बुधवार, 27 मार्च 2024

चींटियों का संसार

                                 दुर्गाछी का घर
                           चींटियों की दुनिया 
           काली चींटी, लाल चींटी, दुर्गाछी , मटारा , चांटा,आदि। ऐसे ही कभी-कभी समूह में कुछ ही समय के लिए दिखने वाली छोटी काली चींटी पता नहीं कहां से आती हैं और कहां चली जाती हैं। बड़े आकार के काली चींटी भी समूह में आती हैं। पर ये दोनों ही सीधे होते हैं कुछ भी नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। परंतु छोटी-छोटी लाल चींटियों की समूह या लाल माटा(मटारा) ये आक्रामक होती हैं और और कटीली तथा जहरीली भी।
                               लाल माटा (मटारा )
काली चींटियों में दुर्गाछी चींटियां ही जहरीली और आक्रामक होती हैं। इनके समूह द्वारा तो मैंने कोबरा सांप को भी घेर कर मारकर खाने तक की स्थिति देखा है। 
             इनसे एक शिक्षा ली जाती है कि जब आप आकार में छोटे हैं तो अपनी समूह को बड़ा कीजिये, और समूह की शक्ति से ताकतवर को पराजित किया जा सकता है। यह सामर्थ्य अवगत करवाइये।
             सीधे-सादे काली चींटी आमतौर पर घरेलू होती हैं। जबकि लाल चींटी आमतौर पर जंगली और जहरीली। काली चींटी दुर्गाछी ही जंगली होती हैं इसलिए आक्रामक होती हैं। 
                           दुर्गाछी चींटियों की कतार
             चींटियों की तीन भाग होती हैं पहला मुख दुसरा पेट और तीसरा स्टोर रूम । काली चींटी मीठा भोजन करती हैं । आंटा खाती हैं और रोटियां और चांवल भी, जबकि लाल छोटी चींटी जमीन के अंदर ठंडे स्थान पर रहना पसंद करती हैं । इनके  स्टोर रूम शरीर के तीसरे भाग में मीठे तरल पदार्थ होता है।वहीं लाल माटा (मटारा) आमतौर पर आम के पेड़ों पर घोंसला बना कर रहती हैं। इनके स्टोर रूम तीसरे भाग में खट्टे तरल पदार्थ होता है। जबकि काली दुर्गाछी चींटियों के तीसरे भाग रासायनिक पदार्थ से भरी हुई होती हैं। ये जहरीली होती हैं। इनके काटने से तेज जलन होती है, ज्यादा चींटियों के काटने से तेज बुखार हो सकता है और मौत भी।
                कोरबा के वनांचल में एक प्रकार की और चींटियां पाई जाती हैं , ये चींटियां भी पेड़ों में पाई जाती हैं परंतु ये चींटियां पेड़ों पर माटा की तरह पत्तियों से घर नहीं बनाती हैं वरन ये पेड़ों पर मिट्टी के घोंसला बनाती है । इनका समूह जीतना बड़ा होता है उतना ही बड़ा उनका घरौंदा भी होता है । ये घोंसला पूर्णतः सुरक्षित और वातानुकूलित होती है। अंदरुनी भाग में मादा चींटियां अपने अंडों की सुरक्षा करती हैं। 
          चींटी फोरमिसिडाए नामक जीववैज्ञानिक कुल में वर्गीकृत है। इस कुल की 12,000 से अधिक जातियों का वर्गीकरण किया जा चुका है और अनुमान है कि इसमें लगभग 10,000 और जातियाँ हैं। इनका विश्व के पर्यावरण में भारी प्रभाव है, जिसका चींटी  शास्त्री गहरा अध्ययन करते हैं। रानी चींटी की उम्र लगभग 20 साल होती है जबकि अन्य चीटियां 45 से 50 दिन का ही जीवन जी पाती है  
           मान्यतानुसार अगर आपको अपने घर में काली चींटियां दिखाई दें तो इसका मतलब है कि आपके जीवन में कुछ अच्छा होने वाला है। यह सौभाग्य की निशानी की तरह है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आपके घर में हर समय चींटियां रहें। जब आप काली चींटियों को देखते हैं तो इसका मतलब है कि आपके जीवन में कुछ अलग हो रहा है। उनका स्वागत करने के लिए आप आटा छिड़क सकते हैं। एक बार जब आपके इष्ट देव को पता चल जाएगा कि आपको संदेश मिल गया है, तो चींटियां अपने आप चली जाएंगी।
           अगर आपको अपने घर में लाल चींटियां दिखाई दें तो इसका मतलब यह हो सकता है कि पैसों को लेकर कुछ बुरा हो सकता है। अचानक किसी समस्या के कारण आपको पैसे उधार लेने पड़ सकते हैं। चींटियां शनि देवता का संकेत हैं, जिससे आपको सावधान रहना चाहिए और जो हो रहा है उस पर ध्यान देना चाहिए। लाल चींटियों को अक्सर एक बुरे संकेत के रूप में देखा जाता है। इनके आने का मतलब आपके घर में कंगाली आने वाली है । ऐसी मान्यता है।
            आमतौर पर लोग इन चींटियों से तुरंत छुटकारा पाने की कोशिश करते हैं, लेकिन ऐसा करने से बचना चाहिए । यदि आप शनि देवता में विश्वास रखते हैं, तो आपको उनके भेष में आने वाली चींटियों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए। इसके बजाय, आप चींटियों को भगाने के लिए नींबू, तेज पत्ता, काली मिर्च या लौंग जैसी चीजों का उपयोग कर सकते हैं। जब चींटियां इन चीज़ों को देखेंगे तो समझ जाएंगे कि आपको उनका संदेश मिल गया है और वे चली जायेंगी।

