रविवार, 1 फ़रवरी 2026

मैं रामगढ़ बोल रहा हूॅं।

        कल माघ सुदी शुक्लपक्ष की त्रयोदशी तिथि थी । संस्कार भारती के कला धरोहर विभाग द्वारा इस तिथि को सृष्टि के शिल्पकार , निर्माण एवं सृजन के देवता देवशिल्पी भगवान श्री विश्वकर्मा की जयंती मनाने का निर्णय लिया था। इसके बाद इस वर्ष अंग्रेजी माह  के 31 जनवरी को माघ शुक्ल 13/14  दोनों ही तिथि एक साथ पड़ रही है। जैसे कि निश्चित हुआ था कि इस तिथि को हमें भगवान श्री विश्वकर्मा जी के जयंती दिवस समारोह के रूप में मनाया जाना है। हमें चाहिए कि अपने अपने प्रांतों में कोई एक स्थान पर या जहां जहां हमारे कार्यकर्ता हैं। अपने अपने प्रांतों में स्थित स्थापत्य कला और शैली को ध्यान में रखते हुए एक घंटे का आयोजन किया जाना चाहिए। जिसमें अपने क्षेत्र के प्राचीन मंदिर, भवन या अन्य प्राचीन धरोहर में जाकर कोई न कोई कार्यक्रम आयोजित किया जाना चाहिए जिसका फोटो ग्राफी /विडियो ग्राफी कर समूह में पोस्ट किया जाना चाहिए। इससे हम अपने क्षेत्रों की प्राचीन धरोहरों को सीधे ही विश्वकर्मा भगवान से जोड़ सकते हैं। हो सके तो वर्तमान में जो कलाकार कार्यरत हैं उन्हें बुलाकर साल और श्रीफल भेंटकर सम्मानित भी किया जा सकता है। इससे हम लोगों तक सीधे ही पहुंच सकते हैं।  इसे ही ध्यान में रखकर छत्तीसगढ़ प्रांत कला धरोहर विभाग द्वारा अंबिकापुर जिले से 45 किलोमीटर मीटर दूर स्थित विकासखंड उदयपुर से तीन किलोमीटर दूर स्थित रामगढ़ पहाड़ी में स्थित प्राचीन नाट्यशाला , जोगीमारा गुफा और राममंदिर में स्थापित मूर्तियों की जानकारी जन-मानस को देने का निर्णय लिया। जिससे स्थानीय लोगों और पर्यटकों को इस क्षेत्र की प्राचीनता और महत्ता को धरोहर यात्रा और  धरोहर वार्ता के अंतर्गत कार्यक्रम को सफलतापूर्वक सम्पन्न किया गया।
                      छत्तीसगढ़ राज्य के अंबिकापुर जिले के उदयपुर विकासखंड अंतर्गत पुटा गाँव में रामगढ़ पहाड़ियों के उत्तरी भाग में स्थित प्राचीन गुफा स्मारक हैं । तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से पहली शताब्दी ईसा पूर्व के बीच निर्मित सीता बेंगरा और जोगीमारा गुफा के अलावा भी यहां अनेक गुफाएँ  हैं। जिनमें से कुछ प्राकृतिक रूप से निर्मित हैं तो कुछ मानवीय और तराशें हुए हैं। इन गुफाओं में से दो गुफाओं में ब्राम्ही लिपि और मगधी भाषा में लिखे गए कुछ अभिलेख हैं। कुछ विद्वानों का मानना ​​है कि सीताबेंगरा गुफा भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे पुराना प्रदर्शन रंगमंच है, जबकि अन्य इस बात पर सवाल उठाते हैं कि क्या यह वास्तव में एक रंगमंच था ? वे सुझाव देते हैं कि यह किसी प्राचीन व्यापार मार्ग पर विश्राम स्थल रहा होगा।  जोगीमारा गुफा के शिलालेख पर भी विद्वानों में विवाद है, कुछ इसे एक लड़की और लड़के द्वारा प्रेम-चित्रण के रूप में व्याख्यायित करते हैं तो दूसरा इसे एक नर्तकी और एक पुरुष मूर्तिकार या चित्रकार द्वारा दूसरों की सेवा के लिए दो गुफाओं का संयुक्त रूप से निर्माण करने के रूप में व्याख्यायित करते हैं । जहां जोगीमारा गुहा शिलालेख में "देवदासी" शब्द का सबसे पुराना ज्ञात अभिलेख भी माना जाता है। प्राचीन काल में देवदासी प्रथा का प्रचलन था। जो किसी मंदिर में भगवान के लिए समर्पित मानी जाती थी। लेकिन इस क्षेत्र में उतना प्राचीन मंदिर प्राप्त नहीं होता है। 
ये गुफाएँ आंशिक रूप से प्राकृतिक और आंशिक रूप से नक्काशीदार हैं। क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार, इनका संबंध रामायण महाकाव्य से है , जहाँ सीता, राम और लक्ष्मण अपने वनवास की शुरुआत में आए थे। यहाँ पाए गए सबसे पुराने अवशेष मुझे मौर्यकालीन पक्की मिट्टी की बनी महिला की सिर और  वक्षस्थल तक का भाग काले संगमरमर के बने पात्रों के अवशेष बौद्ध भिक्षुओं द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले धातु से बनी भिक्षापात्र टुकड़े और अन्य धातु खंड के अलावा भी बहुत कुछ मिला है। पहाड़ी  के ऊपर मंदिर में स्थापित कलाकृतियाँ रामायण से संबंधित हैं । जिसमें भगवान  श्री राम,  हनुमान, सीता  शेषनाग रुपी लक्ष्मण  और चतुर्भुजी भगवान् श्री विष्णु जी अपने वाहन गरुड़ के साथ काले ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित है। मूर्तिकला के आधार पर ये सभी संभवतः 8 वीं से 12वीं शताब्दी के बीच की कलचुरी कला की तरह प्रतीत होते हैं।

        जोगीमारा और सीताबेंगरा गुफाएं भारत में पाई जाने वाली अन्य सभी प्राचीन गुफाओं से बनावट और सजावट दोनों में भिन्न हैं। अन्य स्थलों में हमेशा धार्मिक प्रतीक और चिह्न पाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, बौद्ध गुफाओं में स्तूप या उससे संबंधित प्रतीक होते हैं, और बाद की गुफाओं में बुद्ध से संबंधित नक्काशी और चित्र जोड़े गए हैं। जैन गुफाओं में  तीर्थंकरों से संबंधित प्रतीक या चिह्न होते हैं । किसी भी बौद्ध या जैन गुफा में पाए जाने वाले शिलालेख या चित्रों में हमेशा बुद्ध या तीर्थंकर का उल्लेख होता है। सीताबेंगरा गुफा के बाहर दाहिने तरफ दो पदचिह्न  बनाए गए हैं ।

जिसके आधार पर जैनी इसे जैन गुफा मानते हैं। जबकि शिलालेख काव्यात्मक हैं। 

          

       

सीताबेंगरा गुफा आंशिक रूप से तराशे गए मंच जैसी दिखती है। इसके सामने अर्धगोलाकार चट्टानों से तराशी गई पत्थर की बेंचों की दो पंक्तियाँ हैं। इस स्थल की तस्वीर खींचने वाले बेगलर के अनुसार, ये गुफा में प्रवेश करने के लिए सीढ़ियाँ रही होंगी। गुफा के बाईं ओर पहले से ही सीढ़ियों का एक और सेट बना हुआ था, इसलिए इन लंबे हिस्सों को खाली जगह के साथ काटना व्यर्थ लगता है। ब्लोच का कहना है कि ये बेंचें लोगों के बैठने और प्रदर्शन मंच देखने के लिए रही होंगी। इन पत्थर की बेंचों पर "लगभग 50 या उससे अधिक" लोग आसानी से बैठ सकते थे।  सुरक्षित पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए, स्थानीय अधिकारियों ने सीताबेंगरा गुफा के पास सीढ़ियाँ, देखने के लिए चबूतरे और अन्य सुविधाएँ बनाई हैं।

             सीताबेंगरा गुफा 22°53'53" उत्तरी अक्षांश और 82°55'46" पूर्वी  देशांतर समुद्र तल से 1992.59 फिट की ऊंचाई स्थित एक आयताकार  गुफा है, जो लगभग 46.5 फीट चौड़ी और 24 फीट लंबी, जिसकी ऊॅंचाई 6 से 6.5 फीट के बीच है। अंदर, किनारों पर 7 फीट चौड़ी और 2.5 फीट ऊंची चट्टान से बनी चबुतरा है जो थोड़ी ढलान वाली है। संभवतः ये अभिनेताओं के लिए बैठने की जगह और मंच का हिस्सा रहे होंगे। इसके अलावा, गुफा के बाहर की ओर खुलने के ठीक आसपास पत्थर में कप्युल्स बनाए गए हैं ।  इन छिद्रों का उपयोग यहां  अनेक तरह से किया जाता रहा होगा। सबसे बड़ा उपयोग इन छिद्रों का उपयोग अनाज कुटने पीसने के लिए किया जाता रहा होगा।  दूसरा सर्दियों में जब कोई रात भर अंदर रहता हो तो गुफा के प्रवेश द्वार को ढकने के लिए इनका उपयोग किया जाता रहा होगा।  गुफा के अंदर से दाहिने ओर गुफा के  अंदर से बाहर पानी निकालने के लिए एक  अंदरभूमि जल निकासी के लिए नाली निर्माण किया गया था।  यहीं गुफा के छत में पर्दे  लगाने के लिए गुफा के छत में तीन कतारों में छोटे-छोटे छीद्र बनाए गए हैं, संभवतः इन छिद्रों को पर्दें  लगाने के लिए किया जाता रहा होगा। सामने के हिस्से को भी चट्टान काटकर और तराशकर एक मंच की तरह बनाया गया है, जो अनावश्यक और असामान्य होता, अगर यह केवल भिक्षुओं या व्यापारियों के विश्राम का स्थान होता। संभावना यह भी है कि सामने के इस भाग में लकड़ी की सहायता से मंच भी बनाया जाता रहा होगा जिसे मजबूती देने के लिए इसे चारों से स्थायी रुप से गहरे गड्ढे खोदे गए जिससे हर मंचन में एकरुपता बनी रहे।  अन्य दूसरे समय में यह वर्षा जल से इस सीताबेंगरा को  बचाने के लिए काम में आता रहा होगा।

         विद्वान सीताबेंगरा गुफा को भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे पुराना ज्ञात प्रदर्शन मंच मानते हैं, जिसका काल 300 ईसा पूर्व से 100 ईसा पूर्व के बीच है।  यह वर्गीकरण मुख्य रूप से गुफा की वास्तुकला, प्राचीन ब्राह्मी लिपि में पाए गए काव्यात्मक शिलालेखों और भित्ति चित्रों पर आधारित है। जिसका अनुवाद इस प्रकार है -

