मंगलवार, 19 मई 2026

लिखामाड़ा शैलाश्रय ओंगना, एक नवीन अध्ययन

1/- तिथि - 9/5/2026
2/- विषय - लिखामाड़ा शैलाश्रय ,ओंगना , धरमजयगढ़, रायगढ़ 
3/-  स्थिति
          लिखामाड़ा शैलाश्रय , ओंगना , धरमजयगढ़ तहसील एवं विकासखंड अंतर्गत आता है। ओंगना गांव पटवारी हल्का नंबर 30 के अंतर्गत आता है। जिला मुख्यालय रायगढ़ से धरमजयगढ़ की दूरी लगभग 70 किलोमीटर है। यहां से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर ओंगना गांव है। गांव से लगभग 1-2 किलोमीटर की दूरी पर लिखामाड़ा शैलाश्रय पहाड़ी पर स्थित है।
          वहीं जिला मुख्यालय कोरबा से रिस्दी ,कोरकोमा, चचिया, हाटी होते हुए लगभग 72 किलोमीटर की दूरी पर धरमजयगढ़ पड़ता है। यहां श्री धीरेन्द्र सिंह मालिया जी से संपर्क कर ओंगना जाने पर मार्ग सहज हो जाता है। उनके साथ चलने पर धरमजयगढ़ से पांच किलोमीटर दूर स्थित ओंगना गांव आसान पड़ता है।  ओंगना गांव पहुंचकर बांयें तरफ एक मोड़ आता है । यहां से थोड़ी दूर पर क्रिकेट का एक मैदान है , जिसमें एक मंच भी बना हुआ है। यहां पर चार पहिया वाहनों को खड़ा कर पैदल ही लिखामाड़ा शैलाश्रय ओंगना तक पहुंचा जा सकता है। जबकि दो पहिए वाहन से शैलाश्रय तक सीधे ही पहूंच सकते हैं।*1
4/-- अक्षांश और देशांतर 
           22°26'17" उत्तरी अक्षांश और 83°14'13" पूर्वी देशांतर पर समुद्र तल से 1286.71 फिट +-155 
5/- अनूमानित समय 
             लिखामाड़ा शैलाश्रय ओंगना के शैलचित्रों का अनुमानित समय पुरातत्व वेत्ताओं ने 10,000 - 15000 बीसी माना गया है। परन्तु मेरा मत है कि इनमें से दो शैलाश्रयों के शैल चित्रों का अनुमानित समय पौराणिक काल का होना चाहिए।
6/- मापन 
                 लिखामाड़ा शैलाश्रय ओंगना एक पहाड़ी पर स्थित है। जिसमें अनेक छोटे-बड़े शैलाश्रय हैं। पहाड़ी के जिस हिस्से में शैल चित्र और पाषाण कालीन लघु उपकरण मिलते हैं लगभग 200 मीटर के परिक्षेत्र में विस्तृत है।*2
7/- अवलोकन 
             रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ तहसील व विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत ओंगना तहसील मुख्यालय से महज 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जहां से पहुंचने के लिए पक्का सड़क मार्ग है । ओंगना शब्द लोक भाषाओं विशेष कर छत्तीसगढ़ी ,भोजपुरी, अवधि आदि में प्रयुक्त होता है। जिसका अर्थ लिपना या पोतना होता है।  विशेष रूप से गोबर, मिट्टी या गेरू से घर आंगन या दीवार को लीपना या ओंगना। जैसे कि घर के आंगन ल गोबर से ओंगना / लिपना / पोतना अर्थात् आंगन को गोबर मिट्टी से लिपना।                   यह शब्द ग्रामीण परंपराओं पर लोक संस्कृति से जुड़ा हुआ है। जहां त्योहारों या शुभ अवसरों पर घर को ओंगना (सजाना) या पोतना शुभ माना जाता है।
                दूसरे अर्थ में ओंगना का अर्थ 'पोतना' से लगाया जाता है। ग्रामीण अंचल में बैल अथवा भैंस गाड़ा होता है। इसके मध्य में पुटी लगा होता है। जो लोहे का बना होता है। गाड़ी चलने पर इसमें घर्षण होता है। इसी घर्षण को कम करने के लिए पहिए में ग्रीस या अंडी का तेल लगाया जाता है । लिखामाड़ा शैलाश्रयों के पास से ही प्राचीन गाड़ा मार्ग (रवन) गुजरता है। यहां से गुजरते समय ग्रामीण पहिए में तेल य ग्रीस ओंगते (डालते)  थे।  इससे पहिए में घर्षण कम होती है। इसी कारण इस गांव का नाम ओंगना पड़ा।*3
                     मेरी मत है कि यहां की प्राचीन सांस्कृतिक पहचान के कारण पहले वाला कारण ज्यादा उचित लगता है यहां के शैलाश्रय को हम चार भागों में बांट सकते हैं। जिसका अपना सांस्कृतिक महत्व है ।
1/- लिखामाड़ा 
 2/- आवासीय माड़ा 
3/- रावणमाड़ा, और 
4/- बंदरमाड़ा।
 1/-  शैलाश्रय क्रमांक -1- लिखा माड़ा :-
                      ओंगना गांव के शैलाश्रयों को तो पुरा देश लिखामाड़ा*4 के नाम से जानते हैं। लेकिन इसे चार भागों में रखा जा सकता है। इसमें पहले ही शैलाश्रय को जिसमें लगभग 400 से अधिक की संख्या में शैल चित्र हैं।*5 यह शैलाश्रय अपने नाम के अनुरूप ही है। इस शैलाश्रय को ह‌म ‌प्रागैतिहासि‌क ‌काल का मान सकते हैं। पूर्व में ही पुरातत्ववेत्ताओं ने यहां के चित्रों को 10,000 से 15,000 वर्ष बीसी के मध्य का माना है। 
                         लिखामाड़ा शैलाश्रय इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करता है। लिखामाड़ा शैलाश्रय 22°26'17" उत्तरी अक्षांश और 83°14'13" पूर्वी देशांतर पर समुद्र तल से 1286.71 फिट +-155 फिट की ऊंचाई पर स्थित है। इस शैलाश्रय में प्राचीन संस्कृति की  की संपूर्ण झलक दिखाई गई है। इस शैलाश्रय में सामुहिक नृत्य करते हुए मानव , प्रागैतिहासिक काल के मानवों के पंजे ज्यामितीय चिन्ह, बैल आदि बनाए गए हैं। इस शैलाश्रय के चित्रों में रेखांकन कार्य बहुत ही बारिकी से किया गया है। यहां यह भी स्पष्ट होता है कि यहां पूर्व में भी चित्र रहे होंगे। जिसको पुताई (ओंग )कर दोबारा चित्र बनाने का प्रमाण मिलता है। यहां आदिमानवों के द्वारा लंबी अवधि बिताई गई होगी। जिसका प्रमाण यहां के चित्र देते हैं ।यहां के चित्र न तो किसी एक व्यक्ति के द्वारा बनाया गया प्रतीत होता है ,और न ही किसी एक काल में ही ।
                         एक कलाकार होने के नाते चित्रकला में मेरा जो अनुभव है, उसके आधार पर यह कह सकता हूॅं कि यहां के चित्रों को प्रागैतिहासिक काल के किसी महिला के द्वारा बनाई गई होगी। यह अनुभव जनित ज्ञान है। पुरुषों के अपेक्षा महिलाएं भावनात्मक रूप से कहीं अधिक कोमल होती हैं। यहां के चित्र भाव प्रधान है। लकीरें महीनता से खींची गई हैं । यहां के चित्र तात्कालिक संस्कृति की झलक प्रदर्शित करती हैं।
                          विदेशी विद्वानों में विक्टर लाॅनफोर्ड , रोधा केलाॅग और हार्वर्ड गार्डनर जैसे विद्वानों का भी मत है कि स्त्रियां या बालिकाऐं मानव आकृतियों और सजावटी पैटर्न की ओर अधिक आकर्षित होती हैं। लड़कियां डिटेल्स और पर्सनल रिश्तों पर जोर देती हैं, जबकि लड़के एक्शन और मुवमेंट पर।
                             भारतीय संदर्भ में महिलाओं द्वारा निर्मित लोक चित्रों में अलंकरण, प्रकृति, देवी-देवता, विवाह, उत्सव और घरेलूजीवन के दृश्य अधिक मिलते हैं, जबकि पुरुष कलाकारों में युद्ध, शिकार, राजकीय दृश्य, स्थापत्य तथा वीरता प्रधान चित्र अधिक पाए जाते हैं।
                            उपरोक्त दोनों ही मतों के आधार पर अगर हम ओंगना के लिखामाड़ा शैलाश्रय पर बने शैल‌चित्रों पर ध्यान दें, तो यहां के चित्रों में कहीं भी शिकार के चित्र नहीं दिखता है। यहां के चित्रों में हाथ के पंजे, ज्यामितीय अलंकरण, सामूहिक नृत्य, जिसमें सब  एक साथ समूह में नृत्य करते हुए दिखाई देते हैं।
                             