रविवार, 18 फ़रवरी 2024

राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी 16/17/18 फरवरी 2024

छत्तीसगढ़ का इतिहास : राष्ट्रीय परिपेक्ष में विषय पर आधारित शोध -संगोष्ठी का आयोजन संचालनालय पुरातत्व ,अभिलेखागार एवं संग्रहालय छत्तीसगढ़ द्वारा महंत घासीदास संग्रहालय परिसर रायपुर में तीन दिवसीय शोध-संगोष्ठी एवं रीवा उत्खनन स्थल परिभ्रमण का आयोजन किया गया।  संगोष्ठी में कुल 40 से अधिक पुरातत्वविदों ने अपने-अपने शोधों पर आधारित शोध पत्रों का वाचन किया। यह  संगोष्ठी  तीन दिन दिनांक 16/17/18 फरवरी 2024 तक चला, जिसमें पहले दिन कुल 16 शोधपत्रों का वाचन किया गया। जिसमें डॉक्टर मोना जैन, डॉक्टर आशुतोष चौरे, डॉक्टर मंगलानंद झा, प्रशांत कुमार चौरे, डॉक्टर वृषोत्तम साहू ,डॉक्टर राकेश चंदेल, डॉक्टर अनिल कुमार भंतपहरी ,डॉक्टर नितिन पांडे हरि सिंह क्षत्री , रामकुमार वर्मा ,कुमार गौरव, श्रवण चौधरी आदि विद्वानों ने अपने-अपने शोध पत्रों का वाचन किया ‌।
      वहीं संगोष्ठी के दूसरे दिन दिनांक 17 फरवरी 2024 को 24 से अधिक शोध पत्रों का वाचन हुआ। जिसमें डॉक्टर अनामिका शर्मा, डॉक्टर आशीषधर दीवान ,डॉक्टर सुशीला कुजूर , मनहरण लाल लहरे ,विनोद कुमार पांडेय ,डॉक्टर पीसी लाल यादव,  प्रिया रानी नेटी, ओम प्रकाश सोनी, अजय कुमार चतुर्वेदी, डॉक्टर विजय शर्मा, डॉक्टर के पी वर्मा, प्रिया शर्मा ,नीलिमा मरकाम , अंकिता भोई, डॉ राजकुमार वर्मा, डॉ भेनू, राहुल सिंह पूर्व संयुक्त संचालक संस्कृति विभाग आदि विद्वानों ने अपने-अपने शोध पत्रों का पाचन किया ।             इस संगोष्ठी में जिला पूरातत्व संग्रहालय कोरबा के मार्गदर्शक हरि सिंह क्षत्री ने अपने शोधपत्र वाचन में जिले के एकमात्र संरक्षित स्मारक कुदुरमाल कबीर मठ पर आधारित अपने शोध पत्र, भारतीय स्थापत्य कला का अल्पज्ञात आयाम: कुदुरमाल का कबीरपंथी मठ का वाचन किया । साथ ही जहाॅं उन्होंने इस मठ का संपूर्ण इतिहास का उल्लेख किया, वहीं उन्होंने इस मठ की सुरक्षा पर भी विभाग का ध्यान आकर्षण कराया किया कि यहाॅं लगे सभी काष्ठ शिल्पों को दीमक खा रहे हैं । स्मारक में लगाई गई लकड़ियों  को दीमक लगने से यहाॅं का छत भी कमजोर हो जाने से उनका भरभरा कर गिर जाने की भावी  संकेत पर भी विभाग को अवगत कराया।                    संगोष्ठी का तीसरा दिन स्थल परिभ्रमण का होता है ,जिसके लिए रायपुर से 26 किलोमीटर दूर पूर्व दिशा में स्थित आरंग के समीप स्थित रीवा उत्खनन स्थल को चुना गया । यहाॅं संचालनालय द्वारा प्राचीन मृतिकागढ़ क्षेत्र में उत्खनन कराया जा रहा है । जिसमें विभिन्न प्रकार के स्तूपों के अलावा आरंभिक ऐतिहासिक कालीन बस्ती के अवशेष प्रकाश में आ रहे हैं।  उत्खनन के दौरान आहत या पंचमार्क सिक्के, ठप्पांकित सिक्के, मघ, कुषाण और कलचुरी शासको के सिक्के सहित उत्तरी मार्जित मृदभांड, ब्लैक आन रेड वेयर आदि पात्र, परंपरा के ठीकरा , मूर्तियाॅं स्थापत्य खंड बिड्स ,रिंग कुपवेल आदि मिल रहे हैं।  जिसका शोधार्थियों और विद्वानों ने अध्ययन किया । राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन छत्तीसगढ़ का इतिहास राष्ट्रीय परिपेक्ष में 16 से 18 फरवरी 2024 को सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। 

गुरुवार, 11 जनवरी 2024

दुर्गा सप्तशती बीज मंत्रोंक्त

[[[नम:शिवाय]]]
                श्री गुरूवे नमः

                #श्रीदुर्गासप्तशती_बीजमंत्रात्मक_
श्री गणेशाय नमः। -11 बार

 ह्रुं जुं सः सिद्ध गुरूवे नमः।- 11 बार

दुर्गे दुर्गे रक्षीणी ठः ठः स्वाहा। -13 बार

सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम् 

ऐं ह्रीं क्लीं चामण्डायै विच्चे | ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ||

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दीनि | 
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दीनि ||
नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भसुरघातिनि |
 जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे ||
ऐंकारी सृष्टीरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका | 
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोस्तुते ||
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी | 
विच्चे चाभ यदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ||
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी |
 क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुंभ कुरू ||
हुं हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी |
 भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रै भवान्यै ते नमो नमः ||
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं | 
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा ||
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा |
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे ||
           ॐ नमश्चण्डिकायैः ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु||