 हृदय को देदीप्यमान करते हैं स्वभाव से महान ऐसे कविगण रात्रि में वासंती से दूर हास्य एवं विनोद में अपने को भुलाकर चमेली के फूलों की माला का आलिंगन करता है। सीताबेंगरा गुफा में कटी हुई दीवार के बाहरी ओर ऊपरी भाग के पास ब्राह्मी लिपि में दो पंक्तियों का शिलालेख है। सीताबेंगरा शिलालेख का अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है: 

पंक्ति 1 स्वभाव से आदरणीय कवि हृदय को प्रज्वलित करते हैं, जो (.... खो गए ....)
पंक्ति 2 बसंत की पूर्णिमा के झूले उत्सव में, जब मौज-मस्ती और संगीत की भरमार होती है, लोग इस प्रकार (.... खो गए ...) चमेली के फूलों से घने बांधते हैं।

सीताबेंगरा गुफा के दाहिने तरफ थोड़ी ही दूर पर जोगीमारा नामक गुफा स्थित है।  यह गुफा लगभग 15 फीट लंबा और 12 फीट चौड़ा है, और इसकी आंतरिक ऊंचाई 7 फीट से थोड़ा अधिक है। 1874 में बेग्लर द्वारा किए गए एक पुरातात्विक सर्वेक्षण के अनुसार, यह एक प्राकृतिक गुफा भी है, जिसे चढ़ने, अंदर कदम रखने, बैठने और आराम करने की सुविधा के लिए अनुकूलित और तराशा गया है। यह गुफा 22°53'53" उत्तरी अक्षांश और 82°55'46" पूर्वी देशांतर पर समुद्र तल से 1983.07 फिट की ऊंचाई पर स्थित है।  इस गुफा के छत को अच्छे से घिसकर पहले चिकना किया गया है। फिर गोबर से लेप किया गया प्रतीत होता है। उसके बाद पहाड़ी के ऊपर स्थित चन्दन माटी नामक जगह से सफेद मिट्टी लाकर छत पर सफेदी किये जाने का प्रमाण दे  रहा है। उसके बाद फिर कोयले से रेखांकन किया गया होगा। तत्पश्चात् आसपास मिलने वाली गेरुवे मिट्टी से रंग भरे जाने का प्रमाण मिले हैं। यहां अनेक प्रकार के भित्तिचित्र मिले हैं। यहां बने हुए एक चित्र कृष्ण कथा को दर्शाता प्रतीत होता है। जिसमें भगवान श्री कृष्ण नदी में निर्वस्त्र स्नान करने वाली गोपियों के वस्त्र हरण की कथा को प्रदर्शित करते हुए आभास कराता है। 

       

             जोगीमारा गुफा में पाँच पंक्तियों का एक शिलालेख है, जो ब्राह्मी लिपि और मगधी भाषा (पाली से पुरानी एक प्राकृत भाषा, और भारत की भोजपुरी और मैथिली भाषाओं से संबंधित) में है।


जोगीमारा गुफा का शिलालेख, ब्राह्मी लिपि, छत्तीसगढ़ (300-100 ईसा पूर्व)।
अनुवाद 1

पंक्ति 1 सुतुनका नाम से,
पंक्ति 2 एक देवदासी,
पंक्ति 3 सुतुनाका नाम से एक देवदासी,
पंक्ति 4 एक उत्कृष्ट युवक उससे प्रेम करता था,
पंक्ति 5 देवदिन्न नाम से, मूर्तिकला में कुशल (...)

अनुवाद 2

पंक्ति 1 सुतुनुका नाम की
एक महिला पंक्ति 2 एक देवदासी
पंक्ति 3 सुतुनाका नाम की एक देवदासी
पंक्ति 4 लड़कियों के लिए यह विश्राम स्थल बनवाया
पंक्ति 5 [साथ में] देवदिन्न नाम की एक महिला, चित्रकारी में कुशल (...)

तीसरा अनुवाद पहले अनुवाद के समान है, सिवाय इसके कि इसमें चौथी पंक्ति में एक शब्द को संशोधित किया गया है। "एक उत्कृष्ट व्यक्ति" के स्थान पर, यह "वाराणसी के एक युवक ने उससे प्रेम किया" बन जाता है। यह तीसरा अनुवाद ही कुछ विद्वानों को इस सिद्धांत की ओर ले गया है कि रामगढ़ पहाड़ियाँ यात्रियों के लिए एक प्राचीन विश्राम स्थल थीं, क्योंकि कलाकार प्राचीन हिंदू शहर वाराणसी से आया था। 

             जोगीमारा गुफा में भित्ति चित्रों के आठ पैनल हैं, जिनमें से अधिकांश बुरी तरह से फीके पड़ गए हैं। इन्हें मूल रूप से तीन रंगों में और चित्रकला के सबसे पुराने ज्ञात भारतीय ग्रंथों जैसे चित्रसूत्र और चित्रलक्षण में सिखाई गई विधियों की तुलना में अधिक अपरिष्कृत विधि से बनाया गया था। मूल चित्रों को पुनर्स्थापित और बेहतर बनाने के इरादे से किसी ने दोबारा रंगा था। यह प्रयास संभवतः पहली सहस्राब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध में हुआ था।   भित्तिचित्र पैनल क्षतिग्रस्त हैं। पैनलों की कुल संख्या और वे क्या दर्शाते हैं, यह व्याख्या के अधीन है। विन्सेंट स्मिथ के अनुसार मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं: 

पैनल 1: नृत्य करती लड़कियाँ, बैठी हुई नर्तकी के चारों ओर संगीतकार

  • पैनल 2: कई पुरुष आकृतियाँ, हाथी‌। 
  • तीसरा पैनल: कुछ लोग पेड़ के नीचे बैठे हैं।
  • पैनल 4: एक जोड़ा लिली के फूल पर नाच रहा है।
  • पैनल 5: एक गुड़िया या लड़की खेल रही है।
  • पैनल 6: पेड़ की शाखा पर एक लड़का, दूसरी शाखा पर एक पक्षी, पेड़ के चारों ओर जमीन पर नग्न लड़कियां ।
  • पैनल 7: हाथियों का जुलूस। 
  • पैनल 8: फूलों के पौधों के साथ रथों, घोड़ों और कुछ पहियों का जुलूस।

         सीताबेंगरा गुफा से लगभग 2-3 किलोमीटर दूर रामगढ़ पहाड़ी का सर्वोच्च शिखर है। अब यहां तराई भाग तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क बनाई गई है। तराई में पहूंचकर ऊपर जाने के लिए पहले पत्थर की सीढ़ियों का निर्माण किया गया था जिसे अब सीमेंट से पक्की सीढ़ी बनाए गए हैं जो अनेक जगह अपने मूल रूप में देखा जा सकता है। पहाड़ी के मध्य भाग में सिंह द्वार बनाया गया था। जो अब आधी ही  बची हुई है। आधी भाग नीचे टूटकर गिर गया है। 

सिंहद्वार  22°53'54" उत्तरी अक्षांश और 82°55'49" पूर्वी देशांतर पर समुद्र तल से 2098.88 फिट की ऊंचाई पर स्थित है। अपने  यौवनावस्था में यह भव्य रूप में रहा होगा। यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। हालांकि यह द्वार ज्यादा अलंकृत नहीं है लेकिन इससे इसकी महत्ता कम नहीं हो जाती है।  यह द्वार गिरिदुर्ग को बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित रखने के लिए बनाया गया है। इन खड़ी चिड़ियों से ऊपर चढ़ते समय सांसें फूलने लगती हैं। हम शारीरिक रूप से कमजोर होने लगते हैं। जिसके कारण ऊपर बैठे एक सैनिक नीचे से ऊपर चढ़ते हुए सैकड़ों सैनिकों पर भारी पड़ता है। यहां ऊपर में कम से कम चार परत की सुरक्षा व्यवस्था होने के प्रमाण मिले हैं। उसके बाद भी अगर खतरा हुआ तो वहां से सुरक्षित निकलने के लिए भी गोपनीय मार्ग रक्षित है। 

         ऊपर में साल भर स्वच्छ जल प्रबंधन के लिए सीताकुंड है। पहाड़ी में कुछ गोपनीय गुफाओं का भी निर्माण किया गया था। जो सुरक्षा कारणों से बनाया गया था। समयानुसार इनका उपयोग ध्यान और साधना के लिए भी किया जाता रहा है। इसका विस्तृत क्षेत्र अनेक रहस्यों से भरा हुआ है। 

           कालांतर में यहां के शिखर पर देवस्थल भी बनाए गए। जिसे राममंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर 22°53'24" उत्तरी अक्षांश और 82°54'19" पूर्वी देशांतर पर समुद्र तल से 2958.6 फिट की ऊंचाई पर स्थित है। जिसमें भगवान श्री राम, माता सीता, भाई लक्ष्मण के अलावा चतुर्भुजी भगवान् श्री विष्णु जी के काले  रंग की ग्रेनाइट पत्थर की प्रतिमा स्थापित हैं।  जो अत्यंत ही विलक्षण हैं। 

       

