2/- विषय - लिखामाड़ा शैलाश्रय ,ओंगना , धरमजयगढ़, रायगढ़
3/- स्थिति-
लिखामाड़ा शैलाश्रय , ओंगना , धरमजयगढ़ तहसील एवं विकासखंड अंतर्गत आता है। ओंगना गांव पटवारी हल्का नंबर 30 के अंतर्गत आता है। जिला मुख्यालय रायगढ़ से धरमजयगढ़ की दूरी लगभग 70 किलोमीटर है। यहां से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर ओंगना गांव है। गांव से लगभग 1-2 किलोमीटर की दूरी पर लिखामाड़ा शैलाश्रय पहाड़ी पर स्थित है।
वहीं जिला मुख्यालय कोरबा से रिस्दी ,कोरकोमा, चचिया, हाटी होते हुए लगभग 72 किलोमीटर की दूरी पर धरमजयगढ़ पड़ता है। यहां श्री धीरेन्द्र सिंह मालिया जी से संपर्क कर ओंगना जाने पर मार्ग सहज हो जाता है। उनके साथ चलने पर धरमजयगढ़ से पांच किलोमीटर दूर स्थित ओंगना गांव आसान पड़ता है। ओंगना गांव पहुंचकर बांयें तरफ एक मोड़ आता है । यहां से थोड़ी दूर पर क्रिकेट का एक मैदान है , जिसमें एक मंच भी बना हुआ है। यहां पर चार पहिया वाहनों को खड़ा कर पैदल ही लिखामाड़ा शैलाश्रय ओंगना तक पहुंचा जा सकता है। जबकि दो पहिए वाहन से शैलाश्रय तक सीधे ही पहूंच सकते हैं।*1
4/-- अक्षांश और देशांतर
22°26'17" उत्तरी अक्षांश और 83°14'13" पूर्वी देशांतर पर समुद्र तल से 1286.71 फिट +-155
5/- अनूमानित समय
लिखामाड़ा शैलाश्रय ओंगना के शैलचित्रों का अनुमानित समय पुरातत्व वेत्ताओं ने 10,000 - 15000 बीसी माना गया है। परन्तु मेरा मत है कि इनमें से दो शैलाश्रयों के शैल चित्रों का अनुमानित समय पौराणिक काल का होना चाहिए।
6/- मापन
लिखामाड़ा शैलाश्रय ओंगना एक पहाड़ी पर स्थित है। जिसमें अनेक छोटे-बड़े शैलाश्रय हैं। पहाड़ी के जिस हिस्से में शैल चित्र और पाषाण कालीन लघु उपकरण मिलते हैं लगभग 200 मीटर के परिक्षेत्र में विस्तृत है।*2
7/- अवलोकन
रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ तहसील व विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत ओंगना तहसील मुख्यालय से महज 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जहां से पहुंचने के लिए पक्का सड़क मार्ग है । ओंगना शब्द लोक भाषाओं विशेष कर छत्तीसगढ़ी ,भोजपुरी, अवधि आदि में प्रयुक्त होता है। जिसका अर्थ लिपना या पोतना होता है। विशेष रूप से गोबर, मिट्टी या गेरू से घर आंगन या दीवार को लीपना या ओंगना। जैसे कि घर के आंगन ल गोबर से ओंगना / लिपना / पोतना अर्थात् आंगन को गोबर मिट्टी से लिपना। यह शब्द ग्रामीण परंपराओं पर लोक संस्कृति से जुड़ा हुआ है। जहां त्योहारों या शुभ अवसरों पर घर को ओंगना (सजाना) या पोतना शुभ माना जाता है।
दूसरे अर्थ में ओंगना का अर्थ 'पोतना' से लगाया जाता है। ग्रामीण अंचल में बैल अथवा भैंस गाड़ा होता है। इसके मध्य में पुटी लगा होता है। जो लोहे का बना होता है। गाड़ी चलने पर इसमें घर्षण होता है। इसी घर्षण को कम करने के लिए पहिए में ग्रीस या अंडी का तेल लगाया जाता है । लिखामाड़ा शैलाश्रयों के पास से ही प्राचीन गाड़ा मार्ग (रवन) गुजरता है। यहां से गुजरते समय ग्रामीण पहिए में तेल य ग्रीस ओंगते (डालते) थे। इससे पहिए में घर्षण कम होती है। इसी कारण इस गांव का नाम ओंगना पड़ा।*3
मेरी मत है कि यहां की प्राचीन सांस्कृतिक पहचान के कारण पहले वाला कारण ज्यादा उचित लगता है यहां के शैलाश्रय को हम चार भागों में बांट सकते हैं। जिसका अपना सांस्कृतिक महत्व है ।