                        गहराई से चित्रों को देखने पर एक बात और स्पष्ट होती है कि लिखामाड़ा शैलाश्रय के अधिकांश चित्रों को किसी गर्भवती महिला के द्वारा बनाई गई होगी। गर्भवती होने के कारण उसे शैलाश्रय में ही अधिक समय व्यतीत करना होता होगा। ऐसे में खाली समय में विभिन्न प्रकार के विचार उनके मन में आते रहे होंगे । वह महिला अपने भावी जीवन और आने वाले नन्हें मेहमान को जीवन मार्ग की शिक्षा देने और विविध सांस्कृतिक क्षेत्र से सचित्र परिचय कराने के लिए , पहले शैलाश्रय के खाली स्थान पर विविध चित्रों की रचना की होगी। जब कोई खाली जगह नहीं बचा होगा तो पुराने चित्रों को मिटाकर, तो कहीं-कहीं उसके ऊपर दोबारा नए चित्र बनाएं जाने का साक्ष्य यहां दिखता है।
                          मेरे विचारों को सिद्ध करने के लिए यहां शैलाश्रय में बनी हुई एक गर्भवती महिला की भी चित्र देखने को मिलता है। यहीं नहीं यहां के चित्रों में पतली और गहरी रेखाओं को देखा जा सकता है। ऐसी रचना निश्चित रूप से कोमल मन वाली किसी महिला की ही चित्रकारी हो सकती है। माना जा सकता है कि यह चित्र उसी गर्भवती महिला के द्वारा ही बनाया गया होगा। जिसका चित्र लिखामाड़ा शैलाश्रय ओंगना में बना हुआ है।
                           एक चित्र में एक युगल दंपति को नृत्य करते हुए पारंपरिक वेशभूषा में दिखाया गया है इसमें दोनों को ही हार्नबिल नामक पक्षी के पूंछ को अपने सिर पर धारण किए हुए दिखाया गया है। दोनों के ही एक-एक हाथ कमर पर तो दूसरा ऊपर की ओर उठा हुआ नृत्य मुद्रा में हैं । पुरुष ने कमरबंद भी धारण किया हुआ है। इसके सिर पर पंछी के पूंछों की पंखों की संख्या अधिक है । इससे यह भी स्पष्ट होता है कि तात्कालिक संस्कृति भी पुरुष प्रधान रही होगी।
                             एक चित्र में चार बैलों के मध्य एक मनुष्य को दिखाया गया है। उस मनुष्य ने एक हाथ से एक बैल के सिर और दूसरे हाथ से दूसरे बैल के पूंछ को पकड़ रखा है। जो इस बात का संकेत देता है कि उस समय मानव के द्वारा पशुओं को पालना और उस पर नियंत्रण करना सीख लिया गया होगा । इसे नवपाषाणकालीन  चित्र माना जा सकता है। 
                            यह संरक्षित और ज्ञात शैलाश्रय है । इसलिए इसके बारे में विस्तृत लिखना उचित नहीं है। जितना नवीन शोध सामने आया वही लिखना उचित होगा।
2/- शैलाश्रय क्रमांक -2- आवासीय माड़ा
                             लिखामाड़ा शैलाश्रय से लगा हुआ ही 18 फीट गहरी एक गुफा है । इसकी सतह चिकनी हो गयी है । यह तब होता है जब यहां आने-जाने के लिए बहुतायत से उपयोग किया गया होगा। जिसके  बारम्बार घर्षण से  शैलाश्रय का सतह चिकना हो गया है। गुफा के बाहर लाल गेरूवे रंग के शैलचित्र भी बने हुए हैं। इस शैलाश्रय का उपयोग जंगली जानवरों के द्वारा भी किया जाता रहा होगा। जिसे हटाकर आदिमानवों ने इस जगह पर अधिकार किया होगा।* 6 जिसका उपयोग वे सुरक्षित निवास एवं वातावरण के दुष्प्रभाव से बचने के लिए करते रहे होंगे।
3/- शैलाश्रय क्रमांक -3- रावणमाड़ा 
                      शैलाश्रय क्रमांक 2 से आगे बढ़ने पर पहाड़ी मोड़ को पार करने पर शैलाश्रय क्रमांक तीन आता है।‌ यह शैलाश्रय  22° 26' 17" उत्तरी अक्षांश और 83° 14' 40"  पूर्वी देशांतर पर समुद्र तल से 1184.68 +- 187 फीट की ऊंचाई पर एक प्राकृतिक शैलाश्रय है। इसमें 10 सिरों वाली आकृतियां बनी हुई हैं । विद्वानों  द्वारा इसे दशानन रावण का चित्र माना जाता हैं । स्थानीय मान्यता भी यही है। अगर इसे दशानन रावण माना जाता है , तो इसे पौराणिक काल का चित्र माना जा सकता है यदि विद्वानों द्वारा इसे रावण का चित्र स्वीकार किया जाता है तो एक नई विचारधारा पुरातत्व के विद्यार्थियों में जन्म लेगी कि क्या शैलचित्रों में रामायण की कथानक भी बनाए गए हैं ? इस आधार पर पुरातत्व के क्षेत्र में क्या शैल चित्रों को रामायण कालीन प्रमाण माना जा सकता है ? क्या इसके वैज्ञानिक आधार पर परीक्षण कर रामायण की तिथि निर्धारण करने में भी सहायता  मिल सकती है ? यहां शैलाश्रय में तीन-चार की संख्या में दशानन रावण को देखा जा सकता है। इसका वैज्ञानिक शोध करना आवश्यक है।  शोध का विषय भी है कि यह वास्तव में किस काल की कृति है ?  इस कारण से यह एक महत्वपूर्ण चित्रित शैलाश्रय हो सकता है।
