बुधवार, 5 नवंबर 2025

दुर्गा सप्तशती पाठ बीज मंत्र सहित

#श्रीदुर्गासप्तशती_साधना!! 
           ॐ श्री गणेशाय नमः {11बार}
ॐ ह्रौं जुं सः सिद्ध गुरूवे नमः {11बार}
ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षणि ठः ठः स्वाहा {13बार}          
{प्राचीन शिवयोग परंपरा} 
1-ॐ ह्रौं आदि नाथाय नमः।
2-ॐ ह्रौं कश्यपाय नमः।
3-ॐ ह्रौं अत्रये नमः।
4-ॐ ह्रौं वशिष्ठाय नमः।
5-ॐ ह्रौं विश्वामित्राय नमः।
6-ॐ ह्रौं गौतमाय नमः।
7-ॐ ह्रौं जमदग्नये नमः।
8-ॐ ह्रौं भारद्वाजाय नमः।
9-ॐ ह्रौं बाल्मीकिये नमः।
10-ॐ ह्रौं दधीच्ये नमः।
11-ॐ ह्रौं लोपामुद्रायै नमः।
12-ॐ ह्रौं अगस्त्याय नमः।
13-ॐ ह्रौं दत्तात्रेयाय नमः।
14-ॐ ह्रौं मारकंडेयाय नमः।
15-ॐ ह्रौं मत्स्येन्द्रनाथाय नमः।
16-ॐ ह्रौं गोरक्षनाथाय नमः।
17-ॐ ह्रौं नावनाथाय नमः।
18-ॐ ह्रौं बसवेश्वराय नमः।
19-ॐ ह्रौं नित्यानंदाय नमः।
20-ॐ ह्रौं जगन्नाथाय नमः।
21-ॐ ह्रौं शिवानंदाय नमः।

अवधूतं महासिद्धं आदिव्याधि प्रशमनं।
भोग-मोक्ष-प्रदं देवं महासिद्धं नमाम्यहं॥

॥परात्पर शिव॥
।ॐ परमेश्वर परमेश्वरै नमः।

॥शिव अष्ट स्वरूप॥
1-ॐ ह्रौं भवाय देवाय नमः 
2-ॐ ह्रौं शर्वाय देवाय नमः 
3-ॐ ह्रौं रूद्राय देवाय नमः 
4-ॐ ह्रौं भीमाय देवाय नमः 
5-ॐ ह्रौं उग्राय देवाय नमः
6-ॐ ह्रौं महतो देवाय नमः
7-ॐ ह्रौं पशुपतये देवाय नमः
8-ॐ ह्रौं ईशानाय देवाय नमः

॥शिव अष्टभैरव स्वरूप॥
1-ॐ ह्रौं असितांग भैरवाय नमः
2-ॐ ह्रौं रुरु भैरवाय नमः
3-ॐ ह्रौं चंड भैरवाय नमः
4-ॐ ह्रौं क्रोध भैरवाय नमः
5-ॐ ह्रौं उन्मत्त भैरवाय नमः
6-ॐ ह्रौं कपाल भैरवाय नमः
7-ॐ ह्रौं भीषण भैरवाय नमः 
8-ॐ ह्रौं संहार भैरवाय नमः

॥श्रीदुर्गादेवी रक्षाकवच मंत्र॥
विनियोग ‌:-ॐ अस्य श्री चन्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषि: अनुष्टुप‌्छन्दः चामुंडा देवता अंगन्यासोक्तमातरो बीजम‌् दिग्बन्ध देवतास्तत्वम‌् श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठांगत्वेन‌ जपे विनियोग:।

मंत्र:-ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षिणी ठ: ठ: स्वाहा।

मृतसंजीवनी मंत्र:- ॐ ह्रौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्व: ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनम‌् उर्वारुकमिव बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात‌् ॐ स्वः भुवः भूःसः जूं ह्रौं ॐ॥

{सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम}
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामण्डायै विच्चे ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा॥

