रविवार, 1 फ़रवरी 2026

मैं रामगढ़ बोल रहा हूॅं।

        कल माघ सुदी शुक्लपक्ष की त्रयोदशी तिथि थी । संस्कार भारती के कला धरोहर विभाग द्वारा इस तिथि को सृष्टि के शिल्पकार , निर्माण एवं सृजन के देवता देवशिल्पी भगवान श्री विश्वकर्मा की जयंती मनाने का निर्णय लिया था। इसके बाद इस वर्ष अंग्रेजी माह  के 31 जनवरी को माघ शुक्ल 13/14  दोनों ही तिथि एक साथ पड़ रही है। जैसे कि निश्चित हुआ था कि इस तिथि को हमें भगवान श्री विश्वकर्मा जी के जयंती दिवस समारोह के रूप में मनाया जाना है। हमें चाहिए कि अपने अपने प्रांतों में कोई एक स्थान पर या जहां जहां हमारे कार्यकर्ता हैं। अपने अपने प्रांतों में स्थित स्थापत्य कला और शैली को ध्यान में रखते हुए एक घंटे का आयोजन किया जाना चाहिए। जिसमें अपने क्षेत्र के प्राचीन मंदिर, भवन या अन्य प्राचीन धरोहर में जाकर कोई न कोई कार्यक्रम आयोजित किया जाना चाहिए जिसका फोटो ग्राफी /विडियो ग्राफी कर समूह में पोस्ट किया जाना चाहिए। इससे हम अपने क्षेत्रों की प्राचीन धरोहरों को सीधे ही विश्वकर्मा भगवान से जोड़ सकते हैं। हो सके तो वर्तमान में जो कलाकार कार्यरत हैं उन्हें बुलाकर साल और श्रीफल भेंटकर सम्मानित भी किया जा सकता है। इससे हम लोगों तक सीधे ही पहुंच सकते हैं।  इसे ही ध्यान में रखकर छत्तीसगढ़ प्रांत कला धरोहर विभाग द्वारा अंबिकापुर जिले से 45 किलोमीटर मीटर दूर स्थित विकासखंड उदयपुर से तीन किलोमीटर दूर स्थित रामगढ़ पहाड़ी में स्थित प्राचीन नाट्यशाला , जोगीमारा गुफा और राममंदिर में स्थापित मूर्तियों की जानकारी जन-मानस को देने का निर्णय लिया। जिससे स्थानीय लोगों और पर्यटकों को इस क्षेत्र की प्राचीनता और महत्ता को धरोहर यात्रा और  धरोहर वार्ता के अंतर्गत कार्यक्रम को सफलतापूर्वक सम्पन्न किया गया।
                      छत्तीसगढ़ राज्य के अंबिकापुर जिले के उदयपुर विकासखंड अंतर्गत पुटा गाँव में रामगढ़ पहाड़ियों के उत्तरी भाग में स्थित प्राचीन गुफा स्मारक हैं । तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से पहली शताब्दी ईसा पूर्व के बीच निर्मित सीता बेंगरा और जोगीमारा गुफा के अलावा भी यहां अनेक गुफाएँ  हैं। जिनमें से कुछ प्राकृतिक रूप से निर्मित हैं तो कुछ मानवीय और तराशें हुए हैं। इन गुफाओं में से दो गुफाओं में ब्राम्ही लिपि और मगधी भाषा में लिखे गए कुछ अभिलेख हैं। कुछ विद्वानों का मानना ​​है कि सीताबेंगरा गुफा भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे पुराना प्रदर्शन रंगमंच है, जबकि अन्य इस बात पर सवाल उठाते हैं कि क्या यह वास्तव में एक रंगमंच था ? वे सुझाव देते हैं कि यह किसी प्राचीन व्यापार मार्ग पर विश्राम स्थल रहा होगा।  जोगीमारा गुफा के शिलालेख पर भी विद्वानों में विवाद है, कुछ इसे एक लड़की और लड़के द्वारा प्रेम-चित्रण के रूप में व्याख्यायित करते हैं तो दूसरा इसे एक नर्तकी और एक पुरुष मूर्तिकार या चित्रकार द्वारा दूसरों की सेवा के लिए दो गुफाओं का संयुक्त रूप से निर्माण करने के रूप में व्याख्यायित करते हैं । जहां जोगीमारा गुहा शिलालेख में "देवदासी" शब्द का सबसे पुराना ज्ञात अभिलेख भी माना जाता है। प्राचीन काल में देवदासी प्रथा का प्रचलन था। जो किसी मंदिर में भगवान के लिए समर्पित मानी जाती थी। लेकिन इस क्षेत्र में उतना प्राचीन मंदिर प्राप्त नहीं होता है। 
ये गुफाएँ आंशिक रूप से प्राकृतिक और आंशिक रूप से नक्काशीदार हैं। क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार, इनका संबंध रामायण महाकाव्य से है , जहाँ सीता, राम और लक्ष्मण अपने वनवास की शुरुआत में आए थे। यहाँ पाए गए सबसे पुराने अवशेष मुझे मौर्यकालीन पक्की मिट्टी की बनी महिला की सिर और  वक्षस्थल तक का भाग काले संगमरमर के बने पात्रों के अवशेष बौद्ध भिक्षुओं द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले धातु से बनी भिक्षापात्र टुकड़े और अन्य धातु खंड के अलावा भी बहुत कुछ मिला है। पहाड़ी  के ऊपर मंदिर में स्थापित कलाकृतियाँ रामायण से संबंधित हैं । जिसमें भगवान  श्री राम,  हनुमान, सीता  शेषनाग रुपी लक्ष्मण  और चतुर्भुजी भगवान् श्री विष्णु जी अपने वाहन गरुड़ के साथ काले ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित है। मूर्तिकला के आधार पर ये सभी संभवतः 8 वीं से 12वीं शताब्दी के बीच की कलचुरी कला की तरह प्रतीत होते हैं।