4/- शैलाश्रय क्रमांक - 4- बंदरमाड़ा -
                        शैलाश्रय क्रमांक 3 के आगे लगभग 50 मीटर चलने पर शैलाश्रय क्रमांक चार आता है। यह शैलाश्रय 22° 26' 19" उत्तरी अक्षांश और 83° 14' 40"  पूर्वी देशांतर पर समुद्र तल से 1185.6 +- 328 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इस शैलाश्रय में भी पौराणिक कालीन शैलचित्र बना हुआ माना जा सकता है। इसमें कुछ चित्र नवपाषाण कालीन भी प्रतीत होते हैं। इस शैलाश्रय के प्रमुख चित्रों में से एक वह चित्र है, जिसमें एक काले रंग के गड्ढे को सिर बनाकर दैत्याकार एक चित्र बनाया गया है। दैत्याकार कहने का अर्थ है कि यहां शैलाश्रय में कुछ बंदर और मानव द्वंद्व को दिखाएं गए हैं । इन आकृतियों की अपेक्षा वह आकृति बहुत बड़ा है। यदि हम शैलाश्रय क्रमांक -3 में दशानन रावण का सचित्र मानते हैं, तो क्या यह  शैलाश्रय क्रमांक 4 का शैलचित्र उनके अनुज कुंभकरण का हो सकता है ? यहां के शैलचित्रों में कुछ जगह वानर और मानव द्वंद्व को चित्रित किया गया है। तो क्या यह राम-रावण युद्ध को प्रदर्शित किया गया है ? यदि हम उसे कुंभकरण नहीं मानते हैं, तो क्या यह विशाल दैत्याकार आकृति किसी दैत्य या कोई भूत की आकृति है ? क्योंकि इसके सिर को यह जहां काले गड्ढे को  अंधकार युक्त दिखाया गया है।  इसी शैलाश्रय में एक जगह दशानन को भी दिखाया गया है। जिसके आगे दो मानवाकृतियों को मशाल लेकर जलाते हुए दिखाएं गए हैं । इसी शैलाश्रय में स्वास्तिक और चक्र जैसे शुभता के प्रतीकों को भी बनाया किया गया है।  क्या यह सब महज एक संयोग है ? या फिर सोच समझकर बनाई गई रामायण के कथानक पर आधारित चित्रों को प्रदर्शित किया गया है।
8/- निष्कर्ष:-
                   ओंगना के शैल चित्रों को आधार मानकर हमें पौराणिक धारणाओं को इतिहास मानकर अन्य जगहों में मिले शैलचित्रों का भी अध्ययन करना चाहिए, तब शायद शैलचित्रों के प्रति पाश्चात्य अवधारणाओं को खंडित कर भारतीय विचारधारा धाराओं को पुरातत्व के क्षेत्र में अंगीकार कर, पुराने ढर्रे  पर चले आ रहे अवधारणाओं को ध्वस्त किया जा सकता है क्योंकि कोरबा जिले के सूअरलोट गांव के सीताचौकी शैलाश्रय में मिले सीताहरण के कथानक संबंधित शैलचित्रों की कथानक पर हमने अपनी खोज और मत को विद्वानों  के समक्ष सप्रमाण रखा एवं शोध-पत्र भी प्रकाशित किया है।  
                     लिखामाड़ा शैलाश्रय के विस्तृत क्षेत्र में मध्य पाषाण कालीन लघु उपकरणों और कोरों का भंडार है। जो रत्नों और उपरत्नों के स्तर के हैं। इस तरह यह शैलाश्रय हर दृष्टि से अत्यंत ही महत्वपूर्ण हो जाता है। जिसपर विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता है।
9/- संदर्भ :-
1/-  प्रो. श्री धीरेन्द्र सिंह मालिया - स्थानीय जानकारी, धरमजयगढ़ 
2/ - प्रो. श्री धीरेन्द्र सिंह मालिया - स्थानीय जानकारी, धरमजयगढ़ 
3/-  प्रो. श्री धीरेन्द्र सिंह मालिया - स्थानीय जानकारी, धरमजयगढ़ 
4/- श्री बसंत प्रधान - साक्षात्कार, केयर टेकर, लिखामाड़ा शैलाश्रय, ओंगना 
 5/- श्री बसंत प्रधान - साक्षात्कार, केयर टेकर, लिखामाड़ा शैलाश्रय, ओंगना 
 6/- प्रो. श्री धीरेन्द्र सिंह मालिया - स्थानीय जानकारी, धरमजयगढ़ 
 (लेखक - श्री हरि सिंह क्षत्री मार्गदर्शक जिला पुरातत्व संग्रहालय कोरबा ,
प्रांत संयोजक, कला धरोहर विभाग संस्कार भारती छत्तीसगढ़, 
धरोहर यात्रा- श्री धीरेन्द्र सिंह मालिया, जिला- संयोजक, रायगढ़, कला धरोहर)