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनी । 
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दीनि॥
नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भसुरघातिनि। 
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे॥ 
ऐंकारी सृष्टीरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका। 
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोस्तुते॥
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी। 
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि॥
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी। 
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुंभ कुरू॥
हुं हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रै भवान्यै ते नमो नमः॥
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं। 
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा॥ 
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे॥

ॐ नमश्चण्डिकायैः।ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

प्रथमचरित्र...
ॐ अस्य श्री प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा रूषिः महाकाली देवता गायत्री छन्दः नन्दा शक्तिः रक्तदन्तिका बीजम् अग्निस्तत्त्वम् रूग्वेद स्वरूपम् श्रीमहाकाली प्रीत्यर्थे प्रथमचरित्र जपे विनियोगः|

(1) श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं प्रीं ह्रां ह्रीं सौं प्रें म्रें ल्ह्रीं म्लीं स्त्रीं क्रां स्ल्हीं क्रीं चां भें क्रीं वैं ह्रौं युं जुं हं शं रौं यं विं वैं चें ह्रीं क्रं सं कं श्रीं त्रों स्त्रां ज्यैं रौं द्रां द्रों ह्रां द्रूं शां म्रीं श्रौं जूं ल्ह्रूं श्रूं प्रीं रं वं व्रीं ब्लूं स्त्रौं ब्लां लूं सां रौं हसौं क्रूं शौं श्रौं वं त्रूं क्रौं क्लूं क्लीं श्रीं व्लूं ठां ठ्रीं स्त्रां स्लूं क्रैं च्रां फ्रां जीं लूं स्लूं नों स्त्रीं प्रूं स्त्रूं ज्रां वौं ओं श्रौं रीं रूं क्लीं दुं ह्रीं गूं लां ह्रां गं ऐं श्रौं जूं डें श्रौं छ्रां क्लीं
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

मध्यमचरित्र..
ॐ अस्य श्री मध्यमचरित्रस्य विष्णुर्रूषिः महालक्ष्मीर्देवता उष्णिक छन्दः शाकम्भरी शक्तिः दुर्गा बीजम् वायुस्तत्त्वम् यजुर्वेदः स्वरूपम् श्रीमहालक्ष्मी प्रीत्यर्थे मध्यमचरित्र जपे विनियोगः

(2) श्रौं श्रीं ह्सूं हौं ह्रीं अं क्लीं चां मुं डां यैं विं च्चें ईं सौं व्रां त्रौं लूं वं ह्रां क्रीं सौं यं ऐं मूं सः हं सं सों शं हं ह्रौं म्लीं यूं त्रूं स्त्रीं आं प्रें शं ह्रां स्मूं ऊं गूं व्र्यूं ह्रूं भैं ह्रां क्रूं मूं ल्ह्रीं श्रां द्रूं द्व्रूं ह्सौं क्रां स्हौं म्लूं श्रीं गैं क्रूं त्रीं क्ष्फीं क्सीं फ्रों ह्रीं शां क्ष्म्रीं रों डुं
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

(3) श्रौं क्लीं सां त्रों प्रूं ग्लौं क्रौं व्रीं स्लीं ह्रीं हौं श्रां ग्रीं क्रूं क्रीं यां द्लूं द्रूं क्षं ह्रीं क्रौं क्ष्म्ल्रीं वां श्रूं ग्लूं ल्रीं प्रें हूं ह्रौं दें नूं आं फ्रां प्रीं दं फ्रीं ह्रीं गूं श्रौं सां श्रीं जुं हं सं
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

(4) श्रौं सौं दीं प्रें यां रूं भं सूं श्रां औं लूं डूं जूं धूं त्रें ल्हीं श्रीं ईं ह्रां ल्ह्रूं क्लूं क्रां लूं फ्रें क्रीं म्लूं घ्रें श्रौं ह्रौं व्रीं ह्रीं त्रौं हलौं गीं यूं ल्हीं ल्हूं श्रौं ओं अं म्हौं प्री
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