        जोगीमारा और सीताबेंगरा गुफाएं भारत में पाई जाने वाली अन्य सभी प्राचीन गुफाओं से बनावट और सजावट दोनों में भिन्न हैं। अन्य स्थलों में हमेशा धार्मिक प्रतीक और चिह्न पाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, बौद्ध गुफाओं में स्तूप या उससे संबंधित प्रतीक होते हैं, और बाद की गुफाओं में बुद्ध से संबंधित नक्काशी और चित्र जोड़े गए हैं। जैन गुफाओं में  तीर्थंकरों से संबंधित प्रतीक या चिह्न होते हैं । किसी भी बौद्ध या जैन गुफा में पाए जाने वाले शिलालेख या चित्रों में हमेशा बुद्ध या तीर्थंकर का उल्लेख होता है। सीताबेंगरा गुफा के बाहर दाहिने तरफ दो पदचिह्न  बनाए गए हैं ।

जिसके आधार पर जैनी इसे जैन गुफा मानते हैं। जबकि शिलालेख काव्यात्मक हैं। 

          

       

सीताबेंगरा गुफा आंशिक रूप से तराशे गए मंच जैसी दिखती है। इसके सामने अर्धगोलाकार चट्टानों से तराशी गई पत्थर की बेंचों की दो पंक्तियाँ हैं। इस स्थल की तस्वीर खींचने वाले बेगलर के अनुसार, ये गुफा में प्रवेश करने के लिए सीढ़ियाँ रही होंगी। गुफा के बाईं ओर पहले से ही सीढ़ियों का एक और सेट बना हुआ था, इसलिए इन लंबे हिस्सों को खाली जगह के साथ काटना व्यर्थ लगता है। ब्लोच का कहना है कि ये बेंचें लोगों के बैठने और प्रदर्शन मंच देखने के लिए रही होंगी। इन पत्थर की बेंचों पर "लगभग 50 या उससे अधिक" लोग आसानी से बैठ सकते थे।  सुरक्षित पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए, स्थानीय अधिकारियों ने सीताबेंगरा गुफा के पास सीढ़ियाँ, देखने के लिए चबूतरे और अन्य सुविधाएँ बनाई हैं।