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

वीरानी लीलाएं

वीरानी लीला और इतिहास का सच -------
काली स्याह रातों में 
घने जंगलों से 
गुजरता हुआ मैं 
किसी एक पहाड़ी गुफा से 
एक भयानक दर्द भरी आवाज 
मेरी कानों में गूंज गई 
दहसत और अज्ञात भय से 
भयभीत और आशंकित मन
उस वीराने की ओर सहसा ही 
मेरा सिर घुमता चला गया। 
अज्ञात भय ने उस दिन पथ रोका।
क्या हुआ होगा ?
किसकी चीख उठी होगी ?
इतना दर्द किसकी होगी ?
क्या कोई पशु की होगी चीख ?
या वीरानी ताकतों की ?
अकेला ही था , न था प्रकाश।
पर सशंकित मन प्रश्नों को दे गया था जन्म 
उस रात की चीख की सच क्या रही होगी ?
मचल उठा था मन उधर जाने को।
चल पड़ा था अकेले ही घर से 
किसी को कुछ कहा ही नहीं था।
चल पड़ा उस गांव की ओर 
एक और ही खोज की ओर।
गांव के एक वयोवृद्ध से 
उस रात की चीखों की चर्चा करते हुए 
सच जानने की आशा से 
एक बुजुर्ग से किया संवाद।
उस दिन उसने भी चित्कार सुना था।
जिससे गांव वाले भी आतंकित थे।
गांव में झाड़-फूंक वह करता था।
गांव गांव में ऐसी कहानियां होती हैं।
भय का भ्रमजाल फैली होती है।
खूनी पंजे की कहानियां सूनाई जाती थी।
गुफाओं में होती है चूडैल और वीरानी शक्ति 
उस रहस्य को भेदना चाहता था।
उस दिन उसने साथ मिलकर 
उस रहस्य को उजागर किया था।
हमने देखे थे खूनी पंजे, 
हड्डियों का ढेर, फूटी हुई मिट्टी के बर्तन के टूकड़े
उस दिन वहां किसी जंगली जानवर ने वहां 
किसी मासूम का शिकार किया था।
उस दर्द में भयानक संघर्ष की कहानी 
उस गुफा में जगह जगह बिखरी थीं।
उस दिन गांव में उस भयानक चीख़ों की सच लौट आया 
उस गुफा की आदिम कहानी से रुबरु होकर 
गांव को वहां की अज्ञात भय से मुक्ति मिली।
और मुझे मिला पुरातत्व का खज़ाना 
फिर क्या था, मुझे मिलने लगे थे साथी
खोज की सिलसिला चल पड़ा।
इस तरह वीरानी दहसत ने 
जैसे यहां की इतिहास ही बदल दिया।
स्वरचित कविता - 
हरि सिंह क्षत्री मार्गदर्शक जिला पुरातत्व संग्रहालय कोरबा 
मोबाइल -9827189845