1/- लिखामाड़ा
2/- आवासीय माड़ा
3/- रावणमाड़ा, और
4/- बंदरमाड़ा।
ओंगना गांव के शैलाश्रयों को तो पुरा देश लिखामाड़ा*4 के नाम से जानते हैं। लेकिन इसे चार भागों में रखा जा सकता है। इसमें पहले ही शैलाश्रय को जिसमें लगभग 400 से अधिक की संख्या में शैल चित्र हैं।*5 यह शैलाश्रय अपने नाम के अनुरूप ही है। इस शैलाश्रय को हम प्रागैतिहासिक काल का मान सकते हैं। पूर्व में ही पुरातत्ववेत्ताओं ने यहां के चित्रों को 10,000 से 15,000 वर्ष बीसी के मध्य का माना है।
लिखामाड़ा शैलाश्रय इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करता है। लिखामाड़ा शैलाश्रय 22°26'17" उत्तरी अक्षांश और 83°14'13" पूर्वी देशांतर पर समुद्र तल से 1286.71 फिट +-155 फिट की ऊंचाई पर स्थित है। इस शैलाश्रय में प्राचीन संस्कृति की की संपूर्ण झलक दिखाई गई है। इस शैलाश्रय में सामुहिक नृत्य करते हुए मानव , प्रागैतिहासिक काल के मानवों के पंजे ज्यामितीय चिन्ह, बैल आदि बनाए गए हैं। इस शैलाश्रय के चित्रों में रेखांकन कार्य बहुत ही बारिकी से किया गया है। यहां यह भी स्पष्ट होता है कि यहां पूर्व में भी चित्र रहे होंगे। जिसको पुताई (ओंग )कर दोबारा चित्र बनाने का प्रमाण मिलता है। यहां आदिमानवों के द्वारा लंबी अवधि बिताई गई होगी। जिसका प्रमाण यहां के चित्र देते हैं ।यहां के चित्र न तो किसी एक व्यक्ति के द्वारा बनाया गया प्रतीत होता है ,और न ही किसी एक काल में ही ।
एक कलाकार होने के नाते चित्रकला में मेरा जो अनुभव है, उसके आधार पर यह कह सकता हूॅं कि यहां के चित्रों को प्रागैतिहासिक काल के किसी महिला के द्वारा बनाई गई होगी। यह अनुभव जनित ज्ञान है। पुरुषों के अपेक्षा महिलाएं भावनात्मक रूप से कहीं अधिक कोमल होती हैं। यहां के चित्र भाव प्रधान है। लकीरें महीनता से खींची गई हैं । यहां के चित्र तात्कालिक संस्कृति की झलक प्रदर्शित करती हैं।
विदेशी विद्वानों में विक्टर लाॅनफोर्ड , रोधा केलाॅग और हार्वर्ड गार्डनर जैसे विद्वानों का भी मत है कि स्त्रियां या बालिकाऐं मानव आकृतियों और सजावटी पैटर्न की ओर अधिक आकर्षित होती हैं। लड़कियां डिटेल्स और पर्सनल रिश्तों पर जोर देती हैं, जबकि लड़के एक्शन और मुवमेंट पर।
भारतीय संदर्भ में महिलाओं द्वारा निर्मित लोक चित्रों में अलंकरण, प्रकृति, देवी-देवता, विवाह, उत्सव और घरेलूजीवन के दृश्य अधिक मिलते हैं, जबकि पुरुष कलाकारों में युद्ध, शिकार, राजकीय दृश्य, स्थापत्य तथा वीरता प्रधान चित्र अधिक पाए जाते हैं।
उपरोक्त दोनों ही मतों के आधार पर अगर हम ओंगना के लिखामाड़ा शैलाश्रय पर बने शैलचित्रों पर ध्यान दें, तो यहां के चित्रों में कहीं भी शिकार के चित्र नहीं दिखता है। यहां के चित्रों में हाथ के पंजे, ज्यामितीय अलंकरण, सामूहिक नृत्य, जिसमें सब एक साथ समूह में नृत्य करते हुए दिखाई देते हैं।
गहराई से चित्रों को देखने पर एक बात और स्पष्ट होती है कि लिखामाड़ा शैलाश्रय के अधिकांश चित्रों को किसी गर्भवती महिला के द्वारा बनाई गई होगी। गर्भवती होने के कारण उसे शैलाश्रय में ही अधिक समय व्यतीत करना होता होगा। ऐसे में खाली समय में विभिन्न प्रकार के विचार उनके मन में आते रहे होंगे । वह महिला अपने भावी जीवन और आने वाले नन्हें मेहमान को जीवन मार्ग की शिक्षा देने और विविध सांस्कृतिक क्षेत्र से सचित्र परिचय कराने के लिए , पहले शैलाश्रय के खाली स्थान पर विविध चित्रों की रचना की होगी। जब कोई खाली जगह नहीं बचा होगा तो पुराने चित्रों को मिटाकर, तो कहीं-कहीं उसके ऊपर दोबारा नए चित्र बनाएं जाने का साक्ष्य यहां दिखता है।