प्रथमचरित्र
अस्य श्री प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषिः महाकाली देवता गायत्री छन्दः नन्दा शक्तिः रक्तदन्तिका बीजम् अग्निस्तत्त्वम् ऋग्वेद स्वरूपम् श्रीमहाकाली प्रीत्यर्थे प्रथमचरित्र जपे विनियोगः|
१:--श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं प्रीं ह्रां ह्रीं सौं प्रें म्रें ल्ह्रीं म्लीं स्त्रीं क्रां स्ल्हीं क्रीं चां भें क्रीं वैं ह्रौं युं जुं हं शं रौं यं विं वैं चें ह्रीं क्रं सं कं श्रीं त्रों स्त्रां ज्यैं रौं द्रां द्रों ह्रां द्रूं शां म्रीं श्रौं जूं ल्ह्रूं श्रूं प्रीं रं वं व्रीं ब्लूं स्त्रौं ब्लां लूं सां रौं हसौं क्रूं शौं श्रौं वं त्रूं क्रौं क्लूं क्लीं श्रीं व्लूं ठां ठ्रीं स्त्रां स्लूं क्रैं च्रां फ्रां जीं लूं स्लूं नों स्त्रीं प्रूं स्त्रूं ज्रां वौं ओं श्रौं रीं रूं क्लीं दुं ह्रीं गूं लां ह्रां गं ऐं श्रौं जूं डें श्रौं छ्रां क्लीं। 
ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु।

मध्यमचरित्र
ॐ अस्य श्री मध्यमचरित्रस्य विष्णुऋर्षिः महालक्ष्मीर्देवता उष्णिक छन्दः शाकम्भरी शक्तिः दुर्गा बीजम् वायुस्तत्त्वम् यजुर्वेदः स्वरूपम् श्रीमहालक्ष्मीप्रीत्यर्थे मध्यमचरित्र जपे विनियोगः। 

२:--श्रौं श्रीं ह्सूं हौं ह्रीं अं क्लीं चां मुं डां यैं विं च्चें ईं सौं व्रां त्रौं लूं वं ह्रां क्रीं सौं यं ऐं मूं सः हं सं सों शं हं ह्रौं म्लीं यूं त्रूं स्त्रीं आं प्रें शं ह्रां स्मूं ऊं गूं व्र्यूं ह्रूं भैं ह्रां क्रूं मूं ल्ह्रीं श्रां द्रूं द्व्रूं ह्सौं क्रां स्हौं म्लूं श्रीं गैं क्रूं त्रीं क्ष्फीं क्सीं फ्रों ह्रीं शां क्ष्म्रीं रों डुं।
ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु। 

३:-- श्रौं क्लीं सां त्रों प्रूं ग्लौं क्रौं व्रीं स्लीं ह्रीं हौं श्रां ग्रीं क्रूं क्रीं यां द्लूं द्रूं क्षं ह्रीं क्रौं क्ष्म्ल्रीं वां श्रूं ग्लूं ल्रीं प्रें हूं ह्रौं दें नूं आं फ्रां प्रीं दं फ्रीं ह्रीं गूं श्रौं सां श्रीं जुं हं सं।
 ॐ नमश्चण्डिकायैः।ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु |

४:--श्रौं सौं दीं प्रें यां रूं भं सूं श्रां औं लूं डूं जूं धूं त्रें ल्हीं श्रीं ईं ह्रां ल्ह्रूं क्लूं क्रां लूं फ्रें क्रीं म्लूं घ्रें श्रौं ह्रौं व्रीं ह्रीं त्रौं हलौं गीं यूं ल्हीं ल्हूं श्रौं ओं अं म्हौं प्रीं।
     ॐ नमश्चण्डिकायैः। ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु ।

उत्तमचरित्र
अस्य श्री उत्तमचरित्रस्य रुद्र रूषिः महासरस्वती देवता अनुष्टुप् छन्दः भीमा शक्तिः भ्रामरी बीजम् सूर्यस्तत्त्वम् सामवेदः स्वरूपम् श्री महासरस्वती प्रीत्यर्थे उत्तमचरित्र जपे विनियोगः। 

५:-- श्रौं प्रीं ओं ह्रीं ल्रीं त्रों क्रीं ह्लौं ह्रीं श्रीं हूं क्लीं रौं स्त्रीं म्लीं प्लूं ह्सौं स्त्रीं ग्लूं व्रीं सौः लूं ल्लूं द्रां क्सां क्ष्म्रीं ग्लौं स्कं त्रूं स्क्लूं क्रौं च्छ्रीं म्लूं क्लूं शां ल्हीं स्त्रूं ल्लीं लीं सं लूं हस्त्रूं श्रूं जूं हस्ल्रीं स्कीं क्लां श्रूं हं ह्लीं क्स्त्रूं द्रौं क्लूं गां सं ल्स्त्रां फ्रीं स्लां ल्लूं फ्रें ओं स्म्लीं ह्रां ऊं ल्हूं हूं नं स्त्रां वं मं म्क्लीं शां लं भैं ल्लूं हौं ईं चें क्ल्रीं ल्ह्रीं क्ष्म्ल्रीं पूं श्रौं ह्रौं भ्रूं क्स्त्रीं आं क्रूं त्रूं डूं जां ल्ह्रूं फ्रौं क्रौं किं ग्लूं छ्रंक्लीं रं क्सैं स्हुं श्रौं श्रीं ओं लूं ल्हूं ल्लूं स्क्रीं स्स्त्रौं स्भ्रूं क्ष्मक्लीं व्रीं सीं भूं लां श्रौं स्हैं ह्रीं श्रीं फ्रें रूं च्छ्रूं ल्हूं कं द्रें श्रीं सां ह्रौं ऐं स्कीं।
   ॐ नमश्चण्डिकायैः।   ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु। 

६:--श्रौं ओं त्रूं ह्रौं क्रौं श्रौं त्रीं क्लीं प्रीं ह्रीं ह्रौं श्रौं अरैं अरौं श्रीं क्रां हूं छ्रां क्ष्मक्ल्रीं ल्लुं सौः ह्लौं क्रूं सौं ।
     ॐ नमश्चण्डिकायैः।  ॐ  श्री दुर्गार्पणमस्तु। 