रविवार, 1 फ़रवरी 2026

मैं रामगढ़ बोल रहा हूॅं।

        कल माघ सुदी शुक्लपक्ष की त्रयोदशी तिथि थी । संस्कार भारती के कला धरोहर विभाग द्वारा इस तिथि को सृष्टि के शिल्पकार , निर्माण एवं सृजन के देवता देवशिल्पी भगवान श्री विश्वकर्मा की जयंती मनाने का निर्णय लिया था। इसके बाद इस वर्ष अंग्रेजी माह  के 31 जनवरी को माघ शुक्ल 13/14  दोनों ही तिथि एक साथ पड़ रही है। जैसे कि निश्चित हुआ था कि इस तिथि को हमें भगवान श्री विश्वकर्मा जी के जयंती दिवस समारोह के रूप में मनाया जाना है। हमें चाहिए कि अपने अपने प्रांतों में कोई एक स्थान पर या जहां जहां हमारे कार्यकर्ता हैं। अपने अपने प्रांतों में स्थित स्थापत्य कला और शैली को ध्यान में रखते हुए एक घंटे का आयोजन किया जाना चाहिए। जिसमें अपने क्षेत्र के प्राचीन मंदिर, भवन या अन्य प्राचीन धरोहर में जाकर कोई न कोई कार्यक्रम आयोजित किया जाना चाहिए जिसका फोटो ग्राफी /विडियो ग्राफी कर समूह में पोस्ट किया जाना चाहिए। इससे हम अपने क्षेत्रों की प्राचीन धरोहरों को सीधे ही विश्वकर्मा भगवान से जोड़ सकते हैं। हो सके तो वर्तमान में जो कलाकार कार्यरत हैं उन्हें बुलाकर साल और श्रीफल भेंटकर सम्मानित भी किया जा सकता है। इससे हम लोगों तक सीधे ही पहुंच सकते हैं।  इसे ही ध्यान में रखकर छत्तीसगढ़ प्रांत कला धरोहर विभाग द्वारा अंबिकापुर जिले से 45 किलोमीटर मीटर दूर स्थित विकासखंड उदयपुर से तीन किलोमीटर दूर स्थित रामगढ़ पहाड़ी में स्थित प्राचीन नाट्यशाला , जोगीमारा गुफा और राममंदिर में स्थापित मूर्तियों की जानकारी जन-मानस को देने का निर्णय लिया। जिससे स्थानीय लोगों और पर्यटकों को इस क्षेत्र की प्राचीनता और महत्ता को धरोहर यात्रा और  धरोहर वार्ता के अंतर्गत कार्यक्रम को सफलतापूर्वक सम्पन्न किया गया।
                      छत्तीसगढ़ राज्य के अंबिकापुर जिले के उदयपुर विकासखंड अंतर्गत पुटा गाँव में रामगढ़ पहाड़ियों के उत्तरी भाग में स्थित प्राचीन गुफा स्मारक हैं । तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से पहली शताब्दी ईसा पूर्व के बीच निर्मित सीता बेंगरा और जोगीमारा गुफा के अलावा भी यहां अनेक गुफाएँ  हैं। जिनमें से कुछ प्राकृतिक रूप से निर्मित हैं तो कुछ मानवीय और तराशें हुए हैं। इन गुफाओं में से दो गुफाओं में ब्राम्ही लिपि और मगधी भाषा में लिखे गए कुछ अभिलेख हैं। कुछ विद्वानों का मानना ​​है कि सीताबेंगरा गुफा भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे पुराना प्रदर्शन रंगमंच है, जबकि अन्य इस बात पर सवाल उठाते हैं कि क्या यह वास्तव में एक रंगमंच था ? वे सुझाव देते हैं कि यह किसी प्राचीन व्यापार मार्ग पर विश्राम स्थल रहा होगा।  जोगीमारा गुफा के शिलालेख पर भी विद्वानों में विवाद है, कुछ इसे एक लड़की और लड़के द्वारा प्रेम-चित्रण के रूप में व्याख्यायित करते हैं तो दूसरा इसे एक नर्तकी और एक पुरुष मूर्तिकार या चित्रकार द्वारा दूसरों की सेवा के लिए दो गुफाओं का संयुक्त रूप से निर्माण करने के रूप में व्याख्यायित करते हैं । जहां जोगीमारा गुहा शिलालेख में "देवदासी" शब्द का सबसे पुराना ज्ञात अभिलेख भी माना जाता है। प्राचीन काल में देवदासी प्रथा का प्रचलन था। जो किसी मंदिर में भगवान के लिए समर्पित मानी जाती थी। लेकिन इस क्षेत्र में उतना प्राचीन मंदिर प्राप्त नहीं होता है। 
ये गुफाएँ आंशिक रूप से प्राकृतिक और आंशिक रूप से नक्काशीदार हैं। क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार, इनका संबंध रामायण महाकाव्य से है , जहाँ सीता, राम और लक्ष्मण अपने वनवास की शुरुआत में आए थे। यहाँ पाए गए सबसे पुराने अवशेष मुझे मौर्यकालीन पक्की मिट्टी की बनी महिला की सिर और  वक्षस्थल तक का भाग काले संगमरमर के बने पात्रों के अवशेष बौद्ध भिक्षुओं द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले धातु से बनी भिक्षापात्र टुकड़े और अन्य धातु खंड के अलावा भी बहुत कुछ मिला है। पहाड़ी  के ऊपर मंदिर में स्थापित कलाकृतियाँ रामायण से संबंधित हैं । जिसमें भगवान  श्री राम,  हनुमान, सीता  शेषनाग रुपी लक्ष्मण  और चतुर्भुजी भगवान् श्री विष्णु जी अपने वाहन गरुड़ के साथ काले ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित है। मूर्तिकला के आधार पर ये सभी संभवतः 8 वीं से 12वीं शताब्दी के बीच की कलचुरी कला की तरह प्रतीत होते हैं।

        जोगीमारा और सीताबेंगरा गुफाएं भारत में पाई जाने वाली अन्य सभी प्राचीन गुफाओं से बनावट और सजावट दोनों में भिन्न हैं। अन्य स्थलों में हमेशा धार्मिक प्रतीक और चिह्न पाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, बौद्ध गुफाओं में स्तूप या उससे संबंधित प्रतीक होते हैं, और बाद की गुफाओं में बुद्ध से संबंधित नक्काशी और चित्र जोड़े गए हैं। जैन गुफाओं में  तीर्थंकरों से संबंधित प्रतीक या चिह्न होते हैं । किसी भी बौद्ध या जैन गुफा में पाए जाने वाले शिलालेख या चित्रों में हमेशा बुद्ध या तीर्थंकर का उल्लेख होता है। सीताबेंगरा गुफा के बाहर दाहिने तरफ दो पदचिह्न  बनाए गए हैं ।

जिसके आधार पर जैनी इसे जैन गुफा मानते हैं। जबकि शिलालेख काव्यात्मक हैं। 

          

       

सीताबेंगरा गुफा आंशिक रूप से तराशे गए मंच जैसी दिखती है। इसके सामने अर्धगोलाकार चट्टानों से तराशी गई पत्थर की बेंचों की दो पंक्तियाँ हैं। इस स्थल की तस्वीर खींचने वाले बेगलर के अनुसार, ये गुफा में प्रवेश करने के लिए सीढ़ियाँ रही होंगी। गुफा के बाईं ओर पहले से ही सीढ़ियों का एक और सेट बना हुआ था, इसलिए इन लंबे हिस्सों को खाली जगह के साथ काटना व्यर्थ लगता है। ब्लोच का कहना है कि ये बेंचें लोगों के बैठने और प्रदर्शन मंच देखने के लिए रही होंगी। इन पत्थर की बेंचों पर "लगभग 50 या उससे अधिक" लोग आसानी से बैठ सकते थे।  सुरक्षित पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए, स्थानीय अधिकारियों ने सीताबेंगरा गुफा के पास सीढ़ियाँ, देखने के लिए चबूतरे और अन्य सुविधाएँ बनाई हैं।