उत्तमचरित्र..
ॐ अस्य श्री उत्तरचरित्रस्य रुद्र रूषिः महासरस्वती देवता अनुष्टुप् छन्दः भीमा शक्तिः भ्रामरी बीजम सूर्यस्तत्त्वम सामवेदः स्वरूपम श्री महासरस्वती प्रीत्यर्थे उत्तरचरित्र जपे विनियोगः-

(5) श्रौं प्रीं ओं ह्रीं ल्रीं त्रों क्रीं ह्लौं ह्रीं श्रीं हूं क्लीं रौं स्त्रीं म्लीं प्लूं ह्सौं स्त्रीं ग्लूं व्रीं सौः लूं ल्लूं द्रां क्सां क्ष्म्रीं ग्लौं स्कं त्रूं स्क्लूं क्रौं च्छ्रीं म्लूं क्लूं शां ल्हीं स्त्रूं ल्लीं लीं सं लूं हस्त्रूं श्रूं जूं हस्ल्रीं स्कीं क्लां श्रूं हं ह्लीं क्स्त्रूं द्रौं क्लूं गां सं ल्स्त्रां फ्रीं स्लां ल्लूं फ्रें ओं स्म्लीं ह्रां ऊं ल्हूं हूं नं स्त्रां वं मं म्क्लीं शां लं भैं ल्लूं हौं ईं चें क्ल्रीं ल्ह्रीं क्ष्म्ल्रीं पूं श्रौं ह्रौं भ्रूं क्स्त्रीं आं क्रूं त्रूं डूं जां ल्ह्रूं फ्रौं क्रौं किं ग्लूं छ्रंक्लीं रं क्सैं स्हुं श्रौं श्रीं ओं लूं ल्हूं ल्लूं स्क्रीं स्स्त्रौं स्भ्रूं क्ष्मक्लीं व्रीं सीं भूं लां श्रौं स्हैं ह्रीं श्रीं फ्रें रूं च्छ्रूं ल्हूं कं द्रें श्रीं सां ह्रौं ऐं स्कीं 
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

(6) श्रौं ओं त्रूं ह्रौं क्रौं श्रौं त्रीं क्लीं प्रीं ह्रीं ह्रौं श्रौं अरैं अरौं श्रीं क्रां हूं छ्रां क्ष्मक्ल्रीं ल्लुं सौः ह्लौं क्रूं सौं 
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

(7) श्रौं कुं ल्हीं ह्रं मूं त्रौं ह्रौं ओं ह्सूं क्लूं क्रें नें लूं ह्स्लीं प्लूं शां स्लूं प्लीं प्रें अं औं म्ल्रीं श्रां सौं श्रौं प्रीं हस्व्रीं
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

(8) श्रौं म्हल्रीं प्रूं एं क्रों ईं एं ल्रीं फ्रौं म्लूं नों हूं फ्रौं ग्लौं स्मौं सौं स्हों श्रीं ख्सें क्ष्म्लीं ल्सीं ह्रौं वीं लूं व्लीं त्स्त्रों ब्रूं श्क्लीं श्रूं ह्रीं शीं क्लीं फ्रूं क्लौं ह्रूं क्लूं तीं म्लूं हं स्लूं औं ल्हौं श्ल्रीं यां थ्लीं ल्हीं ग्लौं ह्रौं प्रां क्रीं क्लीं न्स्लुं हीं ह्लौं ह्रैं भ्रं सौं श्रीं प्सूं द्रौं स्स्त्रां ह्स्लीं स्ल्ल्रीं 
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

(9) रौं क्लीं म्लौं श्रौं ग्लीं ह्रौं ह्सौं ईं ब्रूं श्रां लूं आं श्रीं क्रौं प्रूं क्लीं भ्रूं ह्रौं क्रीं म्लीं ग्लौं ह्सूं प्लीं ह्रौं ह्स्त्रां स्हौं ल्लूं क्स्लीं श्रीं स्तूं च्रें वीं क्ष्लूं श्लूं क्रूं क्रां स्क्ष्लीं भ्रूं ह्रौं क्रां फ्रूं 
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