             सीताबेंगरा गुफा 22°53'53" उत्तरी अक्षांश और 82°55'46" पूर्वी  देशांतर समुद्र तल से 1992.59 फिट की ऊंचाई स्थित एक आयताकार  गुफा है, जो लगभग 46.5 फीट चौड़ी और 24 फीट लंबी, जिसकी ऊॅंचाई 6 से 6.5 फीट के बीच है। अंदर, किनारों पर 7 फीट चौड़ी और 2.5 फीट ऊंची चट्टान से बनी चबुतरा है जो थोड़ी ढलान वाली है। संभवतः ये अभिनेताओं के लिए बैठने की जगह और मंच का हिस्सा रहे होंगे। इसके अलावा, गुफा के बाहर की ओर खुलने के ठीक आसपास पत्थर में कप्युल्स बनाए गए हैं ।  इन छिद्रों का उपयोग यहां  अनेक तरह से किया जाता रहा होगा। सबसे बड़ा उपयोग इन छिद्रों का उपयोग अनाज कुटने पीसने के लिए किया जाता रहा होगा।  दूसरा सर्दियों में जब कोई रात भर अंदर रहता हो तो गुफा के प्रवेश द्वार को ढकने के लिए इनका उपयोग किया जाता रहा होगा।  गुफा के अंदर से दाहिने ओर गुफा के  अंदर से बाहर पानी निकालने के लिए एक  अंदरभूमि जल निकासी के लिए नाली निर्माण किया गया था।  यहीं गुफा के छत में पर्दे  लगाने के लिए गुफा के छत में तीन कतारों में छोटे-छोटे छीद्र बनाए गए हैं, संभवतः इन छिद्रों को पर्दें  लगाने के लिए किया जाता रहा होगा। सामने के हिस्से को भी चट्टान काटकर और तराशकर एक मंच की तरह बनाया गया है, जो अनावश्यक और असामान्य होता, अगर यह केवल भिक्षुओं या व्यापारियों के विश्राम का स्थान होता। संभावना यह भी है कि सामने के इस भाग में लकड़ी की सहायता से मंच भी बनाया जाता रहा होगा जिसे मजबूती देने के लिए इसे चारों से स्थायी रुप से गहरे गड्ढे खोदे गए जिससे हर मंचन में एकरुपता बनी रहे।  अन्य दूसरे समय में यह वर्षा जल से इस सीताबेंगरा को  बचाने के लिए काम में आता रहा होगा।

         विद्वान सीताबेंगरा गुफा को भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे पुराना ज्ञात प्रदर्शन मंच मानते हैं, जिसका काल 300 ईसा पूर्व से 100 ईसा पूर्व के बीच है।  यह वर्गीकरण मुख्य रूप से गुफा की वास्तुकला, प्राचीन ब्राह्मी लिपि में पाए गए काव्यात्मक शिलालेखों और भित्ति चित्रों पर आधारित है। जिसका अनुवाद इस प्रकार है -

 हृदय को देदीप्यमान करते हैं स्वभाव से महान ऐसे कविगण रात्रि में वासंती से दूर हास्य एवं विनोद में अपने को भुलाकर चमेली के फूलों की माला का आलिंगन करता है। सीताबेंगरा गुफा में कटी हुई दीवार के बाहरी ओर ऊपरी भाग के पास ब्राह्मी लिपि में दो पंक्तियों का शिलालेख है। सीताबेंगरा शिलालेख का अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है: 

पंक्ति 1 स्वभाव से आदरणीय कवि हृदय को प्रज्वलित करते हैं, जो (.... खो गए ....)
पंक्ति 2 बसंत की पूर्णिमा के झूले उत्सव में, जब मौज-मस्ती और संगीत की भरमार होती है, लोग इस प्रकार (.... खो गए ...) चमेली के फूलों से घने बांधते हैं।