७:--श्रौं कुं ल्हीं ह्रं मूं त्रौं ह्रौं ओं ह्सूं क्लूं क्रें नें लूं ह्स्लीं प्लूं शां स्लूं प्लीं प्रें अं औं म्ल्रीं श्रां सौं श्रौं प्रीं हस्व्रीं।
    ॐ नमश्चण्डिकायैः।   ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु। 

८:--श्रौं म्हल्रीं प्रूं एं क्रों ईं एं ल्रीं फ्रौं म्लूं नों हूं फ्रौं ग्लौं स्मौं सौं स्हों श्रीं ख्सें क्ष्म्लीं ल्सीं ह्रौं वीं लूं व्लीं त्स्त्रों ब्रूं श्क्लीं श्रूं ह्रीं शीं क्लीं फ्रूं क्लौं ह्रूं क्लूं तीं म्लूं हं स्लूं औं ल्हौं श्ल्रीं यां थ्लीं ल्हीं ग्लौं ह्रौं प्रां क्रीं क्लीं न्स्लुं हीं ह्लौं ह्रैं भ्रं सौं श्रीं प्सूं द्रौं स्स्त्रां ह्स्लीं स्ल्ल्रीं ।
   ॐ नमश्चण्डिकायैः।   ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु। 

९:-- रौं क्लीं म्लौं श्रौं ग्लीं ह्रौं ह्सौं ईं ब्रूं श्रां लूं आं श्रीं क्रौं प्रूं क्लीं भ्रूं ह्रौं क्रीं म्लीं ग्लौं ह्सूं प्लीं ह्रौं ह्स्त्रां स्हौं ल्लूं क्स्लीं श्रीं स्तूं च्रें वीं क्ष्लूं श्लूं क्रूं क्रां स्क्ष्लीं भ्रूं ह्रौं क्रां फ्रूं ।
   ॐ नमश्चण्डिकायैः।     ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु। 

१०:--श्रौं ह्रीं ब्लूं ह्रीं म्लूं ह्रं ह्रीं ग्लीं श्रौं धूं हुं द्रौं श्रीं त्रों व्रूं फ्रें ह्रां जुं सौः स्लौं प्रें हस्वां प्रीं फ्रां क्रीं श्रीं क्रां सः क्लीं व्रें इं ज्स्हल्रीं ।
    ॐ नमश्चण्डिकायैः।  ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु। 

११:--श्रौं क्रूं श्रीं ल्लीं प्रें सौः स्हौं श्रूं क्लीं स्क्लीं प्रीं ग्लौं ह्स्ह्रीं स्तौं लीं म्लीं स्तूं ज्स्ह्रीं फ्रूं क्रूं ह्रौं ल्लूं क्ष्म्रीं श्रूं ईं जुं त्रैं द्रूं ह्रौं क्लीं सूं हौं श्व्रं ब्रूं स्फ्रूं ह्रीं लं ह्सौं सें ह्रीं ल्हीं विं प्लीं क्ष्म्क्लीं त्स्त्रां प्रं म्लीं स्त्रूं क्ष्मां स्तूं स्ह्रीं थ्प्रीं क्रौं श्रां म्लीं ।
   ॐ नमश्चण्डिकायैः।   ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु। 

१२:--ह्रीं ओं श्रीं ईं क्लीं क्रूं श्रूं प्रां स्क्रूं दिं फ्रें हं सः चें सूं प्रीं ब्लूं आं औं ह्रीं क्रीं द्रां श्रीं स्लीं क्लीं स्लूं ह्रीं व्लीं ओं त्त्रों श्रौं ऐं प्रें द्रूं क्लूं औं सूं चें ह्रूं प्लीं क्षीं ‌।
ॐ नमश्चण्डिकायैः ।  ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु। 

१३:--श्रौं व्रीं ओं औं ह्रां श्रीं श्रां ओं प्लीं सौं ह्रीं क्रीं ल्लूं ह्रीं क्लीं प्लीं श्रीं ल्लीं श्रूं ह्रूं ह्रीं त्रूं ऊं सूं प्रीं श्रीं ह्लौं आं ओं ह्रीं ।
     ॐ नमश्चण्डिकायैः।    ॐ श्री दुर्गार्पणमस्तु। 

दुर्गा दुर्गर्तिशमनी दुर्गापद्विनिवारिणी | 
दुर्गमच्छेदिनी दुर्गसाधिनी दुर्गनाशिनी ||
दुर्गतोद्धारिणी दुर्गनिहन्त्री दुर्गमापहा | 
दुर्गमज्ञानदा दुर्गदैत्यलोकदवानला ||
दुर्गमा दुर्गमालोका दुर्गमात्मस्वरूपिणी ।
 दुर्गमार्गप्रदा दुर्गमविद्या दुर्गमाश्रिता ||
दुर्गमज्ञानसंस्थाना दुर्गमध्यानभासिनी | 
दुर्गमोहा दुर्गमगा दुर्गमार्थस्वरूपिणी ||
दुर्गमासुरसंहन्त्री दुर्गमायुधधारिणी |   
दुर्गमाँगी दुर्गमता दुर्गम्या दुर्गमेश्वरी |  
 दुर्गभीमा दुर्गभामा दुर्गभा दुर्गदारिणी ||।  (3 बार)
                      ॐ नमश्चण्डिकायैः ।
                     श्री दुर्गार्पणमस्तु।।

लघु_दुर्गा_सप्तशती:-
वींवींवीं वेणुहस्ते स्तुतिविधवटुके हां तथा तानमाता,
स्वानंदेमंदरुपे अविहतनिरुते भक्तिदे मुक्तिदे त्वम् ।
हंसः सोहं विशाले वलयगतिहसे सिद्धिदे वाममार्गे,
ह्रीं ह्रीं ह्रीं सिद्धलोके कष कष विपुले वीरभद्रे नमस्ते ।। १ ।।

ह्रीं-कारं चोच्चरंती ममहरतु भयं चर्ममुंडे प्रचंडे,
खांखांखां खड्गपाणे ध्रकध्रकध्रकिते उग्ररुपे स्वरुपे ।
हुंहुंहुं-कार-नादे गगन-भुवि तथा व्यापिनी व्योमरुपे,
हंहंहं-कारनादे सुरगणनमिते राक्षसानां निहंत्रि ।। २ ।।