(10) श्रौं ह्रीं ब्लूं ह्रीं म्लूं ह्रं ह्रीं ग्लीं श्रौं धूं हुं द्रौं श्रीं त्रों व्रूं फ्रें ह्रां जुं सौः स्लौं प्रें हस्वां प्रीं फ्रां क्रीं श्रीं क्रां सः क्लीं व्रें इं ज्स्हल्रीं 
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

(11) श्रौं क्रूं श्रीं ल्लीं प्रें सौः स्हौं श्रूं क्लीं स्क्लीं प्रीं ग्लौं ह्स्ह्रीं स्तौं लीं म्लीं स्तूं ज्स्ह्रीं फ्रूं क्रूं ह्रौं ल्लूं क्ष्म्रीं श्रूं ईं जुं त्रैं द्रूं ह्रौं क्लीं सूं हौं श्व्रं ब्रूं स्फ्रूं ह्रीं लं ह्सौं सें ह्रीं ल्हीं विं प्लीं क्ष्म्क्लीं त्स्त्रां प्रं म्लीं स्त्रूं क्ष्मां स्तूं स्ह्रीं थ्प्रीं क्रौं श्रां म्लीं
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

(12) ह्रीं ओं श्रीं ईं क्लीं क्रूं श्रूं प्रां स्क्रूं दिं फ्रें हं सः चें सूं प्रीं ब्लूं आं औं ह्रीं क्रीं द्रां श्रीं स्लीं क्लीं स्लूं ह्रीं व्लीं ओं त्त्रों श्रौं ऐं प्रें द्रूं क्लूं औं सूं चें ह्रूं प्लीं क्षीं 
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

(13) श्रौं व्रीं ओं औं ह्रां श्रीं श्रां ओं प्लीं सौं ह्रीं क्रीं ल्लूं ह्रीं क्लीं प्लीं श्रीं ल्लीं श्रूं ह्रूं ह्रीं त्रूं ऊं सूं प्रीं श्रीं ह्लौं आं ओं ह्रीं 
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु॥

दुर्गा दुर्गर्तिशमनी दुर्गापद्विनिवारिणी। 
दुर्गमच्छेदिनी दुर्गसाधिनी दुर्गनाशिनी॥
दुर्गनिहन्त्री दुर्गमापहा। 
दुर्गमग्यानदा दुर्गदैत्यलोकदवानला॥
दुर्गमा दुर्गमालोका दुर्गमात्मस्वरूपिणी। 
दुर्गमार्गप्रदा दुर्गमविद्या दुर्गमाश्रिता॥
दुर्गमग्यानसंस्थाना दुर्गमध्यानभासिनी। 
दुर्गमोहा दुर्गमगा दुर्गमार्थस्वरूपिणी॥
दुर्गमासुरसंहन्त्री दुर्गमायुधधारिणी। 
दुर्गमाँगी दुर्गमता दुर्गम्या दुर्गमेश्वरी॥
दुर्गभीमा दुर्गभामा दुर्गभा दुर्गदारिणी॥
{3बार}
ॐ नमश्चण्डिकायैःॐ दुर्गार्पणमस्तु॥

