पश्चात् अन्य आगंतुक अतिथियों का माल्यार्पण और पुष्पगुच्छ से स्वागत किया गया । मंच का संचालन अंचल केे प्रसिद्ध कवि और  शिक्षक श्री राम प्रताप सिंह 'विमल' जी कर रहे थे । उन्होंने सम्मान पत्र का वाचन कर उन्हें वाकणकर जी को भेंट किया । जिस समय सम्मान पत्र  का वाचन किया जा रहा था , उस समय मंच पर बैठेे- बैठे ही वाकणकर  जी ने स्वर्गीय पंडित छेदीलाल पांडेय जी की छायाचित्र बनाकर उन्हेंं भेंट किया। यह उनकी कला के प्रति प्रेम को  प्रदर्शित करता है ।  उनकी इस प्रतिभा से मैं बहुत प्रभावित हुआ और मैंने स्वतः से ही चित्रकला सीखना प्रारंभ किया । आज जो भी कला  के प्रति मुझमें रुची है ,उनके पीछे यही वह पल है ।वही मेरे प्रेरणा स्रोत भी बने और शैल चित्रों की खोज में उन्हीं का आशीर्वाद भी फलित हुआ है ।अतिथियों ने  अलग -अलग  भाषण  दियेे।   सबसे अंत में  वाकणकर जी  ने सभा को  संबोधित किया । उन्होंने कहा कि-  मल्हार में अध्ययन के लिए बहुत कुछ है। यहाँ आकर मुझे प्रसन्नता हो रही है । मैंने  मल्हार के बारे में जितना सुना था,  उनसे बढ़कर ही पाया।  यहाँ को एक दिन में देखना संभव नहीं है। मैं नन्दमहल परघनिया बाबा और जैतपुर के चैत्य विहार को भी  देखना चाहता था, पर समयाभाव  के  कारण नहीं देख पाया । इसका मुझे  बहुत दुख हो रहा है। मेरे पास  अभी समय कम है। शीघ्र ही समय निकालकर दो-चार दिनों के लिए मल्हार आऊँगा।  तब मल्हार के  मृदाकिला , जैतपुर के  चैत्यविहार ,नन्द महल  इत्यादि  जगहों को  देखूँगा  ।आप लोगों के द्वारा की गई  मेरे इस अभिनंदन से मैं बहुतअभिभूत हूँ। मैं  खासकर  पांडेय जी  और ठाकुर गुलाब सिंह जी का  विशेष आभारी हूँ।  जिन्होंने आग्रह कर मुझे  मल्हार आमंत्रित किया। अब मैं अपनी इच्छा से अपना पर्याप्त समय निकालकर दोबारा मल्हार अवश्य ही आऊँगा। अभी वापस लौटना भी है उज्जैन। समय कम है। आप लोगोंं ने जो इतना प्यार और सम्मान दिया ,उसका मैं आभारी हूँ।  जल्द ही आप सबसे पुनः भेंट होगी ।अभी के लिए बस इतना ही ।जय मांँ भारती। आप सबका एक बार पुनःधन्यवाद।
     मंच के एक तरफ श्री संजीव पांडेय जी तो दूसरी तरफ मैं भी खड़े रहकर मंच की व्यवस्था सम्हाल रहे थे ।
    सम्मान समारोह के बाद वाकणकर जी अतिथियों के साथ स्वर्गीय ठाकुर गुलाब सिंह जी के निजी संग्रहालय को देखने उनके घर गए । जहाँ मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था थी। जहाँ उनके विशेष आग्रह पर चीला और सील में पिसी हुई टमाटर की चटनी तथा लहसुन मिर्ची की चटनी बनाया गया था। यह उनकी सादगी और आंचलिक संस्कृति के प्रति प्रेम को प्रदर्शित करता है ,तो सादगी और सहजता को भी। भोजन के बाद  पिताजी ने उन्हें 'अपीलक' की तथा 'प्रशन्नमात्र' जी के तांबे से निर्मित एकमात्र सिक्के को दिखाये । फिर मल्हार से प्राप्त  मृदभांडों, मूर्तियाँ, शिल्प, मनके, सील, सीलिंग , तामपत्र आदि पूरावैभवों का अवलोकन कराया। फिर वहाँ से वे पांडेय जी के घर जाकर उनके इस संग्रह को देखते हुए जलपान किए। वहाँ उन्होंने  खासकर ताम्रपत्रों की सेट  और व्याघ्रराज की शिलालेख का  अवलोकन किया ।
      शाम होने वाली थी ,वापस भी लौटना था। अतः सभी अतिथि शीघ्रता से पांडेय जी के घर से बाहर निकल कर स्कूल के पास पहुँचे। अतिथियों के विदाई के अवसर पर बड़े पिताजी स्वर्गीय श्रीलालजी सिंह ठाकुर  ने मल्हार की एक प्राचीन मूर्ति अतिथियों को  भेंट किया । फिर वे सभी विदाई लेते हुए कार से बिलासपुर और फिर उज्जैन लौट गए। मल्हार में उनकी यादों को अपने मन और हृदय में संजोए, हम लोग उनके पुनः लौटने की प्रतीक्षा करते रहे ।
        इसी दौरान शोधपत्र वाचन करने सिंगापुर गए हुए थे ।वहाँ वे सिंगापुर के होटल पैन पैसेफिक के बालकनी से, समुद्र किनारे को देखते हुए बैठे-बैठे रेखा चित्र बना रहे थे ।उसी दौरान  हृदयाघात से  उनकी मृत्यु 4अप्रैल 1988 को  हो गया।  जब उनकी देहांत की खबर , समाचार पत्रों के माध्यम से मल्हार के लोगों को पता चला तब जिस स्कूल में उन्हें सम्मानित किया गया था वहाँ 2 मिनट की मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई ।शाम को मल्हार विकास मंच के अध्यक्ष श्री संजीव पांडेय और मेरे द्वारा उनकी याद में दीपक जलाकर, वहाँ भी 2 मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई ।आज भी हम मल्हार वासी उनके आगमन और मल्हार प्रवास को याद करते हैं ।उनके जन्म शताब्दी वर्ष पर   समस्त मल्हार वासियों की तरफ से उन्हें अश्रुपूरित विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं ।
                            हरि सिंह क्षत्री, (मल्हार वाले)
                                        प्रांत  संयोजक ,
                        कला धरोहर विधा संस्कार भारती , छत्तीसगढ़ 
                                               495 677,                                                                     मो.-9827189845