             सीताबेंगरा गुफा 22°53'53" उत्तरी अक्षांश और 82°55'46" पूर्वी  देशांतर समुद्र तल से 1992.59 फिट की ऊंचाई स्थित एक आयताकार  गुफा है, जो लगभग 46.5 फीट चौड़ी और 24 फीट लंबी, जिसकी ऊॅंचाई 6 से 6.5 फीट के बीच है। अंदर, किनारों पर 7 फीट चौड़ी और 2.5 फीट ऊंची चट्टान से बनी चबुतरा है जो थोड़ी ढलान वाली है। संभवतः ये अभिनेताओं के लिए बैठने की जगह और मंच का हिस्सा रहे होंगे। इसके अलावा, गुफा के बाहर की ओर खुलने के ठीक आसपास पत्थर में कप्युल्स बनाए गए हैं ।  इन छिद्रों का उपयोग यहां  अनेक तरह से किया जाता रहा होगा। सबसे बड़ा उपयोग इन छिद्रों का उपयोग अनाज कुटने पीसने के लिए किया जाता रहा होगा।  दूसरा सर्दियों में जब कोई रात भर अंदर रहता हो तो गुफा के प्रवेश द्वार को ढकने के लिए इनका उपयोग किया जाता रहा होगा।  गुफा के अंदर से दाहिने ओर गुफा के  अंदर से बाहर पानी निकालने के लिए एक  अंदरभूमि जल निकासी के लिए नाली निर्माण किया गया था।  यहीं गुफा के छत में पर्दे  लगाने के लिए गुफा के छत में तीन कतारों में छोटे-छोटे छीद्र बनाए गए हैं, संभवतः इन छिद्रों को पर्दें  लगाने के लिए किया जाता रहा होगा। सामने के हिस्से को भी चट्टान काटकर और तराशकर एक मंच की तरह बनाया गया है, जो अनावश्यक और असामान्य होता, अगर यह केवल भिक्षुओं या व्यापारियों के विश्राम का स्थान होता। संभावना यह भी है कि सामने के इस भाग में लकड़ी की सहायता से मंच भी बनाया जाता रहा होगा जिसे मजबूती देने के लिए इसे चारों से स्थायी रुप से गहरे गड्ढे खोदे गए जिससे हर मंचन में एकरुपता बनी रहे।  अन्य दूसरे समय में यह वर्षा जल से इस सीताबेंगरा को  बचाने के लिए काम में आता रहा होगा।

         विद्वान सीताबेंगरा गुफा को भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे पुराना ज्ञात प्रदर्शन मंच मानते हैं, जिसका काल 300 ईसा पूर्व से 100 ईसा पूर्व के बीच है।  यह वर्गीकरण मुख्य रूप से गुफा की वास्तुकला, प्राचीन ब्राह्मी लिपि में पाए गए काव्यात्मक शिलालेखों और भित्ति चित्रों पर आधारित है। जिसका अनुवाद इस प्रकार है -

 हृदय को देदीप्यमान करते हैं स्वभाव से महान ऐसे कविगण रात्रि में वासंती से दूर हास्य एवं विनोद में अपने को भुलाकर चमेली के फूलों की माला का आलिंगन करता है। सीताबेंगरा गुफा में कटी हुई दीवार के बाहरी ओर ऊपरी भाग के पास ब्राह्मी लिपि में दो पंक्तियों का शिलालेख है। सीताबेंगरा शिलालेख का अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है: 

पंक्ति 1 स्वभाव से आदरणीय कवि हृदय को प्रज्वलित करते हैं, जो (.... खो गए ....)
पंक्ति 2 बसंत की पूर्णिमा के झूले उत्सव में, जब मौज-मस्ती और संगीत की भरमार होती है, लोग इस प्रकार (.... खो गए ...) चमेली के फूलों से घने बांधते हैं।

सीताबेंगरा गुफा के दाहिने तरफ थोड़ी ही दूर पर जोगीमारा नामक गुफा स्थित है।  यह गुफा लगभग 15 फीट लंबा और 12 फीट चौड़ा है, और इसकी आंतरिक ऊंचाई 7 फीट से थोड़ा अधिक है। 1874 में बेग्लर द्वारा किए गए एक पुरातात्विक सर्वेक्षण के अनुसार, यह एक प्राकृतिक गुफा भी है, जिसे चढ़ने, अंदर कदम रखने, बैठने और आराम करने की सुविधा के लिए अनुकूलित और तराशा गया है। यह गुफा 22°53'53" उत्तरी अक्षांश और 82°55'46" पूर्वी देशांतर पर समुद्र तल से 1983.07 फिट की ऊंचाई पर स्थित है।  इस गुफा के छत को अच्छे से घिसकर पहले चिकना किया गया है। फिर गोबर से लेप किया गया प्रतीत होता है। उसके बाद पहाड़ी के ऊपर स्थित चन्दन माटी नामक जगह से सफेद मिट्टी लाकर छत पर सफेदी किये जाने का प्रमाण दे  रहा है। उसके बाद फिर कोयले से रेखांकन किया गया होगा। तत्पश्चात् आसपास मिलने वाली गेरुवे मिट्टी से रंग भरे जाने का प्रमाण मिले हैं। यहां अनेक प्रकार के भित्तिचित्र मिले हैं। यहां बने हुए एक चित्र कृष्ण कथा को दर्शाता प्रतीत होता है। जिसमें भगवान श्री कृष्ण नदी में निर्वस्त्र स्नान करने वाली गोपियों के वस्त्र हरण की कथा को प्रदर्शित करते हुए आभास कराता है। 

       

             जोगीमारा गुफा में पाँच पंक्तियों का एक शिलालेख है, जो ब्राह्मी लिपि और मगधी भाषा (पाली से पुरानी एक प्राकृत भाषा, और भारत की भोजपुरी और मैथिली भाषाओं से संबंधित) में है।


जोगीमारा गुफा का शिलालेख, ब्राह्मी लिपि, छत्तीसगढ़ (300-100 ईसा पूर्व)।
अनुवाद 1

पंक्ति 1 सुतुनका नाम से,
पंक्ति 2 एक देवदासी,
पंक्ति 3 सुतुनाका नाम से एक देवदासी,
पंक्ति 4 एक उत्कृष्ट युवक उससे प्रेम करता था,
पंक्ति 5 देवदिन्न नाम से, मूर्तिकला में कुशल (...)

अनुवाद 2

पंक्ति 1 सुतुनुका नाम की
एक महिला पंक्ति 2 एक देवदासी
पंक्ति 3 सुतुनाका नाम की एक देवदासी
पंक्ति 4 लड़कियों के लिए यह विश्राम स्थल बनवाया
पंक्ति 5 [साथ में] देवदिन्न नाम की एक महिला, चित्रकारी में कुशल (...)