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शुक्रवार, 12 सितंबर 2025

खूबसूरत खेतार गाँव और सतधारा मेंं बटी दीहारीन झूंझा

खूबसूरत गाँव खेतार और सतधारा में बटी दीहारीन झूँझा
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        कोरबा जिले के कोरबा विकासखंड अंतर्गत कोरबा से लेमरू मार्ग पर बाल्को होते हुए जिला मुख्यालय से लगभग 22.8 किलोमीटर दूर ग्राम गहनिया का आश्रित गाँव खेतार है। यह गाँव प्रकृति की गोद में बसा एक खूबसूरत गाँव है । चारों तरफ से जंगल और पहाड़ियों से घिरा हुआ यह गाँव, अपनी नैसर्गिक सुंदरता से परिपूर्ण है। गाँव केसलानाला के दाहीने तट पर बसा था। जो अब नाले से लगभग एक किलोमीटर दूर पीछे खिसक गई हैं।  केसलानाला, शुद्ध और पीने योग्य साफ जल से लबालब रहती है। यह नाला हसदेव नदी की सहायक जलधारा है, जो सदानीरा है।  गाँव में चंद घर ही हैं। जो पूर्णतः जनजातिय लोगों का गाँव है ।जहाँ मांझी और मझवार जनजाति की अधिकता है। यह नाला गाँववालों की कृषि के मुख्य आधार भी है। गाँव के मध्य एक इमली का पेड़ है जिसके आसपास ही गाँव बसा हुआ है।
        गाँव तक जाने के लिए कच्चा रास्ता बना हुआ है। जिसमें छोटे-बड़े पत्थरों को डाल कर कीचड़ से बचने का उपाय किया गया है। आज भी यहाँ पक्के मार्ग की राह गाँववालों के तरफ से देखा जा रहा है। पथरीला राह, जिसमें संभलकर यात्रा करनी पड़ती है। गाँव में एक एकल शिक्षक विद्यालय है। जिसमें प्राथमिक शिक्षा तक अध्यापन कार्य होता है। यहाँ पढ़ाने के लिए कोरबा के मुड़ापार से एक शिक्षिका जाती हैं, जिनका नाम आशा सिंह सूर्यवंशी हैं। जब मैं गाँव पहुंँचा , दो अक्टूबर का दिन था। गाँधी और शास्त्री जी की जयंती थी। शिक्षिका, बच्चों की रैली निकालकर गाँव की भ्रमण करा रही थीं। देशभक्ति के नारे लगवाए जा रहे थे। जिसकी आवाजें आ रही थीं। मुझे अपना बचपना याद आ गया ।बच्चों के आवाज के पीछे-पीछे मैं भी स्कूल पहुंँच गया। तब तक रैली स्कूल पहुँच चुकी थी। बच्चे, विद्यालय में जा चुके थे। स्कूल के एक कमरे में बच्चे दरी बिछाकर के जमीन पर बैठे हुए थे। एक बच्चा गांँधी जी बना हुआ था।            जिसने कागज के बने हुए सफेद चश्मा पहन रखे थे, एवं हाथ में लाठी  भी रखे हुए थे । विद्यालय पहुँचकर जब सब जमीन में दरी में बैठ गए उसी समय मैं भी पहुंँचा । गाँव के पुराने स्थलों की जानकारी लेने के लिए मैं विद्यालय पहुंँचा था। पर वहाँ शिक्षक के रूप में  शिक्षिका मिली। उन्होंने ऐसे स्थलों की जानकारी के बारे में अनभिज्ञता प्रकट की। तब उनसे अनुमति लेकर बच्चों से बात करने लगा। उनसे बात कर अच्छा लगा। फिर उन्हें जमीन में बैठकर गांँधीजी और शास्त्री जी के जीवन के बारे में बताने लगा। बच्चों को गणेश जी की मातृ-पितृ भक्ति की कहानी बताकर उन्हें धरती के साक्षात भगवान होने के बारे में बताने लगा। अंत में अपने साथ बिस्किट ले गया था, उसे बच्चों को वितरित किया। बच्चे और शिक्षिका बहुत खुश हो गए ।        