ऐं लोके कीर्तयंती मम हरतु भयं चंडरुपे नमस्ते,
घ्रां घ्रां घ्रां घोररुपे घघघघघटिते घर्घरे घोररावे ।
निर्मांसे काकजंघे घसित-नख-नखा-धूम्र-नेत्रे त्रिनेत्रे,
हस्ताब्जे शूलमुंडे कलकुलकुकुले श्रीमहेशी नमस्ते ।। ३ ।।

क्रीं क्रीं क्रीं ऐं कुमारी कुहकुहमखिले कोकिले,
मानुरागे मुद्रासंज्ञत्रिरेखां कुरु कुरु सततं श्रीमहामारि गुह्ये ।
तेजोंगे सिद्धिनाथे मनुपवनचले नैव आज्ञा निधाने,
ऐंकारे रात्रिमध्ये शयितपशुजने तंत्रकांते नमस्ते ।। ४ ।।

व्रां व्रीं व्रुं व्रूं कवित्ये दहनपुरगते रुक्मरुपेण चक्रे,
त्रिःशक्त्या युक्तवर्णादिककरनमिते दादिवंपूर्णवर्णे ।
ह्रीं-स्थाने कामराजे ज्वल ज्वल ज्वलिते कोशितैस्तास्तुपत्रे
स्वच्छंदं कष्टनाशे सुरवरवपुषे गुह्यमुंडे नमस्ते ।। ५ ।।

घ्रां घ्रीं घ्रूं घोरतुंडे घघघघघघघे घर्घरान्यांघ्रिघोषे,
ह्रीं क्रीं द्रं द्रौं च चक्र र र र र रमिते सर्वबोधप्रधाने ।
द्रीं तीर्थे द्रीं तज्येष्ठ जुगजुगजजुगे म्लेच्छदे कालमुंडे,
सर्वांगे रक्तघोरामथनकरवरे वज्रदंडे नमस्ते ।। ६ ।।

क्रां क्रीं क्रूं वामभित्ते गगनगडगडे गुह्ययोन्याहिमुंडे,
वज्रांगे वज्रहस्ते सुरपतिवरदे मत्तमातंगरुढे ।
सूतेजे शुद्धदेहे ललललललिते छेदिते पाशजाले,
कुंडल्याकाररुपे वृषवृषभहरे ऐंद्रि मातर्नमस्ते ।। ७ ।।

हुंहुंहुंकारनादे कषकषवसिनी मांसि वैतालहस्ते,
सुंसिद्धर्षैः सुसिद्धिर्ढढढढढढढः सर्वभक्षी प्रचंडी ।
जूं सः सौं शांतिकर्मे मृतमृतनिगडे निःसमे सीसमुद्रे,
देवि त्वं साधकानां भवभयहरणे भद्रकाली नमस्ते ।। ८ ।।

देवि त्वं तुर्यहस्ते करधृतपरिघे त्वं वराहस्वरुपे,
त्वं चेंद्री त्वं कुबेरी त्वमसि च जननी त्वं पुराणी महेंद्री ।
ऐं ह्रीं ह्रीं कारभूते अतलतलतले भूतले स्वर्गमार्गे,
पाताले शैलभृंगे हरिहरभुवने सिद्धिचंडी नमस्ते ।। ९ ।।

हंसि त्वं शौंडदुःखं शमितभवभये सर्वविघ्नांतकार्ये,
गांगींगूंगैंषडंगे गगनगटितटे सिद्धिदे सिद्धिसाध्ये ।
क्रूं क्रूं मुद्रागजांशो गसपवनगते त्र्यक्षरे वै कराले,
हीं हूं गां गणेशी गजमुखजननी त्वं गणेशी नमस्ते ।। १० ।।

       इसमें दस श्लोक लघु दुर्गा सप्तशती में परमेश्वरी के वीरभद्रा व्यापिनी महेशी अन्नता गुह्यमुंण्डा वज्रदंण्डा ऐन्द्रीं भद्रकाली सिद्धचंण्डी गणेशी रुपों का वर्णन और प्रणति निवेदन किया गया। कांता,  गुह्यमुंण्डा ,वज्रदंण्डा और ऐन्द्रीं यह चार रूप अत्यंत उग्र हैं। इनका रहस्य स्वरूप ज्ञान वाममार्ग में होता है। ज्ञानमार्ग में व्यापिनी की परिधि में इन रूपों का विराट दर्शन होता है। सप्तशती में भी यह रूप पर कथा विस्तार में वे अन्तर्हित से हो गए हैं। यहाँ कथा नहीं है ,वस्तुतः यह स्वरूप की दुर्गति का कारण बनते हैं और परमेश्वरी के शरणागत होने पर यह दुर्गतिनाशिनी दुर्गा की कृपाकटाक्ष हो जाते हैं।
        जब वह निग्रहकारिणी होती हैं तो यह स्वरूप व्यक्ति को मोह ग्रस्त करके अज्ञान के तामिस्र लोकों में धकेल देते हैं। मोहग्रस्त व्यक्ति त्रिपुरा को भूलकर इनमें भूल जाता है, जैसे बालक क्रीडा से मुक्त होकर मांँ को भूल जाता है ,पर क्रीडनक के टूटने पर अथवा परमा की अकाण्ड करुणा से जब उसको मातृस्मरण हो जाता है, और वह आर्तभाव से उसे पुकारता है तो वहीं निग्रहकारिणी करूणार्द्र होकर अनुग्रहकारिणी के रूप में आती है।
        उसके बंधन पास भी बनते है तो ग्रन्थि भी मोह के पेशल संबंध भी बांँधते हैं तो मद के घर्षक दोषरज्जु भी व्यक्ति को लपेटती लथेड़ती है वह यह चाहती है कि यह कल्मष उसे छू भी ना सके। वह इतना शुभ्र हो जाए कि यह उसे कुलुषित कर ही न सके । उसकी कृपा का आनंद लेने के लिए साधक के संपूर्ण में उसका श्रद्धारूप चमकने लगे। लधुसप्तशती ने ज्ञान की तटस्थ वृत्ति भक्ति की अरुणिमा से रंजित होकर प्रकट हुई है।
        परमा को उसके चरित्रों के माध्यम से नहीं शुद्ध मूल रूप में भजा गया है। इसके गान की अवस्था में ज्ञान के निर्बंन्ध में भाषा और भाषा का व्याकरण गौण हो गया है । सप्तशती का जो फल है वहीं इसका है पर इसमें बीजों की प्रधानता है। इसलिए जिस साधक में इतनी योग्यता आ गई हो उसके लिए यह भी उतनी ही फलप्रद है और जो भी इतना योग्य नहीं हुआ है उसे इसके अधिक पाठ करने पर वह योग्यता प्राप्त होती है।
इसकी फलश्रुति नहीं दी गई है। न हीं कोई विस्तृत वर्णन विधि समझाने की बात है । यह है कि इसमें जिन दस रूपों की स्तुति की गई है उन रूपों में जो गुण प्रभाव निहित हैं। वहीं इस पाठ के फल स्वरुप प्राप्त होता है। इन सबका संघनित रूप दुर्गा है। अतः इसकी अधिष्ठातृ दुर्गा चण्डी होगी। 
        साभार :- अशोक वशिष्ठ जी