बुधवार, 14 जनवरी 2026

तख्तापलट और देशों में उलटफेर के पीछे एकमात्र चेहरा - अमेरिका

तख्तापलट और  देशों में उलटफेर के पीछे एकमात्र चेहरा - अमेरिका । 
        यह पंक्ति विचारणीय और सोचनीय है। गत वर्ष दुनिया ने देखा कि कैसे जेन-जी सड़कों पर उतर आई। धीरे धीरे वह एक आंदोलन का रुप लेता गया। यह आंदोलन क्या वास्तव में उस देश का आंदोलन स्वस्फूर्त आंदोलन माना जा सकता है ? या फिर किसी बाहरी ताकतों द्वारा दी गई हवा की झोंकों के कारण वह आंदोलन जन्म लेती गई। पहले पहल तो यह उस देश का ही स्वस्फूर्त आंदोलन लगता है। लेकिन जब गहराई से अध्ययन करें तो पता चलता है कि इन सबके पीछे अमेरिका और उनका डीपस्टेट जिम्मेदार हैं। जिसे पीछे से मदद करता है यूरोपीय संघ। 
           सबसे पहले नेपाल में यह आंदोलन प्रकाश में आया। कुछ दिनों के आंदोलन के बाद उस देश की सत्ता बदल गई। जिससे पीठ के पीछे रहकर दूसरे के कंधे पर बंदूक रखकर चलाने वाले को एक रास्ता मिल गया । जिसमें उनके देश को बिना सैनिक हस्तक्षेप के ही अपने विचारों के अनुकूल सरकार बनती दिखीं। इस कारण उनके काले मंसुबों को एक नया हथियार मिल गया। ऐसे में उस देश के ही लोगों द्वारा अपने ही देश की सरकारी संपत्तियों को नुक्सान पहुंचाकर क्या साबित करना चाहते हैं ? जरा विचारें। 
             फिर हमारे ही एक और पड़ोसी देश बांग्लादेश में एक और जेन जी आंदोलन ने जन्म लिया ।  कहने को तो यह एक जेन जी आंदोलन माना गया। लेकिन यह भी अमेरिका के ही डीपस्टेट का ही रचा गया षड्यंत्र है। धीरे धीरे यह आंदोलन उग्र रूप लेता गया और उस आंदोलन ने उस देश की चुनी हुई सरकार को ही उखाड़ फेका। और फिर वह हुआ जिसकी कल्पना किसी ने नहीं किया था। वहां तथाकथित नोबेल शांति पुरस्कार विजेता एक सत्तालोभी व्यक्ति वहां के प्रमुख मनोनीत हुआ। उसके नेतृत्व में अल्पसंख्यकों के ऊपर ऐसा अत्याचार  होने लगा जिसके बारे में सोचकर ही घिन आती है। क्या ऐसे लोगों के साथ सटे साठ्यम् समाचरेत् ,जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए ?  
                    इस आंदोलन के भी पीछे उसी अमेरिका का हाथ है। इसके बाद तो जैसा जेन जी एक वरदान के बदले अभिशाप नज़र आने लगा। वह युवा जो देश का भाग्य बदल सकता था वह अपने ही देश के लिए भस्मासुर साबित होने लगा। उसके पास कुछ करने की ताकत और कला दोनों ही विद्यमान होती है। नहीं होती है तो एक दिशा। उसी दिशा भ्रम का फायदा ऐसे अमीर देश उठाते हैं। 
             बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद वहां तो लगातार अल्पसंख्यक समुदाय पर बिना कारण ही अत्याचार होने लगी। जिसमें भी सबसे ज्यादा अत्याचार तो हिन्दू अल्पसंख्यक समुदाय पर हो रहा है। इसके पीछे कारण भी विश्व भर में एक भी हिन्दू राष्ट्र का न होना। यदि कोई हिन्दू राष्ट्र होता तो वह राष्ट्र उनके हितों के लिए लड़ाई लड़ता। वहां के हिंदू विश्व भर की ताकतों की ओर अपने हितों और प्राणों की रक्षा के लिए आशा भरी निगाहों से देख रही है । लेकिन कहीं भी आशा की किरणें उन्हें नजर नहीं आती हैं। भारत और उनके नेतृत्व के ऊपर उनकी नजरें ज्यादा आशान्वित हैं। 
            संघ परिवार और संत समाज की ओर वे ज्यादा भरोसा रखते हैं। संत समाज के पास धर्म ध्वजा और धर्म गदा (दंड)
        दोनों ही होता है। पंडित धीरेन्द्र शास्त्री जी भी तो जेन जी में ही आते हैं। उनके पास अपनी दिशा है। वे विवेकवान हैं। युवाओं को सही दिशा भी दे रहे हैं। भारत के युवा पीढ़ी को उनके द्वारा दिखाए जा रहे दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता है। 
           एक समय में ऐसा भी नेता था जिसके एक आवाज में देश रुक जाती थी। सरकारें उनके सामने नतमस्तक हो जाती थी। उस नेता का नाम है स्वर्गीय श्री बालासाहेब ठाकरे जी।   उन्होंने कहा था कि अगर पाकिस्तान या किसी भी अन्य मूल्कों में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर अत्याचार होती है तो मक्का की उड़ान मुंबई से उड़ पायेगी। उस उद्घोष का प्रभाव भी दिखा।  
        ब्रिटैनिका के अनुसार, ठाकरे की राजनीति ने आक्रामक हिंदुत्व और राष्ट्रीय गौरव को मिलाकर एक ऐसा मंच बनाया, जिसने विविध समुदायों को आस्था और आत्मसम्मान के साझा सूत्र में पिरोया। उनकी आवाज ने लाखों लोगों को एकजुट किया, जो एक नई पहचान की तलाश में थे।
        अब अमेरिका और वहां के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने कुटिल नीति और षड्यंत्रों  में सफल होने के बाद इतना दुस्साहसी हो गया है कि दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उनके घर से ही उठवा लिया। अब सीधे ही वह ग्रीन लैंड और ईरान जैसे देशों के अलावा उन सभी देशों को धमकाने हुए देखा जा सकता है। उसने जिसकी लाठी उसकी भैंस की कहावत को चरितार्थ करना चालू कर दिया है। 
            भारत में भी उन्होंने षड्यंत्र रचा, यहां भी उनके डीपस्टेट के मोहरे काम कर रहे हैं। यहां भी सत्तालोभी व्यक्तियों और दलों  का एक बड़ा समूह उसी दिशा में काम कर रही है। यहां भी विपक्षी दलों और नेताओं के द्वारा यहां के जेन जी को खुले मंचों से भड़काया जाता है। देश को बहुत ही सावधान रहने की आवश्यकता है। ऐसे षड्यंत्रकारी ताकतों से सावधान रहते हुए हमें अपने युवा पीढ़ी को संस्कारवान  बनाने की दिशा में काम करने की आवश्यकता है। भारत में भी एक वर्ग ऐसा भी है जिसके पीछे सारे लोग गोलबंद हो जाते हैं।
             यह तो अच्छा है कि इस समय हमारे देश में एक बहुत ही अच्छा नेतृत्व विद्यमान है। वह अर्जुन के तरह ही सारे अस्त्र-शस्त्रों  की तोड़ जानते हैं। उनके रथ को सारथी की तरह दिशा देने का काम कर रही है कृष्ण रुपी संघ की नेतृत्व। जो अर्जून के रथ को भटकने नहीं दे रहा है।
             यह हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री जी का कुशल नेतृत्व ही है कि विपक्षी दलों और विदेशी ताकतों का कुछ दाल नहीं गल रहा है। हम सब राष्ट्रभक्त ताकतों को कुटिल और दुष्ट ताकतों से बचकर रहने की आवश्यकता है। हमें बहुत सतर्क रहने की आवश्यकता है।

बुधवार, 5 नवंबर 2025

दुर्गा सप्तशती पाठ बीज मंत्र सहित

#श्रीदुर्गासप्तशती_साधना!! 
           ॐ श्री गणेशाय नमः {11बार}
ॐ ह्रौं जुं सः सिद्ध गुरूवे नमः {11बार}
ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षणि ठः ठः स्वाहा {13बार}          
{प्राचीन शिवयोग परंपरा} 
1-ॐ ह्रौं आदि नाथाय नमः।
2-ॐ ह्रौं कश्यपाय नमः।
3-ॐ ह्रौं अत्रये नमः।
4-ॐ ह्रौं वशिष्ठाय नमः।
5-ॐ ह्रौं विश्वामित्राय नमः।
6-ॐ ह्रौं गौतमाय नमः।
7-ॐ ह्रौं जमदग्नये नमः।
8-ॐ ह्रौं भारद्वाजाय नमः।
9-ॐ ह्रौं बाल्मीकिये नमः।
10-ॐ ह्रौं दधीच्ये नमः।
11-ॐ ह्रौं लोपामुद्रायै नमः।
12-ॐ ह्रौं अगस्त्याय नमः।
13-ॐ ह्रौं दत्तात्रेयाय नमः।
14-ॐ ह्रौं मारकंडेयाय नमः।
15-ॐ ह्रौं मत्स्येन्द्रनाथाय नमः।
16-ॐ ह्रौं गोरक्षनाथाय नमः।
17-ॐ ह्रौं नावनाथाय नमः।
18-ॐ ह्रौं बसवेश्वराय नमः।
19-ॐ ह्रौं नित्यानंदाय नमः।
20-ॐ ह्रौं जगन्नाथाय नमः।
21-ॐ ह्रौं शिवानंदाय नमः।

अवधूतं महासिद्धं आदिव्याधि प्रशमनं।
भोग-मोक्ष-प्रदं देवं महासिद्धं नमाम्यहं॥

॥परात्पर शिव॥
।ॐ परमेश्वर परमेश्वरै नमः।

॥शिव अष्ट स्वरूप॥
1-ॐ ह्रौं भवाय देवाय नमः 
2-ॐ ह्रौं शर्वाय देवाय नमः 
3-ॐ ह्रौं रूद्राय देवाय नमः 
4-ॐ ह्रौं भीमाय देवाय नमः 
5-ॐ ह्रौं उग्राय देवाय नमः
6-ॐ ह्रौं महतो देवाय नमः
7-ॐ ह्रौं पशुपतये देवाय नमः
8-ॐ ह्रौं ईशानाय देवाय नमः

॥शिव अष्टभैरव स्वरूप॥
1-ॐ ह्रौं असितांग भैरवाय नमः
2-ॐ ह्रौं रुरु भैरवाय नमः
3-ॐ ह्रौं चंड भैरवाय नमः
4-ॐ ह्रौं क्रोध भैरवाय नमः
5-ॐ ह्रौं उन्मत्त भैरवाय नमः
6-ॐ ह्रौं कपाल भैरवाय नमः
7-ॐ ह्रौं भीषण भैरवाय नमः 
8-ॐ ह्रौं संहार भैरवाय नमः

॥श्रीदुर्गादेवी रक्षाकवच मंत्र॥
विनियोग ‌:-ॐ अस्य श्री चन्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषि: अनुष्टुप‌्छन्दः चामुंडा देवता अंगन्यासोक्तमातरो बीजम‌् दिग्बन्ध देवतास्तत्वम‌् श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठांगत्वेन‌ जपे विनियोग:।

मंत्र:-ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षिणी ठ: ठ: स्वाहा।

मृतसंजीवनी मंत्र:- ॐ ह्रौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्व: ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनम‌् उर्वारुकमिव बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात‌् ॐ स्वः भुवः भूःसः जूं ह्रौं ॐ॥

{सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम}
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामण्डायै विच्चे ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा॥

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनी । 
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दीनि॥
नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भसुरघातिनि। 
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे॥ 
ऐंकारी सृष्टीरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका। 
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोस्तुते॥
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी। 
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि॥
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी। 
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुंभ कुरू॥
हुं हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रै भवान्यै ते नमो नमः॥
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं। 
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा॥ 
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे॥

ॐ नमश्चण्डिकायैः।ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

प्रथमचरित्र...
ॐ अस्य श्री प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा रूषिः महाकाली देवता गायत्री छन्दः नन्दा शक्तिः रक्तदन्तिका बीजम् अग्निस्तत्त्वम् रूग्वेद स्वरूपम् श्रीमहाकाली प्रीत्यर्थे प्रथमचरित्र जपे विनियोगः|

(1) श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं प्रीं ह्रां ह्रीं सौं प्रें म्रें ल्ह्रीं म्लीं स्त्रीं क्रां स्ल्हीं क्रीं चां भें क्रीं वैं ह्रौं युं जुं हं शं रौं यं विं वैं चें ह्रीं क्रं सं कं श्रीं त्रों स्त्रां ज्यैं रौं द्रां द्रों ह्रां द्रूं शां म्रीं श्रौं जूं ल्ह्रूं श्रूं प्रीं रं वं व्रीं ब्लूं स्त्रौं ब्लां लूं सां रौं हसौं क्रूं शौं श्रौं वं त्रूं क्रौं क्लूं क्लीं श्रीं व्लूं ठां ठ्रीं स्त्रां स्लूं क्रैं च्रां फ्रां जीं लूं स्लूं नों स्त्रीं प्रूं स्त्रूं ज्रां वौं ओं श्रौं रीं रूं क्लीं दुं ह्रीं गूं लां ह्रां गं ऐं श्रौं जूं डें श्रौं छ्रां क्लीं
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

