काली स्याह रातों में
घने जंगलों से
गुजरता हुआ मैं
किसी एक पहाड़ी गुफा से
एक भयानक दर्द भरी आवाज
मेरी कानों में गूंज गई
दहसत और अज्ञात भय से
भयभीत और आशंकित मन
उस वीराने की ओर सहसा ही
मेरा सिर घुमता चला गया।
अज्ञात भय ने उस दिन पथ रोका।
क्या हुआ होगा ?
किसकी चीख उठी होगी ?
इतना दर्द किसकी होगी ?
क्या कोई पशु की होगी चीख ?
या वीरानी ताकतों की ?
पर सशंकित मन प्रश्नों को दे गया था जन्म
उस रात की चीख की सच क्या रही होगी ?
मचल उठा था मन उधर जाने को।
चल पड़ा था अकेले ही घर से
चल पड़ा उस गांव की ओर
एक और ही खोज की ओर।
गांव के एक वयोवृद्ध से
उस रात की चीखों की चर्चा करते हुए
सच जानने की आशा से
एक बुजुर्ग से किया संवाद।
उस दिन उसने भी चित्कार सुना था।
जिससे गांव वाले भी आतंकित थे।
गांव में झाड़-फूंक वह करता था।
गांव गांव में ऐसी कहानियां होती हैं।
खूनी पंजे की कहानियां सूनाई जाती थी।
गुफाओं में होती है चूडैल और वीरानी शक्ति
उस रहस्य को भेदना चाहता था।
उस दिन उसने साथ मिलकर
हमने देखे थे खूनी पंजे,
हड्डियों का ढेर, फूटी हुई मिट्टी के बर्तन के टूकड़े
उस दिन वहां किसी जंगली जानवर ने वहां
किसी मासूम का शिकार किया था।
उस दर्द में भयानक संघर्ष की कहानी
उस दिन गांव में उस भयानक चीख़ों की सच लौट आया
उस गुफा की आदिम कहानी से रुबरु होकर
गांव को वहां की अज्ञात भय से मुक्ति मिली।
और मुझे मिला पुरातत्व का खज़ाना
फिर क्या था, मुझे मिलने लगे थे साथी
खोज की सिलसिला चल पड़ा।
इस तरह वीरानी दहसत ने
स्वरचित कविता -
हरि सिंह क्षत्री मार्गदर्शक जिला पुरातत्व संग्रहालय कोरबा
मोबाइल -9827189845
लगे रहो भाई, अपने नियति को पूर्णता तक पहुंचाओ।
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