शनिवार, 27 मई 2023

कर्मप्रधान जातिव्यवस्था ही प्राचीन सनातन संस्कृति और धर्म

           आधुनिक युग में समाज को बाँटकर सत्ता हथियाने के लिए प्राचीन सामाजिक व्यवस्था के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न किया जा रहा है। बिहार ,उत्तरप्रदेश आदि राज्यों में जातिगत जनगणना कराने की बातें की जा रही है। ऐसे ही कुछ बातें आर्य और अनार्य के संबंध में भी की जाती हैं। भारत में सनातन धर्म कर्म प्रधान न कि जन्मप्रधान ।आधुनिक युग में जातिव्यवस्था जन्मप्रधान हो गया है। जबकि प्राचीनकाल में यह कर्मप्रधान जातिव्यवस्था थी। लेकिन तथाकथित राजनीतिक दल और उनके नेता सामाजिक रिस्ते को बाँटो और राजकरो के सिद्धांत पर चल रहे हैं। वे खुद मलेच्छ हैं और उत्कृष्ट सनातन धर्म में भी मलेच्छता  फैलाने का काम कर रहें हैं। 
          पहले मैं आर्य और अनार्य के भ्रम को तोड़ रहा हूँ। श्रीमद्वाल्मीकि रामायण के द्वितीय खण्ड के युद्धकांड
के 104 वें अध्याय के दूसरे से पाँचवें श्लोक में रावण अपने सारथी को डाँटते हुए कहते हैं कि क्या तूने मुझे पराक्रमशून्य ,असमर्थ, पुरुषार्थशून्य, डरपोक, ओछा, निस्तेज, मायारहित, और अस्त्रों के ज्ञान से वंचित समझ रखा है कि मेरा अभिप्राय जाने बिना ही मेरी अवहेलना करके मेरे शत्रु के सामने से मेरा रथ हटा लिया?
त्वयाद्य हि ममानार्य चिरकालमुपार्जितम्।
यशो वीर्यं च तेजश्च प्रत्ययश्च विनाशितः।।5।।
वा.रा.यु.का. अ.-104 पृ.584
 अर्थात् अनार्य! आज तूने मेरे चिरकाल से उपार्जित यश 
, पराक्रम, तेज और विश्वास पर पानी फेर दिया।
यही नहीं उन्होंने आगे यह भी कहा कि मैं युद्ध का लोभी हूँ तो भी तूने रथ हटाकर शत्रु की दृष्टि में मुझे कायर  सिद्ध कर दिया। दुर्मते ! मेरा यह अनुमान सत्य है कि शत्रु ने तुझे घूस देकर तोड़ दिया है। 
      इसके जवाब में उसी अध्याय के आगे के श्लोकों में सारथि के कर्तव्यों  को बताते हुए कहा कि मैं डरा हुआ नहीं हूँ, मेरा विवेक भी नष्ट नहीं हुआ है, न मुझे शत्रुओं ने ही बहकाया है। मैं असावधान भी नहीं हूँ।  आपके प्रति मेरा स्नेह भी कम नहीं हुआ है तथा आपने जो मेरा सत्कार किया है, उसे भी मैं भूला हुआ नहीं हूँ। मैं आपका सदा हित चाहता हूँ और आपके यश की रक्षा के लिए ही यत्नशील रहता हूंँ।
नास्मिन्नर्थे महाराज त्वं मां प्रियहिते रतम्।
कश्चिल्लघुरिवानार्यो दोषतो गन्तुमर्हसि ।।13।।
वा.रा.यु.का. अ.-104 पृ.584
 अर्थात्  महाराज ! मैं आपके प्रिय और हित में तत्पर रहनेवाला हूँ, अतः इस कार्य के लिए आप किसी ओछे और अनार्य पुरुष की भाँति मुझपर दोषारोपण न करें।
         इससे स्पष्ट होता है कि आर्य अर्थात श्रेष्ठ आचरण करनेवाले लोग।जबकि अनार्य अर्थात गंदे आचरण करनेवाले, मिथ्यावादी , कायर ,  दुराचारी, पथभ्रष्ट आदि निम्नस्तरीय लोगों के लिए कहा गया है। 
            अब जो आर्य को बाहर से आनेवाले लोग माननेवाले इतिहासकार और तथाकथित विद्वान लोग, क्या यह कहना चाहते हैं कि भारत के मूलनिवासी  दूराचारी, पथभ्रष्ट , कायर, और निकृष्ट लोग थे ? जिसे बाहर से आर्य आकर भारतीय लोगों को सभ्य बनाए।  यह आपसब विचारें कि ऐसे लोगों को क्या कहना चाहिए जो हम भारतीयों को सदैव नीचा दिखाते रहें हैं। हर तरह से साजिश करते रहें हैं।
       इसी तरह ब्राम्हणों के बारे में  भी गलत-गलत बातें ही भ्रम फैलाकर उन्हें निकृष्ट दिखाने की कोशिश की जा रही है। भारतीय समाज को जातियों में बाँटा जा रहा है। एक तरह से सनातनियों को जाति-धर्म में बाँटकर भारत पर राज करने ,विधर्मी लोग षड्यंत्र कर रहे हैं।
         आइये जरा इनके बारे में भी, सच जानने की कोशिश  करते हैं। ब्राम्हण कौन और उन्हें क्या करना चाहिए।   
           ब्राह्मण को चाहिए कि वह सम्मान की इच्छा को भयंकर विष के समान समझकर उससे डरता रहे और अपमान को अमृत के समान स्वीकार करें, क्योंकि जिसकी अवमानना होती है उसकी हानि नहीं होती, वह सुखी ही रहता है।