मध्यमचरित्र..
ॐ अस्य श्री मध्यमचरित्रस्य विष्णुर्रूषिः महालक्ष्मीर्देवता उष्णिक छन्दः शाकम्भरी शक्तिः दुर्गा बीजम् वायुस्तत्त्वम् यजुर्वेदः स्वरूपम् श्रीमहालक्ष्मी प्रीत्यर्थे मध्यमचरित्र जपे विनियोगः

(2) श्रौं श्रीं ह्सूं हौं ह्रीं अं क्लीं चां मुं डां यैं विं च्चें ईं सौं व्रां त्रौं लूं वं ह्रां क्रीं सौं यं ऐं मूं सः हं सं सों शं हं ह्रौं म्लीं यूं त्रूं स्त्रीं आं प्रें शं ह्रां स्मूं ऊं गूं व्र्यूं ह्रूं भैं ह्रां क्रूं मूं ल्ह्रीं श्रां द्रूं द्व्रूं ह्सौं क्रां स्हौं म्लूं श्रीं गैं क्रूं त्रीं क्ष्फीं क्सीं फ्रों ह्रीं शां क्ष्म्रीं रों डुं
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

(3) श्रौं क्लीं सां त्रों प्रूं ग्लौं क्रौं व्रीं स्लीं ह्रीं हौं श्रां ग्रीं क्रूं क्रीं यां द्लूं द्रूं क्षं ह्रीं क्रौं क्ष्म्ल्रीं वां श्रूं ग्लूं ल्रीं प्रें हूं ह्रौं दें नूं आं फ्रां प्रीं दं फ्रीं ह्रीं गूं श्रौं सां श्रीं जुं हं सं
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

(4) श्रौं सौं दीं प्रें यां रूं भं सूं श्रां औं लूं डूं जूं धूं त्रें ल्हीं श्रीं ईं ह्रां ल्ह्रूं क्लूं क्रां लूं फ्रें क्रीं म्लूं घ्रें श्रौं ह्रौं व्रीं ह्रीं त्रौं हलौं गीं यूं ल्हीं ल्हूं श्रौं ओं अं म्हौं प्री
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

उत्तमचरित्र..
ॐ अस्य श्री उत्तरचरित्रस्य रुद्र रूषिः महासरस्वती देवता अनुष्टुप् छन्दः भीमा शक्तिः भ्रामरी बीजम सूर्यस्तत्त्वम सामवेदः स्वरूपम श्री महासरस्वती प्रीत्यर्थे उत्तरचरित्र जपे विनियोगः-

(5) श्रौं प्रीं ओं ह्रीं ल्रीं त्रों क्रीं ह्लौं ह्रीं श्रीं हूं क्लीं रौं स्त्रीं म्लीं प्लूं ह्सौं स्त्रीं ग्लूं व्रीं सौः लूं ल्लूं द्रां क्सां क्ष्म्रीं ग्लौं स्कं त्रूं स्क्लूं क्रौं च्छ्रीं म्लूं क्लूं शां ल्हीं स्त्रूं ल्लीं लीं सं लूं हस्त्रूं श्रूं जूं हस्ल्रीं स्कीं क्लां श्रूं हं ह्लीं क्स्त्रूं द्रौं क्लूं गां सं ल्स्त्रां फ्रीं स्लां ल्लूं फ्रें ओं स्म्लीं ह्रां ऊं ल्हूं हूं नं स्त्रां वं मं म्क्लीं शां लं भैं ल्लूं हौं ईं चें क्ल्रीं ल्ह्रीं क्ष्म्ल्रीं पूं श्रौं ह्रौं भ्रूं क्स्त्रीं आं क्रूं त्रूं डूं जां ल्ह्रूं फ्रौं क्रौं किं ग्लूं छ्रंक्लीं रं क्सैं स्हुं श्रौं श्रीं ओं लूं ल्हूं ल्लूं स्क्रीं स्स्त्रौं स्भ्रूं क्ष्मक्लीं व्रीं सीं भूं लां श्रौं स्हैं ह्रीं श्रीं फ्रें रूं च्छ्रूं ल्हूं कं द्रें श्रीं सां ह्रौं ऐं स्कीं 
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

(6) श्रौं ओं त्रूं ह्रौं क्रौं श्रौं त्रीं क्लीं प्रीं ह्रीं ह्रौं श्रौं अरैं अरौं श्रीं क्रां हूं छ्रां क्ष्मक्ल्रीं ल्लुं सौः ह्लौं क्रूं सौं 
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

(7) श्रौं कुं ल्हीं ह्रं मूं त्रौं ह्रौं ओं ह्सूं क्लूं क्रें नें लूं ह्स्लीं प्लूं शां स्लूं प्लीं प्रें अं औं म्ल्रीं श्रां सौं श्रौं प्रीं हस्व्रीं
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

(8) श्रौं म्हल्रीं प्रूं एं क्रों ईं एं ल्रीं फ्रौं म्लूं नों हूं फ्रौं ग्लौं स्मौं सौं स्हों श्रीं ख्सें क्ष्म्लीं ल्सीं ह्रौं वीं लूं व्लीं त्स्त्रों ब्रूं श्क्लीं श्रूं ह्रीं शीं क्लीं फ्रूं क्लौं ह्रूं क्लूं तीं म्लूं हं स्लूं औं ल्हौं श्ल्रीं यां थ्लीं ल्हीं ग्लौं ह्रौं प्रां क्रीं क्लीं न्स्लुं हीं ह्लौं ह्रैं भ्रं सौं श्रीं प्सूं द्रौं स्स्त्रां ह्स्लीं स्ल्ल्रीं 
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

(9) रौं क्लीं म्लौं श्रौं ग्लीं ह्रौं ह्सौं ईं ब्रूं श्रां लूं आं श्रीं क्रौं प्रूं क्लीं भ्रूं ह्रौं क्रीं म्लीं ग्लौं ह्सूं प्लीं ह्रौं ह्स्त्रां स्हौं ल्लूं क्स्लीं श्रीं स्तूं च्रें वीं क्ष्लूं श्लूं क्रूं क्रां स्क्ष्लीं भ्रूं ह्रौं क्रां फ्रूं 
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

(10) श्रौं ह्रीं ब्लूं ह्रीं म्लूं ह्रं ह्रीं ग्लीं श्रौं धूं हुं द्रौं श्रीं त्रों व्रूं फ्रें ह्रां जुं सौः स्लौं प्रें हस्वां प्रीं फ्रां क्रीं श्रीं क्रां सः क्लीं व्रें इं ज्स्हल्रीं 
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

(11) श्रौं क्रूं श्रीं ल्लीं प्रें सौः स्हौं श्रूं क्लीं स्क्लीं प्रीं ग्लौं ह्स्ह्रीं स्तौं लीं म्लीं स्तूं ज्स्ह्रीं फ्रूं क्रूं ह्रौं ल्लूं क्ष्म्रीं श्रूं ईं जुं त्रैं द्रूं ह्रौं क्लीं सूं हौं श्व्रं ब्रूं स्फ्रूं ह्रीं लं ह्सौं सें ह्रीं ल्हीं विं प्लीं क्ष्म्क्लीं त्स्त्रां प्रं म्लीं स्त्रूं क्ष्मां स्तूं स्ह्रीं थ्प्रीं क्रौं श्रां म्लीं
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

(12) ह्रीं ओं श्रीं ईं क्लीं क्रूं श्रूं प्रां स्क्रूं दिं फ्रें हं सः चें सूं प्रीं ब्लूं आं औं ह्रीं क्रीं द्रां श्रीं स्लीं क्लीं स्लूं ह्रीं व्लीं ओं त्त्रों श्रौं ऐं प्रें द्रूं क्लूं औं सूं चें ह्रूं प्लीं क्षीं 
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

(13) श्रौं व्रीं ओं औं ह्रां श्रीं श्रां ओं प्लीं सौं ह्रीं क्रीं ल्लूं ह्रीं क्लीं प्लीं श्रीं ल्लीं श्रूं ह्रूं ह्रीं त्रूं ऊं सूं प्रीं श्रीं ह्लौं आं ओं ह्रीं 
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

दुर्गा दुर्गर्तिशमनी दुर्गापद्विनिवारिणी। 
दुर्गमच्छेदिनी दुर्गसाधिनी दुर्गनाशिनी॥
दुर्गनिहन्त्री दुर्गमापहा। 
दुर्गमग्यानदा दुर्गदैत्यलोकदवानला॥
दुर्गमा दुर्गमालोका दुर्गमात्मस्वरूपिणी। 
दुर्गमार्गप्रदा दुर्गमविद्या दुर्गमाश्रिता॥
दुर्गमग्यानसंस्थाना दुर्गमध्यानभासिनी। 
दुर्गमोहा दुर्गमगा दुर्गमार्थस्वरूपिणी॥
दुर्गमासुरसंहन्त्री दुर्गमायुधधारिणी। 
दुर्गमाँगी दुर्गमता दुर्गम्या दुर्गमेश्वरी॥
दुर्गभीमा दुर्गभामा दुर्गभा दुर्गदारिणी॥
{3बार}
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ दुर्गार्पणमस्तु॥