तीसरा अनुवाद पहले अनुवाद के समान है, सिवाय इसके कि इसमें चौथी पंक्ति में एक शब्द को संशोधित किया गया है। "एक उत्कृष्ट व्यक्ति" के स्थान पर, यह "वाराणसी के एक युवक ने उससे प्रेम किया" बन जाता है। यह तीसरा अनुवाद ही कुछ विद्वानों को इस सिद्धांत की ओर ले गया है कि रामगढ़ पहाड़ियाँ यात्रियों के लिए एक प्राचीन विश्राम स्थल थीं, क्योंकि कलाकार प्राचीन हिंदू शहर वाराणसी से आया था। 

             जोगीमारा गुफा में भित्ति चित्रों के आठ पैनल हैं, जिनमें से अधिकांश बुरी तरह से फीके पड़ गए हैं। इन्हें मूल रूप से तीन रंगों में और चित्रकला के सबसे पुराने ज्ञात भारतीय ग्रंथों जैसे चित्रसूत्र और चित्रलक्षण में सिखाई गई विधियों की तुलना में अधिक अपरिष्कृत विधि से बनाया गया था। मूल चित्रों को पुनर्स्थापित और बेहतर बनाने के इरादे से किसी ने दोबारा रंगा था। यह प्रयास संभवतः पहली सहस्राब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध में हुआ था।   भित्तिचित्र पैनल क्षतिग्रस्त हैं। पैनलों की कुल संख्या और वे क्या दर्शाते हैं, यह व्याख्या के अधीन है। विन्सेंट स्मिथ के अनुसार मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं: 

पैनल 1: नृत्य करती लड़कियाँ, बैठी हुई नर्तकी के चारों ओर संगीतकार

  • पैनल 2: कई पुरुष आकृतियाँ, हाथी‌। 
  • तीसरा पैनल: कुछ लोग पेड़ के नीचे बैठे हैं।
  • पैनल 4: एक जोड़ा लिली के फूल पर नाच रहा है।
  • पैनल 5: एक गुड़िया या लड़की खेल रही है।
  • पैनल 6: पेड़ की शाखा पर एक लड़का, दूसरी शाखा पर एक पक्षी, पेड़ के चारों ओर जमीन पर नग्न लड़कियां ।
  • पैनल 7: हाथियों का जुलूस। 
  • पैनल 8: फूलों के पौधों के साथ रथों, घोड़ों और कुछ पहियों का जुलूस।

         सीताबेंगरा गुफा से लगभग 2-3 किलोमीटर दूर रामगढ़ पहाड़ी का सर्वोच्च शिखर है। अब यहां तराई भाग तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क बनाई गई है। तराई में पहूंचकर ऊपर जाने के लिए पहले पत्थर की सीढ़ियों का निर्माण किया गया था जिसे अब सीमेंट से पक्की सीढ़ी बनाए गए हैं जो अनेक जगह अपने मूल रूप में देखा जा सकता है। पहाड़ी के मध्य भाग में सिंह द्वार बनाया गया था। जो अब आधी ही  बची हुई है। आधी भाग नीचे टूटकर गिर गया है। 

सिंहद्वार  22°53'54" उत्तरी अक्षांश और 82°55'49" पूर्वी देशांतर पर समुद्र तल से 2098.88 फिट की ऊंचाई पर स्थित है। अपने  यौवनावस्था में यह भव्य रूप में रहा होगा। यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। हालांकि यह द्वार ज्यादा अलंकृत नहीं है लेकिन इससे इसकी महत्ता कम नहीं हो जाती है।  यह द्वार गिरिदुर्ग को बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित रखने के लिए बनाया गया है। इन खड़ी चिड़ियों से ऊपर चढ़ते समय सांसें फूलने लगती हैं। हम शारीरिक रूप से कमजोर होने लगते हैं। जिसके कारण ऊपर बैठे एक सैनिक नीचे से ऊपर चढ़ते हुए सैकड़ों सैनिकों पर भारी पड़ता है। यहां ऊपर में कम से कम चार परत की सुरक्षा व्यवस्था होने के प्रमाण मिले हैं। उसके बाद भी अगर खतरा हुआ तो वहां से सुरक्षित निकलने के लिए भी गोपनीय मार्ग रक्षित है। 

         ऊपर में साल भर स्वच्छ जल प्रबंधन के लिए सीताकुंड है। पहाड़ी में कुछ गोपनीय गुफाओं का भी निर्माण किया गया था। जो सुरक्षा कारणों से बनाया गया था। समयानुसार इनका उपयोग ध्यान और साधना के लिए भी किया जाता रहा है। इसका विस्तृत क्षेत्र अनेक रहस्यों से भरा हुआ है। 

           कालांतर में यहां के शिखर पर देवस्थल भी बनाए गए। जिसे राममंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर 22°53'24" उत्तरी अक्षांश और 82°54'19" पूर्वी देशांतर पर समुद्र तल से 2958.6 फिट की ऊंचाई पर स्थित है। जिसमें भगवान श्री राम, माता सीता, भाई लक्ष्मण के अलावा चतुर्भुजी भगवान् श्री विष्णु जी के काले  रंग की ग्रेनाइट पत्थर की प्रतिमा स्थापित हैं।  जो अत्यंत ही विलक्षण हैं। 

       