        गाँव में कोई अस्पताल नहीं है। गाँव में आज भी बीमार पड़ने पर लोग गाँव के बैगा के पास ही जाते हैं। गाँव के बैगा का नाम है , बनवारी मांझी । गाँव में पहुँचा तो इमली पेड़ के नीचे बने घर में एक व्यक्ति बीमार था। उसे झाड़-फूंक के लिए बनवारी मांझी को बुलाया गया था । मैं भी उसकी इलाज पद्धति को देखना चाहता था। बनवारी बैगा , बांस की बनी एक डंडे को शक्ति का प्रतीक मानकर रखे हुए थे। डंडा बहुत पुराना था। तेल और धुएँ के प्रभाव से काला हो गया था। वह तंत्र-मंत्र और डंडे की शक्ति से इलाज करने का दावा करते हैं। मुझे उनके साथ जाने की अनुमति नहीं मिला। इसलिए इस बारे में ज्यादा नहीं बता सकता हूँ। गाँव में एक बच्ची आँगनबाड़ी केन्द्र से वितरण किए गए पोषक खाद्य पदार्थ को लेकर घुम रही थी।
         इसलिए मैं उस समय का लाभ लेने के लिए गाँव के ही एक युवक अमर मांझी को लेकर वहाँ के पिकनिक स्थल जाने का निश्चय किया। इमली पेड़ से दाहिने तरफ लगभग एक-डेढ़ किलोमीटर दूर पैदल चलकर एक नाले को पार कर उस पर बने दीहारीन झूँझा पहुँचा। दीहारीन झूँझा मैदानी भाग पर बना हुआ एक खूबसूरत जलप्रपात है। यह जलप्रपात 22• 28' 58" उत्तरी अक्षांश और 82• 50 '32" पूर्वी देशांतर पर समुद्र तल से 1337.57 फीट की ऊंँचाई पर स्थित है ।यह लगभग 25 मीटर की दूरी पर छोटी-बड़ी सात जलधाराएंँ बनाकर जलप्रपात के रूप में गिरती हैं । जलप्रपातों की ऊँचाई ज्यादा नहीं है ,पर ये अपनी प्राकृतिक सुंदरता और सतत जलधारा के लिए चित्ताकर्षक हैं। गाँववाले इसे दीहारीन झाँझा के नाम से जानते हैं , पर इसे यह नामकरण कैसे पड़ा कोई नहीं जानते हैं । मेरे मतानुसार अपनी सात धाराओं के रूप में गिरने के कारण इन जलधाराओं को सतधारा जलप्रपात ,खेतार कहना ज्यादा उचित जान पड़ता है।
         यदि गाँव तक पक्की सड़कें बन जाए तो यहाँ ज्यादा पर्यटक पहुँच सकते हैं। इससे गाँववाले ज्यादा लाभान्वित हो सकते हैं। जहाँ तक उस बीमार व्यक्ति के बीमार होने का है , मेरे मतानुसार इमली का पेड़  इसके लिए ज्यादा उत्तरदाई लगता है , क्योंकि इमली का पेड़ 24 घंटे कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन करती रहती है। ऐसे में उसके नीचे रहने वाले लोगों की स्वास्थ्य खराब होने की संभावना ज्यादा रहती है।  इस दिशा में जन जागरूकता की भी आवश्यकता है । तो सप्ताह में वहाँ किसी न किसी एक स्वास्थ्य कर्मी का दौरा कराया जाना भी उचित होगा।  जिसके बारे में शासन-प्रशासन को ध्यान देने की आवश्यकता है।