सीताबेंगरा गुफा के दाहिने तरफ थोड़ी ही दूर पर जोगीमारा नामक गुफा स्थित है।  यह गुफा लगभग 15 फीट लंबा और 12 फीट चौड़ा है, और इसकी आंतरिक ऊंचाई 7 फीट से थोड़ा अधिक है। 1874 में बेग्लर द्वारा किए गए एक पुरातात्विक सर्वेक्षण के अनुसार, यह एक प्राकृतिक गुफा भी है, जिसे चढ़ने, अंदर कदम रखने, बैठने और आराम करने की सुविधा के लिए अनुकूलित और तराशा गया है। यह गुफा 22°53'53" उत्तरी अक्षांश और 82°55'46" पूर्वी देशांतर पर समुद्र तल से 1983.07 फिट की ऊंचाई पर स्थित है।  इस गुफा के छत को अच्छे से घिसकर पहले चिकना किया गया है। फिर गोबर से लेप किया गया प्रतीत होता है। उसके बाद पहाड़ी के ऊपर स्थित चन्दन माटी नामक जगह से सफेद मिट्टी लाकर छत पर सफेदी किये जाने का प्रमाण दे  रहा है। उसके बाद फिर कोयले से रेखांकन किया गया होगा। तत्पश्चात् आसपास मिलने वाली गेरुवे मिट्टी से रंग भरे जाने का प्रमाण मिले हैं। यहां अनेक प्रकार के भित्तिचित्र मिले हैं। यहां बने हुए एक चित्र कृष्ण कथा को दर्शाता प्रतीत होता है। जिसमें भगवान श्री कृष्ण नदी में निर्वस्त्र स्नान करने वाली गोपियों के वस्त्र हरण की कथा को प्रदर्शित करते हुए आभास कराता है। 

       

             जोगीमारा गुफा में पाँच पंक्तियों का एक शिलालेख है, जो ब्राह्मी लिपि और मगधी भाषा (पाली से पुरानी एक प्राकृत भाषा, और भारत की भोजपुरी और मैथिली भाषाओं से संबंधित) में है।


जोगीमारा गुफा का शिलालेख, ब्राह्मी लिपि, छत्तीसगढ़ (300-100 ईसा पूर्व)।
अनुवाद 1

पंक्ति 1 सुतुनका नाम से,
पंक्ति 2 एक देवदासी,
पंक्ति 3 सुतुनाका नाम से एक देवदासी,
पंक्ति 4 एक उत्कृष्ट युवक उससे प्रेम करता था,
पंक्ति 5 देवदिन्न नाम से, मूर्तिकला में कुशल (...)

अनुवाद 2

पंक्ति 1 सुतुनुका नाम की
एक महिला पंक्ति 2 एक देवदासी
पंक्ति 3 सुतुनाका नाम की एक देवदासी
पंक्ति 4 लड़कियों के लिए यह विश्राम स्थल बनवाया
पंक्ति 5 [साथ में] देवदिन्न नाम की एक महिला, चित्रकारी में कुशल (...)

तीसरा अनुवाद पहले अनुवाद के समान है, सिवाय इसके कि इसमें चौथी पंक्ति में एक शब्द को संशोधित किया गया है। "एक उत्कृष्ट व्यक्ति" के स्थान पर, यह "वाराणसी के एक युवक ने उससे प्रेम किया" बन जाता है। यह तीसरा अनुवाद ही कुछ विद्वानों को इस सिद्धांत की ओर ले गया है कि रामगढ़ पहाड़ियाँ यात्रियों के लिए एक प्राचीन विश्राम स्थल थीं, क्योंकि कलाकार प्राचीन हिंदू शहर वाराणसी से आया था। 

             जोगीमारा गुफा में भित्ति चित्रों के आठ पैनल हैं, जिनमें से अधिकांश बुरी तरह से फीके पड़ गए हैं। इन्हें मूल रूप से तीन रंगों में और चित्रकला के सबसे पुराने ज्ञात भारतीय ग्रंथों जैसे चित्रसूत्र और चित्रलक्षण में सिखाई गई विधियों की तुलना में अधिक अपरिष्कृत विधि से बनाया गया था। मूल चित्रों को पुनर्स्थापित और बेहतर बनाने के इरादे से किसी ने दोबारा रंगा था। यह प्रयास संभवतः पहली सहस्राब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध में हुआ था।   भित्तिचित्र पैनल क्षतिग्रस्त हैं। पैनलों की कुल संख्या और वे क्या दर्शाते हैं, यह व्याख्या के अधीन है। विन्सेंट स्मिथ के अनुसार मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं: 