बुधवार, 14 जनवरी 2026

तख्तापलट और देशों में उलटफेर के पीछे एकमात्र चेहरा - अमेरिका

तख्तापलट और  देशों में उलटफेर के पीछे एकमात्र चेहरा - अमेरिका । 
        यह पंक्ति विचारणीय और सोचनीय है। गत वर्ष दुनिया ने देखा कि कैसे जेन-जी सड़कों पर उतर आई। धीरे धीरे वह एक आंदोलन का रुप लेता गया। यह आंदोलन क्या वास्तव में उस देश का आंदोलन स्वस्फूर्त आंदोलन माना जा सकता है ? या फिर किसी बाहरी ताकतों द्वारा दी गई हवा की झोंकों के कारण वह आंदोलन जन्म लेती गई। पहले पहल तो यह उस देश का ही स्वस्फूर्त आंदोलन लगता है। लेकिन जब गहराई से अध्ययन करें तो पता चलता है कि इन सबके पीछे अमेरिका और उनका डीपस्टेट जिम्मेदार हैं। जिसे पीछे से मदद करता है यूरोपीय संघ। 
           सबसे पहले नेपाल में यह आंदोलन प्रकाश में आया। कुछ दिनों के आंदोलन के बाद उस देश की सत्ता बदल गई। जिससे पीठ के पीछे रहकर दूसरे के कंधे पर बंदूक रखकर चलाने वाले को एक रास्ता मिल गया । जिसमें उनके देश को बिना सैनिक हस्तक्षेप के ही अपने विचारों के अनुकूल सरकार बनती दिखीं। इस कारण उनके काले मंसुबों को एक नया हथियार मिल गया। ऐसे में उस देश के ही लोगों द्वारा अपने ही देश की सरकारी संपत्तियों को नुक्सान पहुंचाकर क्या साबित करना चाहते हैं ? जरा विचारें। 
             फिर हमारे ही एक और पड़ोसी देश बांग्लादेश में एक और जेन जी आंदोलन ने जन्म लिया ।  कहने को तो यह एक जेन जी आंदोलन माना गया। लेकिन यह भी अमेरिका के ही डीपस्टेट का ही रचा गया षड्यंत्र है। धीरे धीरे यह आंदोलन उग्र रूप लेता गया और उस आंदोलन ने उस देश की चुनी हुई सरकार को ही उखाड़ फेका। और फिर वह हुआ जिसकी कल्पना किसी ने नहीं किया था। वहां तथाकथित नोबेल शांति पुरस्कार विजेता एक सत्तालोभी व्यक्ति वहां के प्रमुख मनोनीत हुआ। उसके नेतृत्व में अल्पसंख्यकों के ऊपर ऐसा अत्याचार  होने लगा जिसके बारे में सोचकर ही घिन आती है। क्या ऐसे लोगों के साथ सटे साठ्यम् समाचरेत् ,जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए ?  
                    इस आंदोलन के भी पीछे उसी अमेरिका का हाथ है। इसके बाद तो जैसा जेन जी एक वरदान के बदले अभिशाप नज़र आने लगा। वह युवा जो देश का भाग्य बदल सकता था वह अपने ही देश के लिए भस्मासुर साबित होने लगा। उसके पास कुछ करने की ताकत और कला दोनों ही विद्यमान होती है। नहीं होती है तो एक दिशा। उसी दिशा भ्रम का फायदा ऐसे अमीर देश उठाते हैं। 
             बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद वहां तो लगातार अल्पसंख्यक समुदाय पर बिना कारण ही अत्याचार होने लगी। जिसमें भी सबसे ज्यादा अत्याचार तो हिन्दू अल्पसंख्यक समुदाय पर हो रहा है। इसके पीछे कारण भी विश्व भर में एक भी हिन्दू राष्ट्र का न होना। यदि कोई हिन्दू राष्ट्र होता तो वह राष्ट्र उनके हितों के लिए लड़ाई लड़ता। वहां के हिंदू विश्व भर की ताकतों की ओर अपने हितों और प्राणों की रक्षा के लिए आशा भरी निगाहों से देख रही है । लेकिन कहीं भी आशा की किरणें उन्हें नजर नहीं आती हैं। भारत और उनके नेतृत्व के ऊपर उनकी नजरें ज्यादा आशान्वित हैं। 
            संघ परिवार और संत समाज की ओर वे ज्यादा भरोसा रखते हैं। संत समाज के पास धर्म ध्वजा और धर्म गदा (दंड)
        दोनों ही होता है। पंडित धीरेन्द्र शास्त्री जी भी तो जेन जी में ही आते हैं। उनके पास अपनी दिशा है। वे विवेकवान हैं। युवाओं को सही दिशा भी दे रहे हैं। भारत के युवा पीढ़ी को उनके द्वारा दिखाए जा रहे दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता है। 
           एक समय में ऐसा भी नेता था जिसके एक आवाज में देश रुक जाती थी। सरकारें उनके सामने नतमस्तक हो जाती थी। उस नेता का नाम है स्वर्गीय श्री बालासाहेब ठाकरे जी।   उन्होंने कहा था कि अगर पाकिस्तान या किसी भी अन्य मूल्कों में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर अत्याचार होती है तो मक्का की उड़ान मुंबई से उड़ पायेगी। उस उद्घोष का प्रभाव भी दिखा।  
        ब्रिटैनिका के अनुसार, ठाकरे की राजनीति ने आक्रामक हिंदुत्व और राष्ट्रीय गौरव को मिलाकर एक ऐसा मंच बनाया, जिसने विविध समुदायों को आस्था और आत्मसम्मान के साझा सूत्र में पिरोया। उनकी आवाज ने लाखों लोगों को एकजुट किया, जो एक नई पहचान की तलाश में थे।
        अब अमेरिका और वहां के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने कुटिल नीति और षड्यंत्रों  में सफल होने के बाद इतना दुस्साहसी हो गया है कि दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उनके घर से ही उठवा लिया। अब सीधे ही वह ग्रीन लैंड और ईरान जैसे देशों के अलावा उन सभी देशों को धमकाने हुए देखा जा सकता है। उसने जिसकी लाठी उसकी भैंस की कहावत को चरितार्थ करना चालू कर दिया है। 
            भारत में भी उन्होंने षड्यंत्र रचा, यहां भी उनके डीपस्टेट के मोहरे काम कर रहे हैं। यहां भी सत्तालोभी व्यक्तियों और दलों  का एक बड़ा समूह उसी दिशा में काम कर रही है। यहां भी विपक्षी दलों और नेताओं के द्वारा यहां के जेन जी को खुले मंचों से भड़काया जाता है। देश को बहुत ही सावधान रहने की आवश्यकता है। ऐसे षड्यंत्रकारी ताकतों से सावधान रहते हुए हमें अपने युवा पीढ़ी को संस्कारवान  बनाने की दिशा में काम करने की आवश्यकता है। भारत में भी एक वर्ग ऐसा भी है जिसके पीछे सारे लोग गोलबंद हो जाते हैं।
             यह तो अच्छा है कि इस समय हमारे देश में एक बहुत ही अच्छा नेतृत्व विद्यमान है। वह अर्जुन के तरह ही सारे अस्त्र-शस्त्रों  की तोड़ जानते हैं। उनके रथ को सारथी की तरह दिशा देने का काम कर रही है कृष्ण रुपी संघ की नेतृत्व। जो अर्जून के रथ को भटकने नहीं दे रहा है।
             यह हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री जी का कुशल नेतृत्व ही है कि विपक्षी दलों और विदेशी ताकतों का कुछ दाल नहीं गल रहा है। हम सब राष्ट्रभक्त ताकतों को कुटिल और दुष्ट ताकतों से बचकर रहने की आवश्यकता है। हमें बहुत सतर्क रहने की आवश्यकता है।