मेरे विचारों को सिद्ध करने के लिए यहां शैलाश्रय में बनी हुई एक गर्भवती महिला की भी चित्र देखने को मिलता है। यहीं नहीं यहां के चित्रों में पतली और गहरी रेखाओं को देखा जा सकता है। ऐसी रचना निश्चित रूप से कोमल मन वाली किसी महिला की ही चित्रकारी हो सकती है। माना जा सकता है कि यह चित्र उसी गर्भवती महिला के द्वारा ही बनाया गया होगा। जिसका चित्र लिखामाड़ा शैलाश्रय ओंगना में बना हुआ है।
एक चित्र में एक युगल दंपति को नृत्य करते हुए पारंपरिक वेशभूषा में दिखाया गया है इसमें दोनों को ही हार्नबिल नामक पक्षी के पूंछ को अपने सिर पर धारण किए हुए दिखाया गया है। दोनों के ही एक-एक हाथ कमर पर तो दूसरा ऊपर की ओर उठा हुआ नृत्य मुद्रा में हैं । पुरुष ने कमरबंद भी धारण किया हुआ है। इसके सिर पर पंछी के पूंछों की पंखों की संख्या अधिक है । इससे यह भी स्पष्ट होता है कि तात्कालिक संस्कृति भी पुरुष प्रधान रही होगी।
एक चित्र में चार बैलों के मध्य एक मनुष्य को दिखाया गया है। उस मनुष्य ने एक हाथ से एक बैल के सिर और दूसरे हाथ से दूसरे बैल के पूंछ को पकड़ रखा है। जो इस बात का संकेत देता है कि उस समय मानव के द्वारा पशुओं को पालना और उस पर नियंत्रण करना सीख लिया गया होगा । इसे नवपाषाणकालीन चित्र माना जा सकता है।
यह संरक्षित और ज्ञात शैलाश्रय है । इसलिए इसके बारे में विस्तृत लिखना उचित नहीं है। जितना नवीन शोध सामने आया वही लिखना उचित होगा।
लिखामाड़ा शैलाश्रय से लगा हुआ ही 18 फीट गहरी एक गुफा है । इसकी सतह चिकनी हो गयी है । यह तब होता है जब यहां आने-जाने के लिए बहुतायत से उपयोग किया गया होगा। जिसके बारम्बार घर्षण से शैलाश्रय का सतह चिकना हो गया है। गुफा के बाहर लाल गेरूवे रंग के शैलचित्र भी बने हुए हैं। इस शैलाश्रय का उपयोग जंगली जानवरों के द्वारा भी किया जाता रहा होगा। जिसे हटाकर आदिमानवों ने इस जगह पर अधिकार किया होगा।* 6 जिसका उपयोग वे सुरक्षित निवास एवं वातावरण के दुष्प्रभाव से बचने के लिए करते रहे होंगे।
शैलाश्रय क्रमांक 2 से आगे बढ़ने पर पहाड़ी मोड़ को पार करने पर शैलाश्रय क्रमांक तीन आता है। यह शैलाश्रय 22° 26' 17" उत्तरी अक्षांश और 83° 14' 40" पूर्वी देशांतर पर समुद्र तल से 1184.68 +- 187 फीट की ऊंचाई पर एक प्राकृतिक शैलाश्रय है। इसमें 10 सिरों वाली आकृतियां बनी हुई हैं । विद्वानों द्वारा इसे दशानन रावण का चित्र माना जाता हैं । स्थानीय मान्यता भी यही है। अगर इसे दशानन रावण माना जाता है , तो इसे पौराणिक काल का चित्र माना जा सकता है यदि विद्वानों द्वारा इसे रावण का चित्र स्वीकार किया जाता है तो एक नई विचारधारा पुरातत्व के विद्यार्थियों में जन्म लेगी कि क्या शैलचित्रों में रामायण की कथानक भी बनाए गए हैं ? इस आधार पर पुरातत्व के क्षेत्र में क्या शैल चित्रों को रामायण कालीन प्रमाण माना जा सकता है ? क्या इसके वैज्ञानिक आधार पर परीक्षण कर रामायण की तिथि निर्धारण करने में भी सहायता मिल सकती है ? यहां शैलाश्रय में तीन-चार की संख्या में दशानन रावण को देखा जा सकता है। इसका वैज्ञानिक शोध करना आवश्यक है। शोध का विषय भी है कि यह वास्तव में किस काल की कृति है ? इस कारण से यह एक महत्वपूर्ण चित्रित शैलाश्रय हो सकता है।