   और जो अवमानना करता है वह विनाश को प्राप्त होता है इसलिए तपस्या करता हुआ द्विज नित्य वेद या और उपनिषदों का अभ्यास करें। क्योंकि वेदाभ्यास ही ब्राह्मण का परम तप है
           ब्राह्मण के तीन जन्म होते है। एक तो माता की गर्भ से , दूसरा यज्ञोपवीत के होने से समय और तीसरा यज्ञ तप की दीक्षा लेने से ।
            यज्ञोपवीत के समय गायत्री माता और आचार्य पिता होता है क्योंकि यज्ञोपवीत होने से पूर्व किसी भी वैदिक कर्म के करने का अधिकारी वह नहीं होता है। 
श्राद्ध मे पढ़ जानेवाले वेदमंन्त्रो को छोड़कर (अनुपनीत द्विज)  वेद मन्त्र का तबतक उच्चारण न करे क्योंकि जब तक वेदारम्भ न हो जाय तबतक वह शुद्र के समान माना गया है।
         यज्ञोपवीत सम्पन्न हो जाने पर द्विज को व्रत का उपदेश ग्रहण करना चाहिए और तभी से विधिपूर्वक वेदाध्ययन करना चाहिए ।
          अपनी तपस्या वृद्धि के लिए गुरू के पास रहे और नियमों का पालन करते रहें ।पुष्प, फल,जल, समिधा, मृत्तिका, कुशा,और अनेक प्रकार को काष्ठों या संग्रह रखें।
          मद्य,मांस ,गन्ध,पुष्प-माला,व स्त्रियों का परित्याग करे।प्राणियों की हिंसा, शरीर मे उबटन-अंजन लगाना, जूता और छत्र धारण करना गीत सुनना ,नाच देखना, जुआ खेलना, झुठबोलना, निन्दा करना काम क्रोध और लोभादिके वशीभुत होना ब्राह्मण धर्म ये विरूद्ध है।
            ब्राम्हण कौन?
 यास्क मुनि के अनुसार-
जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् भवेत द्विजः।
वेद पाठात् भवेत् विप्रः ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः।।
अर्थात – व्यक्ति जन्मतः शूद्र है। संस्कार से वह द्विज बन सकता है। वेदों के पठन-पाठन से विप्र हो सकता है। किंतु जो ब्रह्म को जान ले,वही ब्राह्मण कहलाने का सच्चा अधिकारी है।
          योग सूत्र व भाष्य के रचनाकार पतंजलि के अनुसार-
विद्या तपश्च योनिश्च एतद् ब्राह्मणकारकम्।
विद्यातपोभ्यां यो हीनो जातिब्राह्मण एव स:॥
अर्थात- ”विद्या, तप और ब्राह्मण-ब्राह्मणी से जन्म ये तीन बातें जिसमें पाई जाये, वही पक्का ब्राह्मण है। पर जो विद्या तथा तप से शून्य है वह जातिमात्र के लिए ब्राह्मण है,  और वे पूज्य नहीं हो सकते हैं। ” 
(पतंजलि भाष्य 51-115)
-महर्षि मनु के अनुसार-
 विधाता शासिता वक्ता मा ब्राह्मण उच्यते।
तस्मै नाकुशलं ब्रूयान्न शुष्कां गिरमीरयेत्॥
अर्थात-शास्त्रो का रचयिता तथा सत्कर्मों का अनुष्ठान करने वाला, शिष्यादि की ताडनकर्ता,वेदादि का वक्ता और सर्व प्राणियों की हितकामना करने वाला ब्राह्मण कहलाता है। अत: उसके लिए गाली-गलौज या डाँट-डपट के शब्दों का प्रयोग उचित नहीं”।
(मनु; 11-35)
महाभारत के कर्ता वेदव्यास और नारदमुनि के अनुसार “जो जन्म से ब्राह्मण हे किन्तु कर्म से ब्राह्मण
नहीं हैं, उसे शुद्र (मजदूरी) के काम में लगा दो”
 (सन्दर्भ ग्रन्थ – महाभारत)
 महर्षि याज्ञवल्क्य व पराशर व वशिष्ठ के अनुसार “जो निष्कारण (कुछ भी मिले ऐसी आसक्ति का त्याग करके)
वेदों के अध्ययन में व्यस्त रहे और वैदिक विचार संरक्षण और संवर्धन हेतु सक्रीय रहे वही ब्राह्मण हैं।
(सन्दर्भ ग्रन्थ शतपथ ब्राह्मण, ऋग्वेद मंडल १०, पराशर स्मृति)
भगवद गीता में श्री कृष्ण के अनुसार “शाम, दाम, करुणा, प्रेम, शील (चारित्र्यवान),निस्पृही जैसे गुणों का स्वामी ही ब्राह्मण हैं। ” 
 “चातुर्वर्ण्य माय सृष्टं गुण कर्म विभागशः” (भ.गी. ४-१३)
इसमे गुण कर्म ही क्यों कहा भगवान ने जन्म क्यों नहीं कहा? 
जगद्गुरु शंकराचार्य के अनुसार “ब्राह्मण वही है जो “पुंसत्व” से युक्त हैं। जो “मुमुक्षु” हैं। जिसका मुख्य उद्देश्य वैदिक विचारों का संवर्धन हैं। जो सरल हैं, जो नीतिवान हैं , वेदों पर प्रेम रखता है , जो तेजस्वी और ज्ञानी  हैं। जिसका मुख्य व्यवसाय वेदों का अध्ययन और अध्यापन कार्य है । वेदों,उपनिषदों, दर्शनशास्त्रों का संवर्धन करने वाला ही ब्राह्मण हैं। ”
(सन्दर्भ ग्रन्थ – शंकराचार्य विरचित विवेक चूडामणि, सर्व वेदांत सिद्धांत सारसंग्रह,आत्मा-अनात्मा विवेक)