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शुक्रवार, 12 सितंबर 2025

खूबसूरत खेतार गाँव और सतधारा मेंं बटी दीहारीन झूंझा

खूबसूरत गाँव खेतार और सतधारा में बटी दीहारीन झूँझा
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        कोरबा जिले के कोरबा विकासखंड अंतर्गत कोरबा से लेमरू मार्ग पर बाल्को होते हुए जिला मुख्यालय से लगभग 22.8 किलोमीटर दूर ग्राम गहनिया का आश्रित गाँव खेतार है। यह गाँव प्रकृति की गोद में बसा एक खूबसूरत गाँव है । चारों तरफ से जंगल और पहाड़ियों से घिरा हुआ यह गाँव, अपनी नैसर्गिक सुंदरता से परिपूर्ण है। गाँव केसलानाला के दाहीने तट पर बसा था। जो अब नाले से लगभग एक किलोमीटर दूर पीछे खिसक गई हैं।  केसलानाला, शुद्ध और पीने योग्य साफ जल से लबालब रहती है। यह नाला हसदेव नदी की सहायक जलधारा है, जो सदानीरा है।  गाँव में चंद घर ही हैं। जो पूर्णतः जनजातिय लोगों का गाँव है ।जहाँ मांझी और मझवार जनजाति की अधिकता है। यह नाला गाँववालों की कृषि के मुख्य आधार भी है। गाँव के मध्य एक इमली का पेड़ है जिसके आसपास ही गाँव बसा हुआ है।
        गाँव तक जाने के लिए कच्चा रास्ता बना हुआ है। जिसमें छोटे-बड़े पत्थरों को डाल कर कीचड़ से बचने का उपाय किया गया है। आज भी यहाँ पक्के मार्ग की राह गाँववालों के तरफ से देखा जा रहा है। पथरीला राह, जिसमें संभलकर यात्रा करनी पड़ती है। गाँव में एक एकल शिक्षक विद्यालय है। जिसमें प्राथमिक शिक्षा तक अध्यापन कार्य होता है। यहाँ पढ़ाने के लिए कोरबा के मुड़ापार से एक शिक्षिका जाती हैं, जिनका नाम आशा सिंह सूर्यवंशी हैं। जब मैं गाँव पहुंँचा , दो अक्टूबर का दिन था। गाँधी और शास्त्री जी की जयंती थी। शिक्षिका, बच्चों की रैली निकालकर गाँव की भ्रमण करा रही थीं। देशभक्ति के नारे लगवाए जा रहे थे। जिसकी आवाजें आ रही थीं। मुझे अपना बचपना याद आ गया ।बच्चों के आवाज के पीछे-पीछे मैं भी स्कूल पहुंँच गया। तब तक रैली स्कूल पहुँच चुकी थी। बच्चे, विद्यालय में जा चुके थे। स्कूल के एक कमरे में बच्चे दरी बिछाकर के जमीन पर बैठे हुए थे। एक बच्चा गांँधी जी बना हुआ था।            जिसने कागज के बने हुए सफेद चश्मा पहन रखे थे, एवं हाथ में लाठी  भी रखे हुए थे । विद्यालय पहुँचकर जब सब जमीन में दरी में बैठ गए उसी समय मैं भी पहुंँचा । गाँव के पुराने स्थलों की जानकारी लेने के लिए मैं विद्यालय पहुंँचा था। पर वहाँ शिक्षक के रूप में  शिक्षिका मिली। उन्होंने ऐसे स्थलों की जानकारी के बारे में अनभिज्ञता प्रकट की। तब उनसे अनुमति लेकर बच्चों से बात करने लगा। उनसे बात कर अच्छा लगा। फिर उन्हें जमीन में बैठकर गांँधीजी और शास्त्री जी के जीवन के बारे में बताने लगा। बच्चों को गणेश जी की मातृ-पितृ भक्ति की कहानी बताकर उन्हें धरती के साक्षात भगवान होने के बारे में बताने लगा। अंत में अपने साथ बिस्किट ले गया था, उसे बच्चों को वितरित किया। बच्चे और शिक्षिका बहुत खुश हो गए ।        
        गाँव में कोई अस्पताल नहीं है। गाँव में आज भी बीमार पड़ने पर लोग गाँव के बैगा के पास ही जाते हैं। गाँव के बैगा का नाम है , बनवारी मांझी । गाँव में पहुँचा तो इमली पेड़ के नीचे बने घर में एक व्यक्ति बीमार था। उसे झाड़-फूंक के लिए बनवारी मांझी को बुलाया गया था । मैं भी उसकी इलाज पद्धति को देखना चाहता था। बनवारी बैगा , बांस की बनी एक डंडे को शक्ति का प्रतीक मानकर रखे हुए थे। डंडा बहुत पुराना था। तेल और धुएँ के प्रभाव से काला हो गया था। वह तंत्र-मंत्र और डंडे की शक्ति से इलाज करने का दावा करते हैं। मुझे उनके साथ जाने की अनुमति नहीं मिला। इसलिए इस बारे में ज्यादा नहीं बता सकता हूँ। गाँव में एक बच्ची आँगनबाड़ी केन्द्र से वितरण किए गए पोषक खाद्य पदार्थ को लेकर घुम रही थी।
         इसलिए मैं उस समय का लाभ लेने के लिए गाँव के ही एक युवक अमर मांझी को लेकर वहाँ के पिकनिक स्थल जाने का निश्चय किया। इमली पेड़ से दाहिने तरफ लगभग एक-डेढ़ किलोमीटर दूर पैदल चलकर एक नाले को पार कर उस पर बने दीहारीन झूँझा पहुँचा। दीहारीन झूँझा मैदानी भाग पर बना हुआ एक खूबसूरत जलप्रपात है। यह जलप्रपात 22• 28' 58" उत्तरी अक्षांश और 82• 50 '32" पूर्वी देशांतर पर समुद्र तल से 1337.57 फीट की ऊंँचाई पर स्थित है ।यह लगभग 25 मीटर की दूरी पर छोटी-बड़ी सात जलधाराएंँ बनाकर जलप्रपात के रूप में गिरती हैं । जलप्रपातों की ऊँचाई ज्यादा नहीं है ,पर ये अपनी प्राकृतिक सुंदरता और सतत जलधारा के लिए चित्ताकर्षक हैं। गाँववाले इसे दीहारीन झाँझा के नाम से जानते हैं , पर इसे यह नामकरण कैसे पड़ा कोई नहीं जानते हैं । मेरे मतानुसार अपनी सात धाराओं के रूप में गिरने के कारण इन जलधाराओं को सतधारा जलप्रपात ,खेतार कहना ज्यादा उचित जान पड़ता है।
         यदि गाँव तक पक्की सड़कें बन जाए तो यहाँ ज्यादा पर्यटक पहुँच सकते हैं। इससे गाँववाले ज्यादा लाभान्वित हो सकते हैं। जहाँ तक उस बीमार व्यक्ति के बीमार होने का है , मेरे मतानुसार इमली का पेड़  इसके लिए ज्यादा उत्तरदाई लगता है , क्योंकि इमली का पेड़ 24 घंटे कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन करती रहती है। ऐसे में उसके नीचे रहने वाले लोगों की स्वास्थ्य खराब होने की संभावना ज्यादा रहती है।  इस दिशा में जन जागरूकता की भी आवश्यकता है । तो सप्ताह में वहाँ किसी न किसी एक स्वास्थ्य कर्मी का दौरा कराया जाना भी उचित होगा।  जिसके बारे में शासन-प्रशासन को ध्यान देने की आवश्यकता है।

सोमवार, 14 जुलाई 2025

एक अनोखा मुगल कालीन राम चरित मानस


मुगलकालीन तुलसीदास कृत रामचरित मानस, लिथोग्राफ पर मुद्रित
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       जिला पुरातत्त्व संग्रहालय कोरबा में लिथोग्राफ पर मुद्रित एक दुर्लभ रामचरित मानस पर्यटकों के देखने के लिए रखा गया है । जो जिला पुरातत्त्व संग्रहालय के मार्गदर्शक श्री हरि सिंह क्षत्री को कोरबा जिले के करतला विकासखंड अंतर्गत उमरेली निवासी सेवानिर्वृत्त प्रधानपाठक श्री तेजी राम सोनी ने उन्हें नदी में विसर्जन करने के लिए दिया था, जिसकी महत्ता को जानकर उसे कोरबा ले आया और उसे साफकर  सुरक्षित रुप से संग्रहालय में रख दिया है।  यह पुस्तक बहुत पुरानी पर महत्वपूर्ण है। यह अत्यंत जीर्णशीर्ण  होने के कारण संरक्षित किए जाने योग्य है।
        इस राम चरित मानस के अनुशीलन से पता चलता है कि इनका अलग अलग काण्ड अलग अलग तिथि को लिखे गए हैं और मुद्रित भी हुए हैं। इसमें एक जगह लिखा है कि- 'इति श्रीराम चरित मानसे सकल कलि कलुष विध्वंसने विमल विज्ञान वैराग्य सम्पादनो  नाम तुलसीकृत वालकाण्ड प्रथमः सोपानः समाप्तः संवत १५४६  मिति वैशाखवदी १५ दिन सोमवार । आगे श्लोक ७, चौपाई १५७५, छन्द ३५ , सोरठा ३६ ,  और दोहा ३६१  की संख्या के साथ लिखंत  कालीचरन ।। मतवै फ़ैज़रसां शहर लखनऊ अक़बर सराय आग़ामीर मेल एहत्माम ज़ामिन अली खां  के छापा गया।। २६ अपरैल सन् १८८५ ईस्वी।।वारसेयुम।।  यहाँ कुछ मानवीय गलतियाँ दृष्टिगोचर होती हैं।         इसी तरह एक पृष्ठ पर 'इति  श्रीराम चरित मानसे सकल कलि कलुष विध्वंसने विमल वैराग्य संपादने तुलसीकृत आरण्यकांड तृतीय सोपानः समा०'  लिखा गया है।
       इसी तरह से एक चित्र के नीचे ' संवत १५४४ मिति कुँवारवदी १५  १७  सितम्बर सन्  १८८७ ई० ' लिखा है।
        इसी तरह किष्किंधाकाण्ड - शहर लखनऊ मु० अकबर सराय आगामीरमतवय फैज़रसंमिंएहत्माम ज़ामिन अली खां से छपावा रचहारुम २० नवम्बर १८८५  ईसवी ' को लिखा गया पाया गया है।      इसी तरह इस राम चरित मानस में एक जगह -' कृपा श्री भगवान में,  यह पोथी छपी शहर लखनऊ मुहल्ले , लंकाकांड अकबर सराय आगामी रमेमतवपे , जरसो , जामिल अली खाँ से छ०' लिखा पाया गया ।
         इसी तरह एक पृष्ठ पर ' इति श्री राम चरित मानस  तुलसीकृत सुन्दरकाण्ड पंचम सोपान समाप्त संवत १५४५  आषाढ़वदी ८' लिखा पाया गया है।
         इस पोथी में अनेक मानवीय भूलें मुद्रित हैं। कहीं लकीर में जगह कम पड़ने पर शेष शब्दों को आड़ी के बजाय खड़ी कर मुद्रित किया गया है। कहीं मात्राओं में भूल की गई है तो कहीं शब्दों में। 
          इस पोथी में पचास से भी अधिक हस्तचित्र  चित्रांकन किया गया है। इन चित्रों में भी अनेक भूलें हैं।  जैसे - रावण के सिर को देखने से पता चलता है कि कहीं नौ सिर है तो कहीं ग्यारह। एक जगह नौ सिर तो दसवें सिर के रूप में गधे को दिखाया गया है ।      इस तरह से यह लिथोग्राफ पर मुद्रित राम  चरित मानस अपनी अनेकों विशेषताओं के साथ एक अनोखी पोथी है , और अद्वितीय भी।
 सूत्र -
1/-  पोथी के मूल स्वामित्व श्री तेजी राम सोनी जी के व्यक्तिगत विचार, 
 2/- जिला पुरातत्त्व संग्रहालय के मार्गदर्शक श्री हरि सिंह क्षत्री को कथनानुसार विचार

सोमवार, 21 अक्टूबर 2024

क्षत्रिय वंश


चार हुतासन सों भये कुल छत्तिस वंश प्रमाण

भौमवंश से धाकरे टांक नाग उनमान

चौहानी चौबीस बंटि कुल बासठ वंश प्रमाण."