शैलाश्रय क्रमांक 3 के आगे लगभग 50 मीटर चलने पर शैलाश्रय क्रमांक चार आता है। यह शैलाश्रय 22° 26' 19" उत्तरी अक्षांश और 83° 14' 40" पूर्वी देशांतर पर समुद्र तल से 1185.6 +- 328 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इस शैलाश्रय में भी पौराणिक कालीन शैलचित्र बना हुआ माना जा सकता है। इसमें कुछ चित्र नवपाषाण कालीन भी प्रतीत होते हैं। इस शैलाश्रय के प्रमुख चित्रों में से एक वह चित्र है, जिसमें एक काले रंग के गड्ढे को सिर बनाकर दैत्याकार एक चित्र बनाया गया है। दैत्याकार कहने का अर्थ है कि यहां शैलाश्रय में कुछ बंदर और मानव द्वंद्व को दिखाएं गए हैं । इन आकृतियों की अपेक्षा वह आकृति बहुत बड़ा है। यदि हम शैलाश्रय क्रमांक -3 में दशानन रावण का सचित्र मानते हैं, तो क्या यह शैलाश्रय क्रमांक 4 का शैलचित्र उनके अनुज कुंभकरण का हो सकता है ? यहां के शैलचित्रों में कुछ जगह वानर और मानव द्वंद्व को चित्रित किया गया है। तो क्या यह राम-रावण युद्ध को प्रदर्शित किया गया है ? यदि हम उसे कुंभकरण नहीं मानते हैं, तो क्या यह विशाल दैत्याकार आकृति किसी दैत्य या कोई भूत की आकृति है ? क्योंकि इसके सिर को यह जहां काले गड्ढे को अंधकार युक्त दिखाया गया है। इसी शैलाश्रय में एक जगह दशानन को भी दिखाया गया है। जिसके आगे दो मानवाकृतियों को मशाल लेकर जलाते हुए दिखाएं गए हैं । इसी शैलाश्रय में स्वास्तिक और चक्र जैसे शुभता के प्रतीकों को भी बनाया किया गया है। क्या यह सब महज एक संयोग है ? या फिर सोच समझकर बनाई गई रामायण के कथानक पर आधारित चित्रों को प्रदर्शित किया गया है।
8/- निष्कर्ष:-
ओंगना के शैल चित्रों को आधार मानकर हमें पौराणिक धारणाओं को इतिहास मानकर अन्य जगहों में मिले शैलचित्रों का भी अध्ययन करना चाहिए, तब शायद शैलचित्रों के प्रति पाश्चात्य अवधारणाओं को खंडित कर भारतीय विचारधारा धाराओं को पुरातत्व के क्षेत्र में अंगीकार कर, पुराने ढर्रे पर चले आ रहे अवधारणाओं को ध्वस्त किया जा सकता है क्योंकि कोरबा जिले के सूअरलोट गांव के सीताचौकी शैलाश्रय में मिले सीताहरण के कथानक संबंधित शैलचित्रों की कथानक पर हमने अपनी खोज और मत को विद्वानों के समक्ष सप्रमाण रखा एवं शोध-पत्र भी प्रकाशित किया है।
लिखामाड़ा शैलाश्रय के विस्तृत क्षेत्र में मध्य पाषाण कालीन लघु उपकरणों और कोरों का भंडार है। जो रत्नों और उपरत्नों के स्तर के हैं। इस तरह यह शैलाश्रय हर दृष्टि से अत्यंत ही महत्वपूर्ण हो जाता है। जिसपर विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता है।
9/- संदर्भ :-
1/- प्रो. श्री धीरेन्द्र सिंह मालिया - स्थानीय जानकारी, धरमजयगढ़
2/ - प्रो. श्री धीरेन्द्र सिंह मालिया - स्थानीय जानकारी, धरमजयगढ़
3/- प्रो. श्री धीरेन्द्र सिंह मालिया - स्थानीय जानकारी, धरमजयगढ़
4/- श्री बसंत प्रधान - साक्षात्कार, केयर टेकर, लिखामाड़ा शैलाश्रय, ओंगना
5/- श्री बसंत प्रधान - साक्षात्कार, केयर टेकर, लिखामाड़ा शैलाश्रय, ओंगना
6/- प्रो. श्री धीरेन्द्र सिंह मालिया - स्थानीय जानकारी, धरमजयगढ़
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