सोमवार, 14 जुलाई 2025

एक अनोखा मुगल कालीन राम चरित मानस


मुगलकालीन तुलसीदास कृत रामचरित मानस, लिथोग्राफ पर मुद्रित
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       जिला पुरातत्त्व संग्रहालय कोरबा में लिथोग्राफ पर मुद्रित एक दुर्लभ रामचरित मानस पर्यटकों के देखने के लिए रखा गया है । जो जिला पुरातत्त्व संग्रहालय के मार्गदर्शक श्री हरि सिंह क्षत्री को कोरबा जिले के करतला विकासखंड अंतर्गत उमरेली निवासी सेवानिर्वृत्त प्रधानपाठक श्री तेजी राम सोनी ने उन्हें नदी में विसर्जन करने के लिए दिया था, जिसकी महत्ता को जानकर उसे कोरबा ले आया और उसे साफकर  सुरक्षित रुप से संग्रहालय में रख दिया है।  यह पुस्तक बहुत पुरानी पर महत्वपूर्ण है। यह अत्यंत जीर्णशीर्ण  होने के कारण संरक्षित किए जाने योग्य है।
        इस राम चरित मानस के अनुशीलन से पता चलता है कि इनका अलग अलग काण्ड अलग अलग तिथि को लिखे गए हैं और मुद्रित भी हुए हैं। इसमें एक जगह लिखा है कि- 'इति श्रीराम चरित मानसे सकल कलि कलुष विध्वंसने विमल विज्ञान वैराग्य सम्पादनो  नाम तुलसीकृत वालकाण्ड प्रथमः सोपानः समाप्तः संवत १५४६  मिति वैशाखवदी १५ दिन सोमवार । आगे श्लोक ७, चौपाई १५७५, छन्द ३५ , सोरठा ३६ ,  और दोहा ३६१  की संख्या के साथ लिखंत  कालीचरन ।। मतवै फ़ैज़रसां शहर लखनऊ अक़बर सराय आग़ामीर मेल एहत्माम ज़ामिन अली खां  के छापा गया।। २६ अपरैल सन् १८८५ ईस्वी।।वारसेयुम।।  यहाँ कुछ मानवीय गलतियाँ दृष्टिगोचर होती हैं।         इसी तरह एक पृष्ठ पर 'इति  श्रीराम चरित मानसे सकल कलि कलुष विध्वंसने विमल वैराग्य संपादने तुलसीकृत आरण्यकांड तृतीय सोपानः समा०'  लिखा गया है।
       इसी तरह से एक चित्र के नीचे ' संवत १५४४ मिति कुँवारवदी १५  १७  सितम्बर सन्  १८८७ ई० ' लिखा है।
        इसी तरह किष्किंधाकाण्ड - शहर लखनऊ मु० अकबर सराय आगामीरमतवय फैज़रसंमिंएहत्माम ज़ामिन अली खां से छपावा रचहारुम २० नवम्बर १८८५  ईसवी ' को लिखा गया पाया गया है।      इसी तरह इस राम चरित मानस में एक जगह -' कृपा श्री भगवान में,  यह पोथी छपी शहर लखनऊ मुहल्ले , लंकाकांड अकबर सराय आगामी रमेमतवपे , जरसो , जामिल अली खाँ से छ०' लिखा पाया गया ।
         इसी तरह एक पृष्ठ पर ' इति श्री राम चरित मानस  तुलसीकृत सुन्दरकाण्ड पंचम सोपान समाप्त संवत १५४५  आषाढ़वदी ८' लिखा पाया गया है।
         इस पोथी में अनेक मानवीय भूलें मुद्रित हैं। कहीं लकीर में जगह कम पड़ने पर शेष शब्दों को आड़ी के बजाय खड़ी कर मुद्रित किया गया है। कहीं मात्राओं में भूल की गई है तो कहीं शब्दों में। 
          इस पोथी में पचास से भी अधिक हस्तचित्र  चित्रांकन किया गया है। इन चित्रों में भी अनेक भूलें हैं।  जैसे - रावण के सिर को देखने से पता चलता है कि कहीं नौ सिर है तो कहीं ग्यारह। एक जगह नौ सिर तो दसवें सिर के रूप में गधे को दिखाया गया है ।      इस तरह से यह लिथोग्राफ पर मुद्रित राम  चरित मानस अपनी अनेकों विशेषताओं के साथ एक अनोखी पोथी है , और अद्वितीय भी।
 सूत्र -
1/-  पोथी के मूल स्वामित्व श्री तेजी राम सोनी जी के व्यक्तिगत विचार, 
 2/- जिला पुरातत्त्व संग्रहालय के मार्गदर्शक श्री हरि सिंह क्षत्री को कथनानुसार विचार