अर्थ:-दस सूर्य वंशीय क्षत्रिय दस चन्द्र वंशीय,बारह ऋषि वंशी एवं चार अग्नि वंशीय कुल छत्तिस क्षत्रिय वंशों का प्रमाण है,बाद में भौमवंश नागवंश क्षत्रियों को सामने करने के बाद जब चौहान वंश चौबीस अलग अलग वंशों में जाने लगा तब क्षत्रियों के बासठ अंशों का पमाण मिलता है।

सूर्य वंश की दस शाखायें:-

१. गहलोत/सिसोदिया २. राठौड ३. बडगूजर/सिकरवार ४. कछवाह ५. दिक्खित ६. गौर ७. गहरवार ८. डोगरा ९.बल्ला १०.वैस

चन्द्र वंश की दस शाखायें:-

१.जादौन२.भाटी३.तोमर४.चन्देल५.छोंकर६.झाला७.सिलार८.वनाफ़र ९.कटोच१०. सोमवंशी

अग्निवंश की चार शाखायें:-

१.चौहान२.सोलंकी३.परिहार ४.पमार.

ऋषिवंश की बारह शाखायें:-

१.सेंगर२.कनपुरिया३.गर्गवंशी(हस्तिनापुर के राजा दुष्यन्त के वंशज)४.दायमा५.गौतम६.अनवार (राजा जनक के वंशज)७.दोनवार८.दहिया(दधीचि ऋषि के वंशज)९.चौपटखम्ब १०.काकन११.शौनक १२.बिसैन

चौहान वंश की चौबीस शाखायें:-

१.हाडा २.खींची ३.सोनीगारा ४.पाविया ५.पुरबिया ६.संचौरा ७.मेलवाल८.शम्भरी ९.निर्वाण १०.मलानी ११.धुरा १२.मडरेवा १३.सनीखेची १४.वारेछा १५.पसेरिया १६.बालेछा १७.रूसिया १८.चांदा१९.निकूम २०.भावर २१.छछेरिया २२.उजवानिया २३.देवडा २४.बनकर.

क्षत्रिय जातियो की सूची

क्रमांकनामगोत्रवंशस्थान और जिला
१.सूर्यवंशीभारद्वाज, कश्यपसूर्यमहाराजा राजपूताना झारखंड
२.गहलोतकश्यप, बैजवापेडसूर्यमेवाड़ और पूर्वी जिले
३.सिसोदियाकश्यप,बैजवापेडगहलोतमहाराणा उदयपुर स्टेट
४.कछवाहागौतम,वशिष्ठ,मानवसूर्यमहाराजा जयपुर
५.राठौडगौतम,कश्यप,भारद्वाज,शान्डिल्य,अत्रिगहरवारमहाराजा जोधपुर ,बीकानेर,किशनगढ़ और पूर्व और मालवा
६.सोमवंशीअत्रयचन्द्रप्रतापगढ और जिला हरदोई
७.खेरवावंशीकश्यपचन्द्रराजकरौली राजपूताने में
८.भाटीअत्रयजादौनमहारजा जैसलमेर राजपूताना
९.जाडेचाअत्रययमवंशीमहाराजा कच्छ भुज
१०.जावतअत्रयजादौनशाखा अवा. कोटला ऊमरगढ आगरा
११.तोमरअत्रय, व्याघ्र, गार्गेयचन्द्रपाटन के राव तंवरघार जिला ग्वालियर
१२.कटियारव्याघ्रतोंवरधरमपुर का राज और हरदोई
१३.पालीवारव्याघ्रचन्द्रगोरखपुर
१४.सत्पोखरियाभारद्वाजराठौड(चाँपावत)मऊ जिला घोसी, इंदारा
१५.परिहार, वरगाहीकौशल्य, कश्यपअग्निबांदा जिला, रीवा राज्य में बघेलखंड
१६.तखीकौशल्यपरिहारपंजाब कांगडा जालंधर जम्मू में
१७.पंवारवशिष्ठअग्निमालवा मेवाड धौलपुर पूर्व मे बलिया
१८.सोलंकीभारद्वाजअग्निराजपूताना मालवा सोरों जिला एटा
१९.चौहानवत्सअग्निराजपूताना पूर्व और सर्वत्र
२०.हाडावत्सचौहानकोटा बूंदी और हाडौती देश
२१.खींचीवत्सचौहानखींचीवाडा मालवा ग्वालियर
२२.भदौरियावत्सअग्निनौगंवां पारना आगरा इटावा गालियर
२३.देवडावत्सचौहानराजपूताना सिरोही राज
२४.शम्भरीवत्सचौहाननीमराणा रानी का रायपुर पंजाब
२५.बच्छगोत्रीवत्सचौहानप्रतापगढ सुल्तानपुर
२६.राजकुमारवत्सचौहानदियरा कुडवार फ़तेहपुर जिला
२७.पवैयावत्सचौहानग्वालियर
२८.गौर,गौडभारद्वाजसूर्यशिवगढ रायबरेली कानपुर लखनऊ
२९.वैसभारद्वाजसूर्यआजमगढ उन्नाव रायबरेली मैनपुरी पूर्व में
३०.गहरवारकश्यप, भारद्वाजसूर्यमाडा, हरदोई, वनारस, उन्नाव, बांदा पूर्व
३१.सेंगरगौतमब्रह्मक्षत्रियजगम्बनपुर भरेह इटावा जालौन
३२.कनपुरियाभारद्वाजब्रह्मक्षत्रियपूर्व में राजाअवध के जिलों में हैं
३३.बिसेनअत्रय,वत्स,भारद्वाज,पाराशर,शान्डिल्यब्रह्मक्षत्रियगोरखपुर गोंडा प्रतापगढ महराजगंज (निचलौल के उत्तर क्षेत्र के समीप) हैं
३४.निकुम्भवशिष्ठ,भारद्वाजसूर्यमऊ गोरखपुर आजमगढ हरदोई जौनपुर
३५.श्रीनेतभारद्वाजनिकुम्भगाजीपुर बस्ती गोरखपुर
३६.कटहरियावशिष्ठ्याभारद्वाज,सूर्यबरेली बंदायूं मुरादाबाद शहाजहांपुर
३७.वाच्छिलअत्रयवच्छिलचन्द्रमथुरा बुलन्दशहर शाहजहांपुर
३८.बढगूजरवशिष्ठसूर्यअनूपशहर एटा अलीगढ मैनपुरी मुरादाबाद हिसार गुडगांव जयपुर
३९.झालामरीच, कश्यप, मार्कण्डेचन्द्रधागधरा मेवाड झालावाड कोटा
४०.गौतमगौतमब्रह्मक्षत्रियराजा अर्गल फ़तेहपुर
४१.रैकवारभारद्वाजसूर्यबहरायच सीतापुर बाराबंकी
४२.करचुल हैहयकृष्णात्रेयचन्द्रबलिया फ़ैजाबाद अवध
४३.चन्देलचान्द्रायनचन्द्रवंशीगिद्धौर ,कानपुर, फ़र्रुखाबाद, बुन्देलखंड, पंजाब, गुजरात
४४.जनवारकौशल्यचन्द्रवंशीबलरामपुर अवध के जिलों में
४५.बहेलियाभारद्वाज,वैस (उप जाति सिसोदिया )की गोद सिसोदियारायबरेली बाराबंकी
४६.दीत्ततकश्यपसूर्यवंश की शाखाउन्नाव, बस्ती, प्रतापगढ, जौनपुर, रायबरेली ,बांदा
४७.सिलारशौनिकचन्द्रसूरत राजपूतानी
४८.सिकरवारभारद्वाज, सांक्रित्यनबढगूजरग्वालियर, आगरा, गाजीपुर और उत्तरप्रदेश में
४९.सुरवारगर्गसूर्यकठियावाड में
५०.सुर्वैयावशिष्ठयदुवंशकाठियावाड
५१.मोरीब्रह्मगौतमसूर्यमथुरा ,आगरा ,धौलपुर
५२.टांक (तत्तक)शौनिकनागवंशमैनपुरी और पंजाब
५३.गुप्तगार्ग्यचन्द्रअब इस वंश का पता नही है
५४.कौशिककौशिकचन्द्रबलिया, आजमगढ, गोरखपुर
५५.भृगुवंशीभार्गवब्रह्मक्षत्रियवनारस, बलिया, आजमगढ, गोरखपुर
५६.गर्गवंशीगर्गब्रह्मक्षत्रियआजमगढ, नरसिंहपुर सुल्तानपुर,अवध,बस्ती,फैजाबाद
५७.पडियारिया,देवल,सांकृतसामब्रह्मक्षत्रियराजपूताना
५८.ननवगकौशिकचन्द्रजौनपुर जिला
५९.वनाफ़रपाराशर,कश्यपचन्द्रबुन्देलखन्ड बांदा वनारस
६०.जैसवारकश्यपयदुवंशीमिर्जापुर एटा मैनपुरी
६१.चौलवंशभारद्वाजसूर्यदक्षिण मद्रास तमिलनाडु कर्नाटक में
६२.निमवंशीकश्यपसूर्यसंयुक्त प्रांत
६३.वैनवंशीवैन्यसोमवंशीमिर्जापुर