पैनल 1: नृत्य करती लड़कियाँ, बैठी हुई नर्तकी के चारों ओर संगीतकार

  • पैनल 2: कई पुरुष आकृतियाँ, हाथी‌। 
  • तीसरा पैनल: कुछ लोग पेड़ के नीचे बैठे हैं।
  • पैनल 4: एक जोड़ा लिली के फूल पर नाच रहा है।
  • पैनल 5: एक गुड़िया या लड़की खेल रही है।
  • पैनल 6: पेड़ की शाखा पर एक लड़का, दूसरी शाखा पर एक पक्षी, पेड़ के चारों ओर जमीन पर नग्न लड़कियां ।
  • पैनल 7: हाथियों का जुलूस। 
  • पैनल 8: फूलों के पौधों के साथ रथों, घोड़ों और कुछ पहियों का जुलूस।

         सीताबेंगरा गुफा से लगभग 2-3 किलोमीटर दूर रामगढ़ पहाड़ी का सर्वोच्च शिखर है। अब यहां तराई भाग तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क बनाई गई है। तराई में पहूंचकर ऊपर जाने के लिए पहले पत्थर की सीढ़ियों का निर्माण किया गया था जिसे अब सीमेंट से पक्की सीढ़ी बनाए गए हैं जो अनेक जगह अपने मूल रूप में देखा जा सकता है। पहाड़ी के मध्य भाग में सिंह द्वार बनाया गया था। जो अब आधी ही  बची हुई है। आधी भाग नीचे टूटकर गिर गया है। 

सिंहद्वार  22°53'54" उत्तरी अक्षांश और 82°55'49" पूर्वी देशांतर पर समुद्र तल से 2098.88 फिट की ऊंचाई पर स्थित है। अपने  यौवनावस्था में यह भव्य रूप में रहा होगा। यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। हालांकि यह द्वार ज्यादा अलंकृत नहीं है लेकिन इससे इसकी महत्ता कम नहीं हो जाती है।  यह द्वार गिरिदुर्ग को बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित रखने के लिए बनाया गया है। इन खड़ी चिड़ियों से ऊपर चढ़ते समय सांसें फूलने लगती हैं। हम शारीरिक रूप से कमजोर होने लगते हैं। जिसके कारण ऊपर बैठे एक सैनिक नीचे से ऊपर चढ़ते हुए सैकड़ों सैनिकों पर भारी पड़ता है। यहां ऊपर में कम से कम चार परत की सुरक्षा व्यवस्था होने के प्रमाण मिले हैं। उसके बाद भी अगर खतरा हुआ तो वहां से सुरक्षित निकलने के लिए भी गोपनीय मार्ग रक्षित है। 

         ऊपर में साल भर स्वच्छ जल प्रबंधन के लिए सीताकुंड है। पहाड़ी में कुछ गोपनीय गुफाओं का भी निर्माण किया गया था। जो सुरक्षा कारणों से बनाया गया था। समयानुसार इनका उपयोग ध्यान और साधना के लिए भी किया जाता रहा है। इसका विस्तृत क्षेत्र अनेक रहस्यों से भरा हुआ है। 

           कालांतर में यहां के शिखर पर देवस्थल भी बनाए गए। जिसे राममंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर 22°53'24" उत्तरी अक्षांश और 82°54'19" पूर्वी देशांतर पर समुद्र तल से 2958.6 फिट की ऊंचाई पर स्थित है। जिसमें भगवान श्री राम, माता सीता, भाई लक्ष्मण के अलावा चतुर्भुजी भगवान् श्री विष्णु जी के काले  रंग की ग्रेनाइट पत्थर की प्रतिमा स्थापित हैं।  जो अत्यंत ही विलक्षण हैं।