किन्तु जितना सत्य यह है कि केवल जन्म से ब्राह्मण होना संभव नहीं है, कर्म से कोई भी ब्राह्मण बन सकता है । यह भी उतना ही सत्य है कि इसके कई प्रमाण वेदों और ग्रंथो में मिलते हैं ।
जैसे…..
ऐतरेय ऋषि - ये दास अथवा अपराधी के पुत्र थे| परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की |ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेयब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है|
ऐलूष ऋषि -  ये दासी पुत्र थे | जुआरी और हीनचरित्र भी थे | परन्तु बाद में उन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके अनेक अविष्कार किये| ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन किया | (ऐतरेय ब्राह्मण २.१९
 सत्यकाम जाबाल- ये गणिका (वेश्या) के पुत्र थे परन्तु वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए |
राजा दक्ष के पुत्र  पृषध शूद्र हो गए थे, प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया | 
(विष्णु पुराण ४.१.१४)
राजा नेदिष्ठ के पुत्र नाभाग  वैश्य हुए| पुनः इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया |
(विष्णु पुराण ४.१.१३)
धृष्ट नाभाग के पुत्र थे, परन्तु ब्राह्मण हुए और उनके पुत्र ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.२.२)
आगे उन्हींके वंश में पुनः कुछ ब्राह्मण हुए| 
(विष्णु पुराण ४.२.२)
 भागवत के अनुसार राजपुत्र अग्निवेश्य  ब्राह्मण हुए |
विष्णुपुराण और भागवत के अनुसार रथोतर क्षत्रिय से ब्राह्मण बने |
हारित क्षत्रियपुत्र से ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण)
क्षत्रियकुल में जन्में शौनक ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.८.१) 
वायु,विष्णु और हरिवंश पुराण कहते हैं कि शौनक ऋषि के पुत्र कर्म भेद से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण के हुए | इसी प्रकार गृत्समद, गृत्समति और वीतहव्य के उदाहरण हैं |
     मातंग चांडालपुत्र से ब्राह्मण बने |
ऋषि पुलस्त्य का पौत्र रावण अपने कर्मों से राक्षस बना। 
राजा रघु का पुत्र प्रवृद्ध राक्षस हुआ | 
त्रिशंकु राजा होते हुए भी कर्मों से चांडाल बन गए थे |
विश्वामित्र के पुत्रों ने शूद्रवर्ण अपनाया | विश्वामित्र स्वयं क्षत्रिय थे। परन्तु बाद उन्होंने ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया विदुर दासी पुत्र थे | तथापि वे ब्राह्मण नहीं हुए और उन्होंने हस्तिनापुर साम्राज्य का मंत्री पद सुशोभित किया। 
            मित्रों, ब्राह्मण की यह कल्पना व्यावहारिक है न कि जन्म से। विवाद का यह अलग विषय है। किन्तु भारतीय सनातन संस्कृति के हमारे पूर्वजों व ऋषियों ने ब्राह्मण की जो व्याख्या दी है, उसमें काल के अनुसार परिवर्तन करना हमारी मूर्खता मात्र होगी। 
           वेदों-उपनिषदों से दूर रहने वाला और ऊपर दर्शाये गुणों से अलिप्त व्यक्ति चाहे जन्म से ब्राह्मण हों या ना हों लेकिन ऋषियों को व्याख्या में वह ब्राह्मण नहीं हैं। अतः आओ हम हमारे कर्म और संस्कारों की तरफ वापस बढ़ें ।
ब्राम्हणभेदा अथ ब्राम्हणभूदांस्त्वष्टौ विप्रावधारय।
मात्रश्चब्राम्हणश्चैव श्रोत्रियश्चतत:परम्।।
अनूचानस्तथाभ्रूणोऋषिकल्पः ऋषिर्मुनिः।
  ऋषि कौन हैं? 
ऊर्ध्वरेताभवत्यग्रे नियताशी न संशयी । 
शापानग्रह्यो शक्त:सत्यसंधोभवेदृषि:!!
 मुनि कौन हैं? 
 निवृत्त:सर्व तत्वज्ञो काम क्रोधविवर्जित :l
 ध्यानस्थो निष्क्रियो दानतस्तुल्यमृत्काञ्चने।
        अतः आप सभी सनातनियों से आग्रह है कि तथाकथित राजनेताओं और राजनीतिक दलों के बहकावे में न पड़कर , अपने परिवार को ज्ञानी बनाइये । उस संविधान (सम+विधान) के पचड़े में मत पड़िये। जिसमें कहा तो गया है कि समानता का अधिकार है परन्तु वे खुद ही हमें अगले-पिछड़े  जाति-धर्म में बाँटते हैं।  वास्तव में अगर हमारी संसद संविधान की रक्षा चाहती है तो सभी भारतीय लोगों के लिए एक ही शिक्षा, एक ही नौकरी की योग्यता रुपी समान आचार संहिता लागु कर  दें।