६४.दाहिमागार्गेयब्रह्मक्षत्रियकाठियावाड राजपूताना
६५.पुण्डीरकपिल, पुलस्त्यब्रह्मक्षत्रियपंजाब, गुजरात, रींवा, यू.पी.
६६.तुलवाआत्रेयचन्द्रराजाविजयनगर
६७.कटोचकश्यपचन्द्रराजानादौन कोटकांगडा
६८.चावडा,पंवार,चोहान,वर्तमान कुमावतवशिष्ठपंवार की शाखामलवा रतलाम उज्जैन गुजरात मेवाड
६९.अहवनवशिष्ठचावडा,कुमावतखेरी हरदोई सीतापुर बारांबंकी
७०.डौडियावशिष्ठपंवार शाखाबुलंदशहर मुरादाबाद बांदा मेवाड गल्वा पंजाब
७१.गोहिलबैजबापेणगहलोत शाखाकाठियावाड
७२.बुन्देलाकश्यपगहरवारशाखाबुन्देलखंड के रजवाडे
७३.काठीकश्यपगहरवारशाखाकाठियावाड झांसी बांदा
७४.जोहियापाराशरचन्द्रपंजाब देश मे
७५.गढावंशीकांवायनचन्द्रगढावाडी के लिंगपट्टम में
७६.मौखरीअत्रयचन्द्रप्राचीन राजवंश था
७७.लिच्छिवीकश्यपसूर्यप्राचीन राजवंश था
७८.बाकाटकविष्णुवर्धनसूर्यअब पता नहीं चलता है
७९.पालकश्यपसूर्ययह वंश सम्पूर्ण भारत में बिखर गया है
८०.सैनअत्रयब्रह्मक्षत्रिययह वंश भी भारत में बिखर गया है
८१.कदम्बमान्डग्यब्रह्मक्षत्रियदक्षिण महाराष्ट्र मे हैं
८२.पोलचभारद्वाजब्रह्मक्षत्रियदक्षिण में मराठा के पास में है
८३.बाणवंशकश्यपअसुरवंशश्री लंका और दक्षिण भारत में,कैन्या जावा में
८४.काकुतीयभारद्वाजचन्द्र,प्राचीन सूर्य थाअब पता नही मिलता है
८५.सुणग वंशभारद्वाजचन्द्र,पाचीन सूर्य था,अब पता नही मिलता है
८६.दहियागौतमब्रह्मक्षत्रियमारवाड में जोधपुर
८७.जेठवाकश्यपहनुमानवंशीराजधूमली काठियावाड
८८.मोहिलवत्सचौहान शाखामहाराष्ट्र मे है
८९.बल्लाभारद्वाज,कश्यपसूर्यकाठियावाड मे मिलते हैं
९०.डाबीवशिष्ठयदुवंशराजस्थान
९१.खरवडवशिष्ठयदुवंशमेवाड उदयपुर
९२.सुकेतभारद्वाजगौड की शाखापंजाब में पहाडी राजा
९३.पांड्यअत्रयचन्दअब इस वंश का पता नहीं
९४.पठानियापाराशरवनाफ़रशाखापठानकोट राजा पंजाब
९५.बमटेलाशांडल्यविसेन शाखाहरदोई फ़र्रुखाबाद
९६.बारहगैयावत्सचौहानगाजीपुर
९७.भैंसोलियावत्सचौहानभैंसोल गाग सुल्तानपुर
९८.चन्दोसियाभारद्वाजवैससुल्तानपुर
९९.चौपटखम्बकश्यपब्रह्मक्षत्रियजौनपुर
१००.धाकरेभारद्वाज(भृगु)ब्रह्मक्षत्रियआगरा मथुरा मैनपुरी इटावा हरदोई बुलन्दशहर
१०१.धन्वस्तयमदाग्निब्रह्मक्षत्रियजौनपुर आजमगढ वनारस
१०२.धेकाहाकश्यपपंवार की शाखाभोजपुर शाहाबाद
१०३.दोबर(दोनवार)वत्स या कश्यपब्रह्मक्षत्रियगाजीपुर बलिया आजमगढ गोरखपुर
१०४.हरद्वारभार्गवचन्द्र शाखाआजमगढ
१०५.जायसकश्यपराठौड की शाखारायबरेली मथुरा
१०६.जरोलियाव्याघ्रपदचन्द्रबुलन्दशहर
१०७.जसावतमानव्यकछवाह शाखामथुरा आगरा
१०८.जोतियाना(भुटियाना)मानव्यकश्यप,कछवाह शाखामुजफ़्फ़रनगर मेरठ
१०९.घोडेवाहामानव्यकछवाह शाखालुधियाना होशियारपुर जालन्धर
११०.कछनियाशान्डिल्यब्रह्मक्षत्रियअवध के जिलों में
१११.काकनभृगुब्रह्मक्षत्रियगाजीपुर आजमगढ
११२.कासिबकश्यपकछवाह शाखाशाहजहांपुर
११३.किनवारकश्यपसेंगर की शाखापूर्व बंगाल और बिहार में
११४.बरहियागौतमसेंगर की शाखापूर्व बंगाल और बिहार
११५.लौतमियाभारद्वाजबढगूजर शाखाबलिया गाजी पुर शाहाबाद
११६.मौनसमौनकछवाह शाखामिर्जापुर प्रयाग जौनपुर
११७.नगबकमानव्यकछवाह शाखाजौनपुर आजमगढ मिर्जापुर
११८.पलवारव्याघ्रसोमवंशी शाखाआजमगढ फ़ैजाबाद गोरखपुर
११९.रायजादेपाराशरचन्द्र की शाखापूर्व अवध में
१२०.सिंहेलकश्यपसूर्यआजमगढ परगना मोहम्दाबाद
१२१.तरकडकश्यपदिक्खित शाखाआगरा मथुरा
१२२.तिसहियाकौशल्यपरिहारइलाहाबाद परगना हंडिया
१२३.तिरोताकश्यपतंवर की शाखाआरा शाहाबाद भोजपुर
१२४.उदमतियावत्सब्रह्मक्षत्रियआजमगढ गोरखपुर
१२५.भालेवशिष्ठपंवारअलीगढ
१२६.भालेसुल्तानभारद्वाजवैस की शाखारायबरेली लखनऊ उन्नाव
१२७.जैवारव्याघ्रतंवर की शाखादतिया झांसी बुन्देलखंड
१२८.सरगैयांव्याघ्रसोमवंशहमीरपुर बुन्देलखण्ड
१२९.किसनातिलअत्रयतोमरशाखादतिया बुन्देलखंड
१३०.टडैयाभारद्वाजसोलंकीशाखाझांसी ललितपुर बुन्देलखंड
१३१.खागरअत्रययदुवंश शाखाजालौन हमीरपुर झांसी
१३२.पिपरियाभारद्वाजगौडों की शाखाबुन्देलखंड
१३३.सिरसवारअत्रयचन्द्र शाखाबुन्देलखंड
१३४.खींचरवत्सचौहान शाखाफ़तेहपुर में असौंथड राज्य
१३५.खातीकश्यपदिक्खित शाखाबुन्देलखंड,राजस्थान में कम संख्या होने के कारण इन्हे बढई गिना जाने लगा
१३६.आहडियाबैजवापेणगहलोतआजमगढ
१३७.उदावतगौतमराठौडपाली
१३८.उजैनेश्रवणपंवारआरा डुमरिया
१३९.अमेठियाभारद्वाजगौडअमेठी लखनऊ सीतापुर
१४०.दुर्गवंशीकश्यपदिक्खितराजा जौनपुर राजाबाजार
१४१.बिलखरियाकश्यपदिक्खितप्रतापगढ उमरी राजा
१४२.डोगराकश्यपसूर्यकश्मीर राज्य और बलिया
१४३.निर्वाणवत्सचौहानराजपूताना (राजस्थान)
१४४.जाटूव्याघ्रतोमरराजस्थान,हिसार पंजाब
१४५.नरौनीमानव्यकछवाहाबलिया आरा
१४६.भनवगभारद्वाजकनपुरियाजौनपुर
१४७.गिदवरियावशिष्ठपंवारबिहार मुंगेर भागलपुर
१४८.रक्षेलकश्यपसूर्यरीवा राज्य में बघेलखंड
१४९.कटारियाभारद्वाजसोलंकीझांसी मालवा बुन्देलखंड
१५०.रजवारवत्सचौहानपूर्व मे बुन्देलखंड
१५१.द्वारव्याघ्रतोमरजालौन झांसी हमीरपुर
१५२.इन्दौरियाव्याघ्रतोमरआगरा मथुरा बुलन्दशहर
१५३.छोकरअत्रययदुवंशअलीगढ मथुरा बुलन्दशहर
१५४.जांगडावत्सचौहानबुलन्दशहर पूर्व में झांसी
१५५.शौनकशौनभ्रृगुवंशीइलाहाबाद
१५६.बघेलकश्यप या भारद्वाजसोलंकीरीवा राज्य में बघेलखंड
१५७.दिक्खितकश्यपसूर्यबुन्देलखंड
१५८.बंधलगोतीभारद्वाजब्रह्मक्षत्रियअमेठी,सुल्तानपुर
१५९.कलहंसअंगिरसपरिहारप्रतापगढ,बहरायच,गोरखपुर,बस्ती
१६०.बेरुआरभारद्वाजतोमरबलिया,आजमगढ,मऊ