गुरुवार, 5 जनवरी 2023

कैसे रोका जा सकता है अवैध कब्जा और अवैध घुसपैठ?

भारत में अवैध कब्जा, घुसपैठ या अनैतिक काम करने/करवाने के मूल में हैं, हमारे राजनीतिक दल । जो उनके मत के लिए ऐसे लोगों को बढ़ावा देकर सपोर्ट में खड़े हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में भारत देश में अवैध घुसपैठ और कब्जा को रोका ही नहीं जा सकता है।  कुछ लोग इसी कमजोरी का फायदा उठाकर, संविधान प्रदत्त शक्ति का गलत उपयोग करते हैं।  दिल्ली हो जो वर्तमान में उत्तराखंड के हल्द्वानी, ऐसे ही अवैध कब्जाकर और दूसरे देशों से आए हुए घुसपैठियों के द्वारा भारत में पहले अवैध रूप से घुसपैठ किया जाता है, फिर कहीं भी जाकर के झुग्गी झोपड़ी बनाकर के रहते हैं। घुस देकर मतदाता परिचयपत्र और आधार कार्ड बनवा लेते हैं। यहाँ के सरकारी भूमि पर कब्जा करके हमारे भारत के लोगों की जीविकोपार्जन का अधिकार , रोजगार का अधिकार भी छीन लेते हैं।  ऐसी स्थिति में माननीय सर्वोच्च न्यायालय और माननीय मुख्य चुनाव आयुक्त को निर्णय लेना होगा कि भारत में चाहे जो कोई भी हो अवैध रूप से कहीं भी निवास कर रहे हैं। उनका मतदाता परिचय पत्र और आधार कार्ड साथ ही राशन कार्ड नहीं बनने देना चाहिए और यदि बन भी गया है तो उन सबको तत्काल प्रभाव से निरस्त कर देना चाहिए। यदि कोई भी राजनीतिक दल इस प्रकार के लोगों को मदद पहुंँचाते हैं या उनके पक्ष में खड़े होते हैं ऐसे राजनीतिक दलों की मान्यता रद्द करके उन्हें हमेशा के लिए चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित कर उनकी दल की मान्यता रद्द कर देना चाहिए । यदि व्यक्तिगत रुप से भी कोई व्यक्ति ऐसे लोगों के पक्ष में खड़े होते हैं  तो उनकी भी किसी भी प्रकार की चुनाव में खड़ा होने की , मतदान करने की अधिकार एवं नागरिकता खत्म कर उनका संपूर्ण अधिकार छीन लेने चाहिए ।यह केवल मुख्य चुनाव आयुक्त ही कर सकते हैं। इस प्रकार से अगर भारत में संविधान संशोधन होता है तो भारत में अवैध घुसपैठियों को रोका जा सकता है और इस दिशा में माननीय राष्ट्रपति , माननीय सर्वोच्च न्यायालय और मुख्य चुनाव आयुक्त  के दिशा निर्देश जारी करना चाहिए। या सदन में नया कानून बनाना चाहिए।