सोमवार, 6 मई 2024

मल्हार वासिनी माँ मल्लिका( माँ डिडिनेश्वरी)

छत्तीसगढ़ राज्य का सबसे प्राचीनतम नगर मल्हार ,जिला मुख्यालय बिलासपुर से दक्षिण-पश्चिम में बिलासपुर से शिवरीनारायण मार्ग पर बिलासपुर से 17 किलोमीटर दूर मस्तूरी है, वहाँ से 14 किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में जोंधरा मार्ग पर मल्हार नामक नगर है। यह नगर पंचायत 21• 55' उत्तरी अक्षांश और 82• 22' पूर्वी देशांतर पर स्थित है। मल्हार, कौशांबी से दक्षिण पूर्वी समुद्र तट की ओर जाने वाली प्राचीन मार्ग भरहुत, बांधवगढ़, अमरकंटक, मल्हार, सिरपुर होते हुए जगन्नाथ पुरी की ओर जाने वाले मार्ग पर स्थित है। मल्हार में समय-समय पर हुए उत्खनन एवं स्वर्गीय श्री गुलाब सिंह ठाकुर जी और स्वर्गीय श्री रघुनंदन प्रसाद पांडे जी को मल्हार से प्राप्त अवशेषों से पता चलता है कि मल्हार का इतिहास ईसा पूर्व एक हजार साल पहले से कलचुरी-मराठा काल तक का क्रमशः इतिहास मिलता है । जिसे प्रथम काल - ईसा पूर्व 1000 से मौर्य काल के पूर्व तक, दूसरा काल- मौर्य काल से सातवाहन-कुषाण काल तक ईसापूर्व 325 से 300 ईस्वी तक , तीसरा काल शरभपुरीय तथा सोमवंशी काल 300 से 650 ईसवी तक, चौथा काल- परवर्ती सोमवंशी काल 650 से 900 ईसवी तक, पांचवा काल- कलचुरी काल 900 से 13वीं शताब्दी तक और फिर बाद का छठाकाल के रूप में हम परवर्ती कलचुरी काल को निर्धारण कर सकते हैं।
     कलचुरियों के बाद मराठा और अंग्रेजों का भी शासन इस क्षेत्र में रहा। जिसे उतनी मान्यता नहीं दी जाती है। कलचुरी वंश के अंतिम शासक रघुनाथ सिंह जी को 1742 ईस्वी में नागपुर का रघुजी भोसले ने अपने सेनापति भास्कर पंत के नेतृत्व में इस क्षेत्र में अपना राज्य स्थापित किया था ।
 मल्हार अपनी शिल्पकला और विविधकलाओं के लिए विश्व प्रसिद्ध रहा है। यह नगर शैव , शाक्त-, वैष्णव ,जैन और बौद्ध धर्म की शिल्प कला के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ भारतवर्ष की सबसे प्राचीनतम विष्णु जी की चतुर्भुजी प्रतिमा है। जिसमें ब्राम्ही लिपि में लेख है। जो इसा पूर्व दूसरी शताब्दी की है। मल्हार जहाँ विशालकाय शिल्प कला के लिए प्रसिद्ध रहा है, वहीं अपनी शुक्ष्मकलाओं के लिए भी प्रसिद्ध रहा है ,पर मल्हार अपने जिस शिल्पकला के लिए सर्वाधिक प्रसिद्ध है ,उनमें से एक है, मल्हारवासिनी माँ डिडिनेश्वरी देवी की प्रतिमा।
        माँ डिडिनेश्वरी एक लोकोत्तर प्रभावशाली दिव्य प्रतिमा है। वह मल्हार के कुछ अज्ञात साधकों के माध्यम से रचनात्मक कार्यों  तथा उनकेके उन्नयन हेतु प्रेरणा स्वरूप, स्वप्न में आकर कभी-कभी मार्गदर्शन दिया करती हैं। 4* 2*1 फीट की माँ , काली ग्रेनााइट पत्थर पर निर्मित है। इस प्रतिमा को डॉक्टर गोमती प्रसाद शुक्ला जी, सहायक संचालक शिक्षा, रायगढ़ ने मल्हार महोत्सव 1988 की स्मारिका के अपने आलेख में चौथी शताब्दी की प्रतिमा माना है। इसका बाद में पुरातत्त्वविदों  ने खंडन करते हुए इसे कलचुरी कालीन प्रतिमा माना है। परंतु यह सर्वमान्य है कि यह पुरातत्त्वविदों ने इसे विश्व की श्रेेेेष्ठतम मर्ति माना है।
     अंजलिबद्ध, ध्यानावस्थित, प्रशांतमुद्रा में अत्यंत आकर्षण की पूंजिभूत राशि, इसकी विशेषताएँ हैं। इस देवी की दोनों बाजू में 3-3 और नीचे में भी तीन देवियों का अंकन हैं। देवी प्रतिमा के बारे में विद्वानों में मत भिन्नता है। कुछ विद्वान इसे दुर्गा का ही रूप मानते हैं । तो कुछ विद्वानों ने इन्हें शिव की परित्यक्ता सुत स्वीकार किया है। कुछ मनिषियों ने इन्हें बुद्ध की पत्नी यशोधरा माना है किंतु देश के अनुरूप दुर्गा (महामाया) का रूप ही अधिक तर्कसंगत लगता है ।यह गोमती प्रसाद शुक्ल जी ने माना है । 
    कलचुरी शासकों (जिन्हें कटच्युरी या कलत्सुरि भी कहा जाता है ) की आराध्या देवी ग्रुप में भी इनकी प्रसिद्धि है। मान्यता है कि मल्हार नगर को राजा वेणु ने बसाया था। कुछ विद्वानों ने इसी कारण से राजा वेणु कि अराध्या के रूप में , इष्टदेेेवी के रूप में भी माना है । इन्हीं की कृपा से राजा वेणु का यश लोक में व्यापक हुआ और उनकी तपः ज्योति ,देव लोक तक पहुँची । राजा वेणु के यश से  मल्हार में स्वर्ण वर्षा हुई थीी । उस घटना की पुष्टि यहाँ के कृषकों द्वारा यदा कदा स्वर्ण प्राप्ति से होती है।
      महाभारत में उल्लेखित दुर्गा के सहस्त्रों नामों में से एक यह एक नाम है ।जो अपभ्रंष रूप में प्रसिद्ध हो गया है। ग्रामीण अंचल में कुँवारे लड़कों को डड़वा या डीड़वा कहा जाता है। उसी तरह कुँवारी लड़कियों को डिड़वी, डिंडिन, या डिंडन कहा जाता है। मल्हार में यह निषाद समाज में और अन्य समाजों में प्रचलित शब्द है । और चूँकि यह देवी क्योंकि निषाद समाज द्वारा जीर्णोद्धार कराया गया था तो उनकी आराध्या देवी शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्विनी रूप में यह पार्वती की प्रतिमा डिडिनेश्वरी रूप में प्रसिद्ध हो गयी। तपोमुद्रा में यह स्पष्ट है कि यह तपस्यारत पार्वती की प्रतिमा है । यद्यपि पार्वती जी की तपोभूमि हिमालय है। फिर भी शिव की आराधना के निमित्त या किसी-किसी मनौती  के अभिप्राय से इस स्थल पर तपस्विनी एवं महामाया पार्वती की मूर्ति की स्थापना किया होगा।
        डिण्डिम उग्रनाद का पर्याय है। भगवान शंकर का डमरू भी डिण्डिम ध्वनिवाला है ।अतः शिव के साहचर्य से डिण्डिमनाद या  अनहद नाद की स्वामिनी पार्वती हुई । कालांतर में यह शब्द विकृत होकर डिण्डन हो गया । मल्हार के इस मंदिर परिसर में उत्खनन कार्य होने से परिसर में पुरातत्व अवशेष प्राप्त हुआ था। इससे इस स्थल पर एक विशालकाय मंदिर होने का भी पता चला है। जो काल के गर्त में समा गया है । इस मंदिर का प्रणाला उत्तर दिशा में मिला था। इस पर मकर बना हुआ है , जो एक कुंड में जाकर समाप्त होता है।
     पहले, मल्हार में, राज्य सरकार द्वारा संरक्षित एकमात्र स्मारक था। जिसे 18 अप्रैल 1991 की एक त्रासदी घटित हो जाने के कारण इस देवी प्रतिमा को चोरों द्वारा चुराकर इस प्रतिमा को  उत्तर प्रदेश के मैनपुरी के नंबर के एक सफेद रंग की वैन के माध्यम से मैनपुरी ले जाया गया था। जिसे सरसों के खेत में गड्ढा खोदकर गाड़ दिया गया था।  जिसे तत्कालीन पुलिस महानिदेशक सुशील मोदी और पुलिस अधीक्षक संत कुमार पासवान और थाना प्रभारी मंडावी जी के सजगता से दिनांक 19 मई 1991 को बरामद किया गया। उसे बिलासपुर सिविल लाइन थाने में दर्शन हेतु रखा गया ।उसे दिनांक 7 जून 1991 पूरे क्षेत्र के लोगों के द्वारा पदयात्रा करते हुए कीर्तन भजन और करमा नृत्य करते गाते-बजाते, गाने-बाजे की धून में मूर्ति को पुनः मल्हार लाकर प्राण प्रतिष्ठित किया गया। इस घटना का मैं प्रत्यक्षदर्शी था। और नाच भी रहा था।  तब से परिसर में 1-4 का नगर सैनिक सुरक्षा हेतु तैनात किया गया है ।
          सन् 2000 ईस्वी से मंदिर का जीर्णोद्धार किया जा रहा है। जो धीरे-धीरे पूर्णता की ओर अग्रसर है। इसे नए स्वरूप ,उड़ीसा के कारीगरों के द्वारा दिया जा रहा है । इससे मंदिर की कलात्मकता में वृद्धि हुआ है । मंदिर की सुंदरता बढ़ाने के लिए राजस्थान से लाए गए गुलाबी पत्थरों को तराश कर  मंदिर के दीवारों का निर्माण किया गया है । अब यह छत्तीसगढ़ शासन द्वारा 'लोक न्यास ट्रस्ट माँ डिडिनेश्वरी मंदिर' के माध्यम संचालित किया जा रहा है। साल में दोनों ही नवरात्रियों  में यहाँ घी और तेल का भी मनोकामना ज्योति कलश प्रज्वलित की जाती है। जिसकी संख्या हजारों में होती हैं। 
      अंग्रेजी शासनकाल में अंग्रेज अधिकारियों द्वारा इस प्रतिमा को उठाने का अनेक बार प्रयास हुआ था। पर उस समय उन लोगों को तत्काल शारीरिक पीड़ा होने लगी थी ।  जिस कारण वे इस प्रतिमा को नहीं ले जा सके थे। इस कारण से इसकी सुरक्षा हो सकी थी।
       डिडिनेश्वरी का एक नाम मल्लिका भी है। 'मल्लालपतन' जो 'मल्लिकापत्तन' का परिवर्तित नाम है। उस समय यह नगर विशाल वैभवशाली नगर के रूप में अवस्थित था और उस समय यह देवी नगर की अधिष्ठात्री देवी थी। जिसके कारण इस देवी का एक नाम मल्लिका भी है। अनेक साधकों का मत है कि मल्हार एक सिद्धशक्तिपीठ भी है ।यहाँ रात्रि में विश्राम करने पर पायल और घुंघरु के मंदस्वर  झंकृत होते हैं।इस सत्य का साक्षात्कार राधोगढ़ के साधक 'बाबादीप',  कामाख्या के साधक रामजी मिश्र और मुंगेर के युवा तांत्रिक बलराम तिवारी ने प्रत्यक्ष किया है। जिसकी पुष्टि स्थानीय पुजारी श्री चौबे जी भी  करते हैं। 
        मल्हार में कुछ गुप्त साधक अब भी हैं । जिनके पास अनेक तांत्रिक सिद्धियाँ हैं । किंतु उनकी गुढ़ता, गंभीरता और अलौकिक जानकारी नहीं हो पाती है। उन्हें कुछ  गोपनीय सिद्धियाँ भी माँ की कृपा से प्राप्त है । जिसे वे देेेवी माँ की प्रेरणानुसार वे कार्य करने की चेष्टा करते हैं। और विषम परिस्थिति में भी कार्य की संपन्नता करा देते हैं जो उनके सिद्धि को प्रमाणित करते हैं ।वे अनेक रोगों का शमन भी देवी की विभूति से करवाते हैं।
        मान्यताएं अलग-अलग हो सकती हैं ,पर मूर्ति शिल्पशास्त्र के अनुसार डिडिनेश्वरी माई ( डिड़िनदाई)  की प्रतिमा कलचुरी काल की 10-11वीं  शताब्दी की ही है। देवी 4 फीट की ऊंचाई की गहरे काले रंग की ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित पद्मासन मुद्रा में तपस्या करती हुई, एक राजकन्या है । जिसका कटिप्रदेश पतली और कुंचन(उरोज) समुन्नत प्रतिमा है। जो उसे सोड्शी प्रतीत कराती है।  जो अपने पूर्ण यौवन में है। जिसने सिर पर छत्र धारण की हुई है। जो उन्हें राजकन्या होने का एहसास कराती है। तो सिर के पीछे स्थित प्रभामंडल होने से उन्हें देवी के रूप में प्रकट करती है। सिर पर मुकुट, कानों में कुंडल, गले में हार , भुजाओं में बाजूबंद, पैरों में पायल, ललाट में बिंदी आदि सोलह श्रृंगार की हुई दिव्य अलौकिक प्रतिमा हैं। जिसे ध्यान से देखने पर सुबह बालिका दोपहर में युवतीऔर रात्रि में महिला की आभा लिए स्पष्ट प्रतीत होती है। पादपृष्ठ में दोनों जानुओं के नीचे सिंह निर्मित होने से इसे कुमारी (पार्वती) की, शिव को पति रूप में प्राप्त करने की पार्वती  की प्रतिमा प्रतीत होती है, जिसने भगवान शिव को पति रूप में पाने  तपस्या करती हुई, उन्हें विवश कर दिया था।इसीलिए यह मान्यता है कि कोई भी युवती अपने इच्छितवर की प्राप्ति चाहते हैं। वे  इनकी दर्शन और मनौती बाँधते हैं और मनोकामना ज्योति कलश प्रज्वलित कराती हैं आप उनकी तेज को स्पष्ट रूप से सुबह जागृत अवस्था में दोपहर में शांतमुद्रा में और रात्रिकालीन आरती में  चेहरे में तेज प्रभामंडल को देख सकते हैं ।          इस मंदिर को राज्य सरकार ने  1987 में संरक्षित घोषित किया था जिसे अब ट्रस्ट बनाकर संरक्षणमुक्त  कर दिया है।
                                 हरि सिंह क्षत्री(मल्हारवाले)
                                          मार्गदर्शक
                             जिला पुरातत्त्व संग्रहालय कोरबा
                                     मो0  9827189845
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